
लेखक: डॉ. पी.डी. गुप्ता
पूर्व निदेशक ग्रेड वैज्ञानिक, कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र, हैदराबाद, भारत
अनुवाद : फातिमा काईदजौहर (अहमदाबाद)
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इंसानी दिमाग में बैक्टीरिया, फंगी और वायरस (माइक्रोब्स) का एक समुदाय रहता है। यह अजीब है, लेकिन सच है। पहले माना जाता था कि दिमाग एक ऐसी जगह है जहाँ कोई माइक्रोब नहीं होता। दिमाग में मौजूद इन माइक्रोब्स की भूमिका को समझनसे इंसानी सेहत पर गहरा असर पड़ता है।
दिमाग के माइक्रोब्स के बारे में अभी भी बहुत सी बातें पता नहीं हैं, जैसे कि माइक्रोऑर्गेनिज़्म दिमाग में कैसे पहुँचते हैं, दिमाग में कौन से माइक्रोब्स रहेंगे, इसे क्या कंट्रोल करता है, और एक स्वस्थ दिमाग में कौन-कौन से माइक्रोब्स होते हैं, इसका पूरा मैप क्या है। हालाँकि, हाल की वैज्ञानिक रिसर्च ने इस सोच को चुनौती दी है और दिमाग के अंदर अलग-अलग तरह के और बदलते रहने वाले माइक्रोब्स के होने की संभावना पर रोशनी डाली है। ब्रेन माइक्रोबायोम, गट माइक्रोब्स का ही एक हिस्सा है और इसमें माइक्रोब्स की संख्या कम होने की संभावना है। अलग-अलग लोगों और दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में ब्रेन माइक्रोब्स की विविधता अलग-अलग होती है, और सिंगुलेट कॉर्टेक्स में माइक्रोब्स की संख्या सबसे ज़्यादा होती है।
वे वहाँ रहते तो हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे सक्रिय रूप से अपनी संख्या बढ़ाते हों। ये माइक्रोब्स ज़्यादातर शांत अवस्था में (बस चुपचाप जीवित) रहते हैं। असल में, वैज्ञानिकों का मानना था कि वहाँ रहने वाले किसी भी माइक्रोब के लिए दिमाग शायद एक “डेड एंड” (आगे कोई रास्ता न होना) जैसा है। इन प्रयोगों में की गई कई जाँच-पड़ताल वाली तकनीकों से इस बात को बल मिला कि दिमाग पूरी तरह से रोगाणु-मुक्त (sterile) नहीं होता; हालाँकि, बाद में कुछ रिसर्च पेपर्स में इन प्रयोगों पर सवाल उठाए गए। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि दिमाग में माइक्रोब्स होने का कॉन्सेप्ट अभी शुरुआती दौर में है और इसके कई पहलुओं को अभी और समझने की ज़रूरत है।
दिमाग में मौजूद माइक्रोब्स (सूक्ष्मजीवों) के संतुलन में गड़बड़ी या बदलाव का संबंध कई न्यूरोलॉजिकल और न्यूरोसाइकियाट्रिक बीमारियों से रहा है, जैसे कि अल्जाइमर रोग, मल्टीपल स्केलेरोसिस, पार्किंसंस रोग, डिप्रेशन और एंग्जायटी। दिमाग और उसमें रहने वाले सूक्ष्मजीवों के बीच जटिल आपसी क्रियाओं को समझने से इन बीमारियों के कारणों, उनके बढ़ने के तरीके और संभावित इलाज के तरीकों के बारे में नई जानकारी मिल सकती है।
इस क्षेत्र में सैंपल के दूषित होने, तकनीकी सीमाओं और तरीकों में अंतर जैसी चुनौतियां हैं। रिसर्च के नतीजों की विश्वसनीयता और सटीकता पक्की करने के लिए इन चुनौतियों से निपटना ज़रूरी है। दिमाग, न्यूरल, एंडोक्राइन और इम्यून सिस्टम के ज़रिए गट माइक्रोब्स (आंतों के सूक्ष्मजीवों) को भी नियंत्रित कर सकता है। दिमाग के माइक्रोब्स में बदलाव का असर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों पर पड़ सकता है। दिमाग के माइक्रोब्स उन बैक्टीरिया से अलग होते हैं जो “ब्रेन एब्सेस और एन्सेफेलोपैथी जैसी दिमागी बीमारियां” पैदा करते हैं। बीमारी फैलाने वाले माइक्रोब्स अलग-अलग तरह के होते हैं और उनका एकमात्र काम बीमारी फैलाना होता है। फिर भी, दिमाग में माइक्रोब्स की मौजूदगी के समर्थन में मिल रहे नए सबूत, दिमाग और सूक्ष्मजीवों के बीच के जटिल रिश्ते के बारे में हमारी समझ में एक बड़ा बदलाव लाते हैं।
दिमाग के माइक्रोब्स के बारे में कुछ बातें यहाँ दी गई हैं: ‘ब्रेन माइक्रोबायोम’ का कॉन्सेप्ट सबसे पहले 2013 में एक स्टडी के ज़रिए सामने आया था। इस स्टडी में ऐसे नॉन-ह्यूमन RNA सीक्वेंस देखे गए जो 170 से ज़्यादा बैक्टीरिया और फ़ेज (phages) से मेल खाते थे। स्टडी में कमज़ोर इम्यून सिस्टम वाले चूहों में इंसानी दिमाग के टिश्यू भी ट्रांसप्लांट किए गए, जिनमें वही बैक्टीरियल सीक्वेंस पाए गए।
स्वास्थ्य पर असर: कुछ स्टडीज़ से पता चलता है कि दिमाग में मौजूद माइक्रोब्स (सूक्ष्मजीवों) के संतुलन में गड़बड़ी से बीमारी हो सकती है। उदाहरण के लिए, न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों (NDs) वाले मरीज़ों के दिमाग में कुछ बैक्टीरिया और फंगी पाए गए हैं। कई स्टडीज़ ने कुछ खास बैक्टीरिया और फंगी को न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के पनपने से जोड़ा है और उन स्टडीज़ पर ज़ोर दिया है जो दिमाग के माइक्रोब्स और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों में उनकी भूमिका के सिद्धांत का समर्थन करती हैं। (लेखक के अपन विचार हैं)