
www.daylifenews.in
मार्क ट्वैन का क़ौल है- ‘सच जब तक जूते पहन रहा होता है, झूठ आधी दुनिया का चक्कर काट चुका होता है।’ इसके आगे का क़िस्सा यूँ है कि जूते पहन कर सच बाहर निकला तो लोग उसे खरी-खोटी सुनाने लगे- ‘जूते पहनना क्या ज़रूरी था? अब क्या फ़ायदा, झूठ जाने लोगों के कानों में क्या-क्या फूँक चुका होगा।’ दोराहे पर खड़ा सच सोच में पड़ गया- ‘मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ (या जाऊँ ही नहीं)।’ उसने कार्यक्रम कैंसिल किया और घर लौट गया। इधर, वह जूते खोल रहा था, उधर झूठ बाकी आधी दुनिया का भी चक्कर काट चुका था। वसीम बरेलवी ने फ़रमाया है- ‘झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गए/ और मैं था कि सच बोलता रह गया।’
राजेश खन्ना की ‘दुश्मन’ में सुना था- ‘सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से/ कि ख़ुशबू आ नहीं सकती कभी काग़ज़ के फूलों से।’ लेकिन ज़माना सच से ज़्यादा काग़ज़ के फूलों पर फ़िदा है। सारी दुनिया जानती थी कि कोरोना काल में आइपीएल के मैच दर्शकों से खाली मैदान में हो रहे थे, लेकिन टीवी पर मैच के लाइव प्रसारण के दौरान उसी तरह रह-रह कर दर्शकों का रेकॉर्डेड शोर सुनाया जा रहा था, जिस तरह कॉमेडी शो में रेकॉर्डेड हँसी सुना कर बताया जाता है कि इस जगह हँसना है। सिनेमा हो या टीवी, बनावटी माहौल रचने में दोनों माहिर हैं। दोनों ऐसी-ऐसी धुप्पल दिखाते हैं कि सच के होश उड़ जाएँ। अजीब दौर है। उम्मीद फ़ाज़ली का शेर है- ‘आसमानों से फ़रिश्ते जो उतारे जाएँ/ वो भी इस दौर में सच बोलें तो मारे जाएँ।’

ज़माने ने कबीर को भी बिसरा दिया और उनके मिसरे ‘साँच बराबरि तप नहीं झूठ बराबर पाप’ को भी। कुछ साल पहले आई जॉन अब्राहम की ‘सत्यमेव जयते’ के बारे में दावा किया गया था कि यह झूठ पर सच की जीत की फ़िल्म है (हर दूसरी फ़िल्म में यही होता है, जो हक़ीक़त में नहीं होता)। शायद इस फ़िल्म में कोई कसर रह गई थी, इसलिए इसका दूसरा भाग ‘सत्यमेव जयते 2’ बनाया गया। याद आता है कि अस्सी के दशक में जब विनोद खन्ना को अमिताभ बच्चन की टक्कर का सितारा माना जा रहा था, वह अचानक ग़ायब हो गए। पता चला कि सच की खोज उन्हें रजनीश की पनाह में ले गई। पाँच साल तक भटकते रहे। सच नहीं मिला, तो ‘जैसे उड़ि जहाज़ को पंछी’ की तर्ज़ पर फ़िल्मों में लौट आए। उनके दूसरे दौर की शुरुआती फ़िल्मों में से एक का नाम भी ‘सत्यमेव जयते’ था। इसमें बप्पी लाहिड़ी ने एक गाने ‘दिल में हो तुम, आँखों में तुम’ की धुन बहुत अच्छी बनाई थी।
कुछ साल पहले टीवी पर आमिर खान के टॉक शो ‘सत्यमेव जयते’ ने आँखें खोलने वाली सच्चाइयाँ ज़माने के सामने रखी थीं। सच कभी-कभी नीम से भी कड़वा होता है। कई लोगों को हज़म नहीं होता। लिहाज़ा इस शो का पर्दा गिर गया। घोर काल्पनिक दुनिया में सैर कराने वाली मसाला फ़िल्मों के दीवानों को पर्दे पर खुरदरी हक़ीक़त रास नहीं आती। अमिताभ बच्चन की ‘मैं आज़ाद हूँ’ इसीलिए नहीं चली थी कि इसमें उन्होंने किसी को एक मुक्का तक नहीं मारा। दर्शकों पर आनंद तभी छलछलाता है, जब नायक हर तीन-चार रील बाद बदमाशों की हड्डी-पसली एक करता रहे, हैंडपंप उखाड़ कर दुश्मनों को खदेड़ दे (गदर एक प्रेमकथा) या लैम्प पोस्ट उखाड़ कर बदमाश के पीछे दौड़े (सिंघम)। जब तक दर्शक ऐसे बनावटी सीन पर फ़िदा रहेंगे, सच फ़िल्मों से दूर-दूर रहेगा। फ़िल्म वाले भी क्या करें। उनके अपने हीले-बहाने हैं – वही दिखाओ, जिस पर पब्लिक लोटन कबूतर होती हो। यानी उनके हिसाब से पब्लिक को सच रास नहीं आता। इसलिए सच से इतर तरह-तरह के रास पेश किए जाते हैं। यह जो पब्लिक है, जाने कब सच का सामना करने को तैयार होगी? कमाल अहमद ने फ़रमाया है- ‘कुछ लोग जो ख़ामोश हैं, ये सोच रहे हैं/ सच बोलेंगे, जब सच के ज़रा दाम बढ़ेंगे।’
सच के दाम कब बढ़ेंगे?
साभार @ दिनेश ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, फिल्म समीक्षक एवं लेखक (जयपुर)