
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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कुछ महीने पहले दक्षिण के राज्य केरल में कांग्रेस ने नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता में आया था. इसमें दूसरा बड़ा घटक इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग था . 140 सदस्यों के सदन में इसके 22 विधायक हैं . जिन में से 5 को मंत्री बनाया गया था . ये दोनों दल मिलकर राज्य में पहले भी सरकार चला चुके है . उस समय उनमें शायद ही सरकार की नीतियों तथा निर्णयों के लेकर कोई बड़े मतभेद रहे हों. लेकिन इस बार स्थिति वैसी नहीं है . सरकार बनने के कुछ ही महीनों में कांग्रेस और लीग में कुछ नीतियों तथा फैसलों को लेकर मतभेद पैदा हो गए हैं . हालाँकि इसको लेकर सरकार को कोई खतरा नहीं है लेकिन अगर इन मतभेदों को जल्दी ही दूर नहीं किया गया तो सरकार के कामकाज प्रभावित होंगे , उनमें अडंगा लगता रहेगा।
वैसे तो दोनों घटकों में कई सारे मुद्दों पर मतभेद है लेकिन कम से कम तीन मुद्दे ऐसे है जिन पर मुस्लिम लीग अपना रुख बदलने के लिए तैयार नहीं हैं. क्योंकि इन तीनों मुद्दों पर मंत्रिमंडल में फैसला हुआ था इसलिए “सामूहिक जिम्मेदारी” सब की है . लीग इसको लेकर सार्वजनिक रूप से कुछ कह नहीं रही लेकिन कांग्रेस के नेताओं को उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी इन निर्णयों से सहमत नहीं है . उनको कहना है कि चुनावों में मोर्चा ने जो वायदे किये थे यह उनके विपरीत है।
राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 27 प्रतिशत है . मुस्लिम लीग की इस समुदाय में पैठ और पकड़ बहुत मजबूत है . लीग किसी भी कीमत पर अपने मतदातायों को नाराज़ नहीं करना चाहती . सरकार के तीन बड़े निर्णयों में दो ऐसे है जो मुस्लिम लीग की घोषित नीतियों के विपरीत है.केंद्र सरकार ने वक्फ कानून में कई संशोधन संसद से पारित करवाए थे . इस संशोधित वक्फ कानून को सप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी . कोर्ट ने इसपर रोके लगाने से इंकार कर दिया पर सरकार को कुछ धारायों पर फिर से विचार करने के लिए कहा. इन कानून को चुनौती देने वालों में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग भी शामिल थी . इस कानून के प्रावधान के अनुसार राज्य सरकारें जिन 11 मेम्बर वाले वक्फ बोर्डों का गठन करेगी उनमें कम से कम दो सदस्य गैर मुस्लिम होंगे तथा एक सदस्य मुसलमानों के शिया समुदाय से होगा . पिछली वाम ममार्चा सरकार ने अपने आखरी महीनों में वक्फ बोर्ड का गठन तो कर दिया पर इसमें गैर मुस्लिम तथा एक शिया मुस्लिम का स्थान खाली छोड़ दिया . चुनावों के बाद बीजेपी के एक नेता ने केरल हाई कोर्ट में इस बोर्ड के गठन को चुनौती दी. हाल ही में कोर्ट ने इस पर फैसला देते हुए कहा कि इस बोर्ड का गठन अवैध है . इसके साथ ही यह भी कहा गया कि इस बोर्ड दवारा लिए गये सभी निर्णय भी अवैध थे . इनको लागू करने पर रोक भी लगा दी. सरकार ने कोर्ट को यह लिख कर दिया कि वह जल्दी हाई नया बोर्ड गठित करेगी जो नये वक्फ के कानूनी प्रावधानों के अनुसार होगा . मुस्लिम लीग के नेताओं का कहना है कि अगर सरकार ने गठित किये जाने वाले बोर्ड के सदस्यों में दो गैर मुस्लिम तथा एक शिया मुस्लिम को नामजद किया तो वह इसका डटकर विरोध करेगी . इस मुद्दे लो लेकर मुस्लिम लीग का रुख सरकार से टकराने जैसा है .
दूसरा बड़ा मुद्दा, जिसपर मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस का टकराव है , वह है सरकार की नई शराब नीति . केरल देश के उन राज्य में सबसे आगे है जहाँ शराब की खपत सबसे अधिक है. सरकार को इस पर आबकारी कर से बड़ा राजस्व मिलता है . उधर मुस्लिम लीग की घोषित नीति यह है कि राज्य में शराबबंदी लागू की जाये . चुनावों इनके नेताओं ने बार कहा था कि अगर मोर्चे की सरकार आई तो राज्य में पूर्ण शराब बंदी की नीति अपनाई जायेगी . लेकिन कुछ समय पहले मंत्रिमंडल ने निर्णय किया कि शराब की कुछ किस्मों पर आबकारी कर कम कर दिया जाये . ये वे किस्में थी जिसकी राज्य में सर्वाधिक खपत है . इसको निर्णय का उद्देश्य शराब की इन किस्मों की बिक्री को बढ़ावा देना है ताकि सरकार को अधिक राजस्व मिल सके . यह बात अब किसी से छिपी नहीं हुई है कि मुस्लिम लीग के मंत्रियों ने मंत्रिमंडल की बैठक में इस निर्णय का विरोध किया था।
केंद्र की नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए कई गैर बीजेपी सरकारों ने विरोध किया था इसमें पश्चिम बंगाल तथा तमिलनाडु शामिल थे . इस नीति अनुसार जो राज्य सरकारें त्रिभाषी फोर्मुले को लागू करेंगे उनका अलग से लगभग दो हज़ार करोड़ का अनुदान दिया जायेगा .तब केरल की वाम मोर्चा साकार ने पहले तो इसका विरोध किया फिर इसे लागू करने पर सहमत हो गई . इस मुद्दे को लेकर विधान सभा में लम्बी बहस हुई थी मुस्लिम लीग सहित संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे के संही घटकों ने इसका विरोध किया था . उन्होंने ने यहाँ तक कहा था कि अगर राज्य में उनकी सरकार आई तो वह इस निर्णय को अरब सागर के पानी में फैंक देगी . जब नई सरकार ने इस निर्णय को जारी रखने का निर्णय किया तो मुस्लिम लीग ने इसका विरोध किया . उनका कहना है कि सरकार का यह निर्णय मोर्चे की घोषित नीतियों के विपरीत है . सरकार को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए . राज्य की राजनीति के जानकारों का कहना है कि अगर इन मुद्दों को जल्दी ही सुलझाया नहीं गया तो मामला गंभीर रूप ले सकता है। (लेखक के अपने विचार हैं)