विकास की अंधी दौड़ और अस्तित्व के संकट के बीच खड़ी मानव सभ्यता – डा. संजय राणा

मानव खुद के बनाए जाल में फंस गया है?
लेखक : डा. संजय राणा
लेखक पर्यावरणविद एवं एस्रो के निदेशक हैं।
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मानव सदियों से प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का सपना देखता आया है। प्रकृति की शक्तियों को अपने नियंत्रण में करने और उसके संसाधनों पर राज करने की इच्छा शायद मानव स्वभाव का हिस्सा बन चुकी है। उसने जंगलों को काटकर शहर बनाए, नदियों को बांधा, पहाड़ों को काटकर सड़कें और सुरंगें बनाईं, समुद्र को पीछे हटाकर बस्तियां बसाईं और विज्ञान एवं तकनीक के माध्यम से यह भ्रम पाल लिया कि वह प्रकृति को अपने अनुसार चला सकता है।
लेकिन इसी यात्रा में वह एक मूल सत्य भूल गया कि—“प्रकृति से मानव है, न कि मानव से प्रकृति।”
विश्व में न जाने कितनी सभ्यताएं आईं और इतिहास का हिस्सा बन गईं। साम्राज्य बने, उनका विस्तार हुआ और फिर वे समाप्त हो गए। शहर बसे और उजड़ गए। लेकिन इन सभी सभ्यताओं में यदि दो समानताएं दिखाई देती हैं तो पहली है—मानवीय स्वभाव और दूसरी है—प्रकृति की अपनी व्यवस्था। मानव बार-बार प्रकृति को चुनौती देता रहा और प्रकृति ने बार-बार उसे उसकी सीमाओं का एहसास कराया। आज आधुनिक सभ्यता भी शायद उसी निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। अंतर केवल इतना है कि इस बार मानव ने जो जाल बुना है, वह पहले से कहीं अधिक बड़ा, जटिल और खतरनाक है। मानव ने विकास का ऐसा दोमुंहा नाग पकड़ लिया है जिसे छोड़ना भी कठिन है और पकड़े रखना भी। एक तरफ ऊर्जा, भोजन, रोजगार, उद्योग, परिवहन और आर्थिक समृद्धि की जरूरत है। दूसरी तरफ इन्हीं जरूरतों को पूरा करने के लिए पृथ्वी के सीमित संसाधनों का लगातार दोहन किया जा रहा है। यदि मानव इसी गति से प्रकृति का दोहन करता रहा तो जंगल, नदियां, मिट्टी, भूजल,जैव – विविधता और जलवायु— सभी पर दबाव बढ़ेगा। लेकिन यदि वह अचानक विकास की गति रोक देता है तो करोड़ों-करोड़ लोगों की अर्थव्यवस्था, रोजगार और जीवन-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। यही आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
जिस विकास से मानव समृद्ध होना चाहता है, वही विकास यदि प्रकृति की कीमत पर होगा तो भविष्य की समृद्धि की जमीन ही समाप्त कर देगा।
*ऊर्जा चाहिए, लेकिन उसकी कीमत कौन चुकाएगा? मानव की सबसे बड़ी आधुनिक आवश्यकता ऊर्जा है। ऊर्जा प्राप्त करने के लिए उसने अनेक रास्ते खोजे हैं—कोयला, तेल, गैस, जल – विद्युत, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा। लेकिन ऊर्जा का कोई भी स्रोत पूरी तरह पर्यावरण-मुक्त नहीं है। कोयले से बनने वाली बिजली कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाती है। दूसरी ओर कोयले के लिए खनन आवश्यक है, जिसके लिए भूमि परिवर्तन, वन क्षेत्र पर दबाव और पारिस्थितिक क्षति जैसी समस्याएं सामने आती हैं। जल- विद्युत को स्वच्छ ऊर्जा के विकल्प के रूप में देखा जाता है, लेकिन बड़े बांधों के निर्माण से नदियों का प्राकृतिक प्रवाह, तलछट, जलीय पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदाय प्रभावित हो सकते हैं। सौर ऊर्जा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए महत्वपूर्ण विकल्प है, लेकिन बड़े पैमाने पर सौर परियोजनाओं के लिए भूमि की आवश्यकता होती है। यदि परियोजनाओं का नियोजन संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों या कृषि एवं वन भूमि को ध्यान में रखे बिना किया जाए तो नई पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो सकती हैं। सौर पैनलों के निर्माण, उनके जीवन-चक्र और भविष्य में उनके कचरे के प्रबंधन की चुनौती भी सामने है।
इसी प्रकार पवन ऊर्जा जीवाश्म ईंधनों का विकल्प है, लेकिन बड़े पवन संयंत्रों के लिए बुनियादी ढांचा, भूमि और सामग्री की आवश्यकता होती है तथा पुराने उपकरणों और उनके ब्लेड के पुनर्चक्रण की चुनौती भी है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि सौर या पवन ऊर्जा खराब है। सवाल यह है— क्या हम ऊर्जा परिवर्तन ऐसा कर सकते हैं जिसमें जलवायु संकट कम हो, लेकिन प्रकृति पर नया अनावश्यक बोझ न पड़े? हमें ऊर्जा चाहिए, लेकिन ऐसी ऊर्जा व्यवस्था चाहिए जो प्रकृति की कीमत पर भविष्य न खरीदे।
*भोजन की तलाश में मिट्टी और पानी को न खो दें। मानव की दूसरी सबसे बड़ी आवश्यकता भोजन है। विश्व की बढ़ती आबादी के पेट को भरने के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है। इसी आवश्यकता ने पारंपरिक खेती की जगह अधिक उत्पादन वाली कृषि व्यवस्था को बढ़ावा दिया। रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई और भूजल पर निर्भरता बढ़ती गई। लेकिन समस्या यह है कि अधिक उत्पादन की दौड़ में यदि मिट्टी की उर्वरता, भूजल और जैव-विविधता ही समाप्त होने लगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए भोजन कहां से आएगा?
एफ ए ओ के अनुसार कृषि वैश्विक मीठे पानी की निकासी का 70 प्रतिशत से अधिक उपयोग करती है। अनुचित कृषि प्रबंधन मिट्टी के क्षरण और जल की गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है। अर्थात आज की खाद्य सुरक्षा और कल की खाद्य सुरक्षा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जिस मिट्टी को हमने उत्पादन का साधन समझ लिया है, वह वास्तव में हमारी सभ्यता की जीवन-रेखा है। मिट्टी मरी तो खेती मरेगी। खेती मरी तो भोजन संकट आएगा। और भोजन संकट अंततः सामाजिक और आर्थिक संकट में बदल सकता है।
*पर्यटन भी प्रकृति पर बोझ बन रहा है। विश्व के अनेक देशों में पर्यटन रोजगार और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। लेकिन बढ़ती जनसंख्या और बढ़ती पर्यटन गतिविधियों के साथ प्रकृति पर दबाव भी बढ़ रहा है।
लोग नदियों, तालाबों, झीलों, जंगलों और पहाड़ों के और निकट बस रहे हैं। होटल, सड़कें, पार्किंग, भवन और अन्य निर्माण प्राकृतिक क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहे हैं हिमालय इसका सबसे संवेदनशील उदाहरण है। हिमालय केवल पहाड़ नहीं है। यह करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा, नदियों और जैव-विविधता का आधार है। लेकिन वहां विकास के नाम पर सड़क चौड़ीकरण, निर्माण, सुरंग, बांध, अनियोजित पर्यटन और अन्य गतिविधियां उस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा रही हैं।हाल के वर्षों में केदारनाथ, रेणी, धराली, थराली और नेपाल सहित हिमालयी क्षेत्रों में सामने आई घटनाओं ने हमें बार-बार चेताया है कि पहाड़ों की अपनी भौगोलिक सीमाएं हैं। मगर हर आपदा को केवल “प्राकृतिक आपदा” कहकर आगे बढ़ जाना अब पर्याप्त नहीं है। प्राकृतिक घटनाएं अपनी जगह हैं, लेकिन मानव की गलत योजना और अत्यधिक हस्तक्षेप कई बार उनके प्रभाव को आपदा में बदल रही हैं। प्रकृति खतरनाक संकेत दे रही है, लेकिन हमारी गलत योजना उस खतरे की भयावहता बढ़ा रही है।
*कार्बन किसी देश की सीमा नहीं मानता। जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसका कारण और उसका प्रभाव एक ही स्थान पर होना आवश्यक नहीं। किसी एक देश में उत्सर्जन बढ़ता है, लेकिन उसके प्रभाव का सामना दूसरे देश का किसान, मजदूर, पहाड़ी गांव या तटीय शहर भी कर सकता है। जिसका ताजा उदाहरण नेपाल है अगर नेपाल का कार्बन उत्सर्जन का आंकड़ा देखे तो वह न्यूनतम पर है मगर 26 अगस्त की त्रासदी ने सिद्ध कर दिया कि कार्बन उत्सर्जन के असर की सीमा कोई नहीं है।
*किसी देश की हिस्सेदारी कम है या अधिक—प्रकृति इसके आधार पर अपना व्यवहार नहीं बदलती। प्रकृति पासपोर्ट नहीं मांगती। आईपीसीसी के अनुसार मानव गतिविधियों से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन वैश्विक तापवृद्धि का प्रमुख कारण है और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दुनिया के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई दे रहे हैं। इसलिए जलवायु संकट केवल पर्यावरण का विषय नहीं है।यह भोजन का प्रश्न है।यह पानी का प्रश्न है।यह स्वास्थ्य का प्रश्न है। यह रोजगार का प्रश्न है।
यह अर्थव्यवस्था का प्रश्न है।
और अंततः यह मानव अस्तित्व का प्रश्न है।
*जीडीपी बढ़ी, लेकिन क्या जीवन बेहतर हुआ? शायद आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी भूल यह है कि हमने विकास को जीडीपी के आंकड़ों से मापना शुरू कर दिया। जीडीपी बढ़ी—विकास।सड़कें बढ़ीं—विकास।
इमारतें बढ़ीं—विकास।
उद्योग बढ़े—विकास।लेकिन क्या भूजल घटने के बाद भी विकास है?क्या जंगल कटने के बाद भी विकास है?क्या नदी प्रदूषित होने के बाद भी विकास है?क्या मिट्टी की उर्वरता समाप्त होने के बाद भी विकास है?क्या पहाड़ असुरक्षित होने के बाद भी विकास है?क्या ग्लेशियरों का तेजी से पिघलाना भी विकास है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या आने वाली पीढ़ियों के हिस्से के संसाधन खर्च करके आज की जीडीपी बढ़ाना वास्तव में विकास है?हमें विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करना ही होगा।
विकास वह नहीं जिसमें केवल मनुष्य की आर्थिक क्षमता बढ़े और प्रकृति, जीव-जंतु तथा आने वाली पीढ़ियां उसकी कीमत चुकाएं।
*प्रकृति को बचाने वाला समाज या लोग विकास विरोधी क्यों?
इस पूरी कहानी में सबसे विचित्र स्थिति प्रकृति संरक्षण कार्यकर्ताओं की है:- जो व्यक्ति नदी को बचाने की बात करता है, उसे विकास विरोधी कहा जाता है।जो जंगल बचाने की बात करता है, उसे प्रगति में बाधा माना जाता है।जो पहाड़ की वहन क्षमता की बात करता है, उसे पर्यटन विरोधी कहा जाता है।
कई बार पर्यावरण के पक्ष में आवाज उठाने वालों को देशविरोधी तक कह दिया जाता है।लेकिन हमें यह सवाल पूछना होगा—वास्तव में देशहित में कौन है?वह व्यक्ति जो आज चेतावनी दे रहा है कि नदी को मत मारो, जंगल मत काटो, पहाड़ को मत खोखला करो और मिट्टी-पानी को नष्ट मत करो?या वह व्यवस्था जो इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर आने वाली पीढ़ियों को संकट में धकेल रही है? प्रकृति संरक्षण कार्यकर्ता विकास का दुश्मन नहीं है।वह विकास की दिशा पर सवाल उठाने वाला प्रहरी है।
वह पूछता है—विकास किसके लिए और किस कीमत पर?
अब प्रकृति को जीतना नहीं, उसके साथ जीना सीखना होगा।
मानव प्रकृति पर विजय नहीं पा सकता। वह कुछ समय के लिए उसकी शक्तियों को नियंत्रित करने का भ्रम पैदा कर सकता है, लेकिन प्रकृति के मूल नियमों को समाप्त नहीं कर सकता। नदी को अपना प्रवाह चाहिए। जंगल को अपनी जगह चाहिए।मिट्टी को जीवित रहने का अवसर चाहिए।
पहाड़ को अपनी स्थिरता चाहिए।
समुद्र को अपना विस्तार चाहिए।
और मनुष्य को इन सभी की आवश्यकता है।इसलिए प्रकृति संरक्षण कोई भावुकता नहीं है। यह मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। अब विकास रोकने की नहीं, विकास की दिशा बदलने की जरूरत है। हमें ऐसी ऊर्जा चाहिए जो कम से कम पर्यावरणीय क्षति के साथ हमारी जरूरतें पूरी करे।ऐसी कृषि चाहिए जो उत्पादन के साथ मिट्टी और पानी को भी बचाए।ऐसा पर्यटन चाहिए जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करे लेकिन प्रकृति की वहन क्षमता को न तोड़े। ऐसे शहर चाहिए जहां कंक्रीट के साथ जल, हरियाली और खुली जमीन के लिए भी जगह हो।और ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें जीडीपी के साथ प्राकृतिक पूंजी, जल सुरक्षा, मिट्टी की सेहत, जैव-विविधता और मानव कल्याण भी विकास के पैमाने हों। क्योंकि पृथ्वी हमारी संपत्ति नहीं है। हम पृथ्वी के मालिक नहीं हैं। हम इस पृथ्वी का केवल एक हिस्सा हैं। हमसे पहले भी सभ्यताएं थीं।हम आज हैं।
हमारे बाद आने वाली पीढ़ियां भी होंगी। प्रश्न यह नहीं है कि मानव प्रकृति को जीत सकता है या नहीं।प्रश्न यह है—क्या मानव अपनी ही बनाई विकास की दौड़ से समय रहते बाहर निकल पाएगा? क्योंकि यदि हमने विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया, तो संभव है कि आने वाली पीढ़ियां हमारी सभ्यता को उस सभ्यता के रूप में याद करें जिसने विज्ञान और तकनीक में अभूतपूर्व प्रगति की, लेकिन अपने अस्तित्व की बुनियादी शर्तों को ही नष्ट कर दिया। और तब शायद प्रकृति को बचाने के लिए कोई मानव नहीं बचेगा। इसलिए चेतावनी आज ही समझनी होगी।प्रकृति से मानव है, न कि मानव से प्रकृति।
प्रकृति को बचाना पृथ्वी को बचाना नहीं है। प्रकृति को बचाना स्वयं मानव को बचाना है। (लेखक के अपने विचार हैं)

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