मेरे देश के नेता ऐसे थे।

लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।
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हमारे महामहिम मोदी जी आम जनता को भाषण दे रहे हैं थे कि ऊर्जा का संकट काल है। गर्मी की छुट्टियों में बाहर जाने की मत सोचना, अभी विदेश मत जाना, तेल भी कम खाओ तो वह भी देशभक्ति है, सोना मत खरीदो। देशवासियों को यह सब समझा कर पांच देशों की विदेश यात्रा पर चले गए। हर संकट में मोदी देश की जनता को छोड़कर विदेश यात्रा पर निकल जाते हैं।
हद तो तब हो गई जब स्वीडन के एक शहर में शान से अपनी आरती करवाई और अपने आप को भगवान् समझते हैं इसलिए उनको रोका भी नहीं और आराम से आरती होती रही ।
हर वक्त हर समस्या के लिए नेहरू जी को दोषी ठहराया जाता है। लेकिन मोदी के विपरीत सन 1946 में अंतरिम सरकार के गठन के पहले जवाहरलाल नेहरू ने देश के निर्माण के लिए अपनी 98% पैतृक सम्पत्ति दान कर दी थी यहां तक कि इलाहाबाद में अपने पुश्तैनी घर आनंद भवन भी दे दिया था।
सन 1962 में भारत, चीन के युद्ध के समय भारतीय सेना संसाधनों की कमी का सामना कर रही थीं तो इंदिरा गांधी ने अपना सारा सोना दे दिया था। सन् उन्नीस सो पेसठ में लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल के दौरान भीषण सूखा और अकाल जैसे हालात हो गये थे अन्न की कमी पड़ गई थी तो शास्त्री जी ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन शाम का खाना छोड़ने की अपील की थी पर ये शुरुआत पहले अपने घर से की, उन्होंने एक दिन का उपवास रखा था।
हमारे महामहिम मोदी जी को न तो देश की चिन्ता है विश्व में फजीहत हो रही हैं। देशवासियों की भी चिंता नहीं है। जनता पेट्रोल डीजल कम खर्च करें पर उनके विदेश यात्रा के दौरों में कमी नहीं होगी। उनके तेल कम खाने में फर्क नहीं पड़ेगा। इस घोषणा के तुरंत बाद चुनावी रैली शुरू हो गई गाड़ीयों का काफिला चलता रहा। नेताओं, सांसद, विधायक के लिए यह घोषणा नहीं हुई थी उनके किसी भी चीज की कमी नहीं होगी। ये घोषणा लोकतंत्र की उस जनता के लिए थी जिसने ये दिन देखने के लिए मोदी को एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार ऐसे गैर जिम्मेदार आदमी को चुना जो जनता को मुसीबत में डाल कर, जनता के पैसे से विश्व भ्रमण करता है। देश का पहला प्रधानमंत्री हैं जो देश में कम विदेश में ज्यादा रहता है। (लेखिका के अपने विचार है)

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