
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
www.daylifenews.in
देश में पुण्य दायिनी नदी गंगा के बाद दूसरी प्रमुख नदी यमुना का प्रदूषण चर्चा का विषय बना हुआ है। कारण उसका प्रदूषण खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। कारण उसका 85 फीसदी से ज्यादा प्रदूषण बिना ट्रीट किये घरेलू कचरे और औद्योगिक रसायन युक्त अपशिष्ट से है। इस बारे में दिल्ली सरकार बरसों से दावे-दर-दावे करती रही है। बीता इतिहास इसका जीता- जागता सबूत है। केजरीवाल ने भी यमुना के शुद्धिकरण का बीड़ा उठाया था। उनके भी कार्यकाल ने यमुना की सफाई की दिशा में दावों और घोषणाओं के मामले में काफी सुर्खियां बटोरी थीं और आलोचनाएं भी झेली थीं। अब यदि दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सरकार के जल संसाधन मंत्री प्रवेश साहिब सिंह वर्मा की मानें तो अब यमुना की सफाई अलग-अलग परियोजना के माध्यम से नहीं, वरन दिल्ली की पूरी सीवर अवसंरचना में व्यापक बदलाव के जरिये की जा रही है। उनका मानना है कि यमुना तब साफ होगी जबकि हर घर सीवर नेटवर्क से जुड़ा होगा। हर बूंद सीवेज का उपचार होगा। इसी बदलाव की शुरुआत हमने की है। ये रहा उनका दावा। अब जरा हालात का भी जायजा लें। सबसे पहले देश की पतितपावनी और मुक्तिदायिनी नदी गंगा को लें जिसका जल पुण्य का सबब माना जाता है। वही मोक्षदयिनी नदी गंगा अपने मायके उत्तराखंड में ही मैली है। इसका खुलासा कैग की रिपोर्ट कर ही चुकी है। आज तक 1985 से लेकर गंगा प्रदूषण मुक्ति हेतु 42,000 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है। गंगा एक्शन प्लान पर शुरुआत में ही 1200 करोड़ की राशि खर्च की गयी। लेकिन हालात गवाह हैं कि आज उसका जल पुण्य का नहीं, मौत का सबब बन गया है।

अब देश की राजधानी दिल्ली की जीवन रेखा कही जाने वाली यमुना की बात करें। यमुना आज तमिलनाडु की कूवन नदी सहित देश की सबसे प्रदूषित नदी है। उसकी सफाई पर अब तक हुए खर्च की बात करें तो संसद में दिये आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कुल 5,536 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है। जबकि यमुना संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर पहले ही लगभग 1,951 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी थी। इसके अलावा दिल्ली सरकार के ग्रीन बजट के तहत दिल्ली जल बोर्ड को 6485 करोड़ रुपए की राशि दी गयी और अभी हाल फिलहाल में ही दिल्ली सरकार ने यमुना की सफाई के लिए 4500 करोड़ की राशि की मंजूरी दी है। यही नहीं यमुना के जल को साफ करने के साथ साथ नजफगढ ड्रेन की सफाई के लिए 1000 करोड़ की परियोजनाओं को दिल्ली सरकार ने और मंजूरी दी है। इसके बावजूद हकीकत में यमुना आजकल गंदगी और दुर्गंध से बजबजा रही है। वह जहरीली हो गयी है। अब सवाल यह उठता है कि इतनी भारी-भरकम राशि खर्च करने के बाद भी यमुना मैली क्यों है? आज भी वह अपने ताड़नहहार की बाट क्यों जोह रही हैं और कौन भगीरथ आयेगा जो उसे प्रदूषण के दानव से छुटकारा दिलायेगा?
असलियत में यमुना की हालत तो इतनी खराब है कि वह सीवेज और कारखानों के रासायनिक अपशिष्ट से इतनी विषैली है कि प्राणी मात्र और जलजीवों की सेहत के लिए भी जानलेवा साबित हो रही है। यहां तक यमुना की मछलियां भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रही हैं। बीते साल टेरी और हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध में इसका खुलासा हुआ है। शोध के अनुसार यहां की मछलियां खाने से या इसका पानी पीने से हारमोनल असंतुलन, पाचन तंत्र में सूजन और कोशिकाओं को भारी नुकसान हो सकता है। इसका अहम कारण मछलियों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा का अधिकाधिक पाया जाना है। सबसे अधिक 751 माइक्रोप्लास्टिक के कण मछलियों के पाचनतंत्र में मिले हैं।मछलियों के गलफडों में 605 और मांसपेशियों में 322 कण मिले हैं। इसके अलावा मछलियों के खाये जाने वाले हिस्से में भी माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले हैं।मछलियों में मिले माइक्रो प्लास्टिक में 77.8 फीसदी हिस्सा कपड़ों और धागे के सूक्ष्म रेशों का था। इसका मुख्य कारण सिंथेटिक कपड़े, घरेलू धुलाई, टैक्सटाइल उद्योग और रसायन युक्त अपशिष्ट जल का बहाव है। चिंताजनक बात यह है कि प्लास्टिक पर चिपके जहरीले रसायन शरीर में पहुंच कर गंभीर बीमारियां पैदा कर सकते हैं। यहां तितलियों और रोहू मछली में भी माइक्रोप्लास्टिक के कण पाये गये हैं।

अब जरा यमुना के पानी में जहरीले रसायनों की बात करें तो पाते हैं कि हकीकत में यमुना के पानी में अमोनिया की सीमा अधिकांश एसटीपी को भी बाधित करती है। बी ओ डी का स्तर स्वीकार्य सीमा से अधिक है और घुलित आक्सीजन का स्तर अक्सर 2 मिलीग्राम प्रति लीटर से भी कम होने से जलीय जीवों के अस्तित्व के लिए खतरा बना हुआ है। मानव और पशु मल-मूत्र से आने वाले वैक्टीरिया का स्तर सीमा से 32,000 गुणा से भी ज्यादा है। यह खतरे का संकेत है। दरअसल कारखानों और सीवेज के जरिये आने वाले अमोनिया और फास्फेट जैसे रसायनों के तत्व जहरीले झाग बनाते हैं। इससे सांस लेने में जहां दिक्कत आती है, वहीं गले में सूजन के साथ-साथ गले का संक्रमण भी होता है। फिर क्रोमियम,सीसा, तांबा और अन्य धातुएं शरीर में पहुंच कर तंत्रिका तंत्र को कमजोर करते हैं और कैंसर, किडनी और लिवर रोग की भयावहता के कारण भी बनते हैं। वैसे तो यमुना की दशा पूरे प्रवाह क्षेत्र में शोचनीय है लेकिन यदि देश की राजधानी दिल्ली के 22 किलोमीटर इलाके की ही बात करें तो यमुना अपनी बदहाली की कहानी खुदबखुद बयां करती है। यहां का जल फीकल कोलिफार्म, लैड जैसी भारी धातुओं और डिटर्जेंट से इतना प्रदूषित है कि इसके संपर्क में आने से लोग कैंसर, गंभीर त्वचा रोग, सांस, पेट के संक्रमण, लिवर, तंत्रिका तंत्र आदि जानलेवा रोगों का शिकार हो रहे हैं।
विडम्बना देखिए कि देश की सुप्रीम अदालत नौ साल पहले ही आदेश दे चुकी है कि नदियों में शोधन के बगैर सीवेज न बहाया जाये। लेकिन दुखद यह है कि इसके बावजूद न राज्य सरकारों पर इसका कोई असर पड़ा और न ही सीवेज निस्तारण करने वाली एजेंसियों पर कि वह इस मामले पर कारगर कदम उठातीं। नतीजा यह है कि नदियों का प्रदूषण लोगों को जानलेवा बीमारियों की सौगात देकर उन्हें मौत के मुंह में ढकेल रहा है।
यमुना के संदर्भ में कहा जाता है कि यमुना तभी साफ हो सकती है जबकि उसमें गिरने वाले नालों के प्रदूषित पानी को रोका जाये। जबकि हकीकत यह है कि देश में यमुना ही नहीं , मोक्षदायिनी गंगा सहित वह चाहे वरुणा हो या रोहिणी, पांडु, ईशन, सई, घाघरा, काली, गोमती, रामगंगा, कोसी, राप्ती, तमसा, सरयू, नीमा, बीटा, सेंगर, अरिंद, सरायन, करवन, काक, उल्ल जैसी देश की तकरीब चार सौ से अधिक नदियों में सीवेज का गंदा पानी 1385 से भी ज्यादा गंदे नालों के जरिए बहाये जाने के मामलों में बीते बरसों में बेतहाशा बढ़ोतरी देखी गयी है। फिर भी देश के भाग्य विधाता मौन हैं।

दिल्ली में यमुना को विषाक्त करने में नजफगढ़ और शाहदरे के नालों की अहम भूमिका है। साथ ही हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आकर इसमें गिरने वाले नालों का योगदान भी यमुना को प्रदूषित करने में कम नहीं है। अब दावा किया जा रहा है कि नजफगढ़ ड्रेन की पिछले एक साल से की जा रही सफाई से यमुना के प्रदूषण के स्तर में कमी आई है। दिल्ली सरकार दावा कर रही है कि यमुना की सफाई हेतु आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है और इसमें मिलने वाले नालों पर विकेंद्रित सीवेज उपचार संयंत्र (एसटीपी) लगाने की योजना बनायी गयी है।13 डीएसटीपी लगाये जाने हैं। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की मानें तो अब नजफगढ़ और शाहदरा नाले के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और हरियाणा से यमुना में गिरने वाले नालों के पानी की गुणवत्ता की रिपोर्ट से अब नदी की सफाई के लिए अधिक प्रभावी रणनीति बनायी जा सकेगी। लेकिन जबतक हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आकर यमुना में गिरने वाले नालों की सफाई नहीं होगी, उनपर अंकुश नहीं लगेगा, तबतक यमुना की सफाई की उम्मीद बेमानी है।

जहां तक यमुना में गिरने वाले नालों के पानी में बी ओ डी का सवाल है, नजफगढ़ नाले के पानी में बीओ डी का स्तर निर्धारित मानक यानी 30 मिलीग्राम प्रति लीटर की तुलना में दोगुणे से अधिक यानी 64 मिलीग्राम प्रति लीटर है। कुल निलंबित ठोस टी एस एस का भी स्तर निर्धारित मानक 100 मिलीग्राम प्रति लीटर के मुकाबले 108 मिलीग्राम प्रति लीटर है। वहीं शाहदरा नाले में गाजियाबाद जिले के बंथला , इंद्रपुरी और साहिबाबाद नाले आकर मिलते हैं। इन तीनों नालों से गाजियाबाद का प्रदूषित पानी शाहदरा नाले से होकर यमुना में गिर रहा है। इस बाबत बीते दिनों केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यमुना सफाई को लेकर तीनों राज्यों यथा दिल्ली , उत्तर प्रदेश और हरियाणा को समन्वय के साथ काम करने का निर्देश दिया है। अब सवाल यह है कि यमुना बरसों से निर्देशों, दावों के जाल में उलझी है। पिछले मुख्यमंत्री तो यमुना साफ होगी और वे उसमें नहाने के दावे करते-करते पद से ही मुक्त हो गये, कोई यमुना को टेम्स बनाने का दावा करते-करते दुनिया से ही विदा हो गया, लेकिन यमुना अपनी बदहाली पर दशकों से रो रही है। सरकारें तो सरकारें लगता है, दिल्ली की जनता की आत्मा मर गयी है। उसको अपनी जीवन की रेखा कही जाने वाली यमुना की बदहाली की कोई चिंता ही नहीं है। वह हर पांच साल बाद वोट देकर फिर सो जाती है और यमुना के नाम पर मिलने वाली राशि किसका विकास करती है, वह कहां जाती है, यह समझ से परे है। जबकि यमुना फिर भी मैली की मैली ही रहती है। ऐसा लगता है देश की दूसरी प्रदूषित नदियों की तरह ही यमुना की यह नियति ही है। (लेखक के अपने विचार हैं)