
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
www.daylifenews.in
दक्षिण के राजनीतिक नजरिये से महत्वपूरण राज्य तमिलनाडु में विधान सभा चुनावों के बाद जब सत्ता में बदलाव आया और दो सिर्फ दो वर्ष पुरानी टी.वी.के. ने राज्य में पहली बार सरकार बनाई है, यहाँ कीराजनीति में लागतार बदलाव आ रहे हैं। राज्य में राजनीतिक समीकरण बदल रहे है। अभिनेता से राजनेता बने सी जोसेफ विजय अपने राजनीतिक सलाहकारों से मिलकर अपनी स्थिति मजबूत करने में लगे हैं . ऐसा लग रहा है कि वे धीरे धीरे राष्ट्रीय राजनीति में अपना स्थान बनाना चाहते है।
हालाँकि उनकी पार्टी अभी तक किसी राष्ट्रीय गठबंधन में शामिल नहीं हुई है लेकिन अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि वर्त्तमान में सबसे अधिक कांग्रेस के नज़दीक है तथा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि निकट भविष्य में उनकी यह नई पार्टी कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन में शामिल हो जाये। इस समय दमुक इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। जब तक द्रमुक इंडिया गठबंधन से अलग नहीं हो होती तब तक टी. वी. के इसमें शामिल होने की संभावना नहीं के बराबर है। विजय एक से अधिक बार कह चुके हैं कि अगर राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में बदलाव आता है तो वे और उनकी पार्टी राहुल गाँधी को देश का प्रधानमंत्री बनते देखना चाहेगी। दक्षिण के इस राज्य में द्रमुक कई दशकों से कांग्रेस के साथ रही है। कांग्रेस ने अपने को इस राज्य में द्रमुक का जूनियर पार्टनर बनने से परहेज़ नहीं किया। विधानसभा चुनावों से पूर्व केवल एक चुनावी सर्वेक्षण संस्थान को छोड़ कर सबने यह कहा था द्रमुक गठबंधन लगातार दूसरी बार सत्ता में आ सकता है। इन सर्वेक्षणों में यह गया था कि टी. वी. के , को 20-25 से अधिक सीटें नहीं मिलेगी। केवल एक संस्थान के चुनावी सर्वेक्षण में कहा गया था कि इस बार राज्य में टी.वी.के. को लगभग 100 सीटें मिलेंगी . वह सबसे बड़े दल के रूप में सामने आएगा तथा उसके राज्य में सरकार बनने की संभावना अन्य दलों अधिक है।
टी.वी. के को कुल 108 मिलीं जो बहुमत से केवल 11 सीटें कम थीं। द्रमुक का फिर सत्ता में लौटने सपना टूट गया। यहाँ तक कि उस समय राज्य के मुख्यमंत्री रहे एम .के स्टालिन भी चुनाव हार गए। कांग्रेस की सीटें 18 से घट 6 गईं। यह माना जाता है कि इस स्थिति में कांग्रेस ने द्रमुक के साथ अपना लगभग चार दशक पुराना रिश्ता तोड़ दिया तथा टी.वी.के. साथ जाने का निर्णय किया। इसके एक विधायक को मंत्री भी बना दिया गया। इसके स्थान राज्य सभा के चुनावों में एक सीट देने का वायदा भी किया गय। इसके चलते कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं ने सीपीआई , सीपीआई (एम) तथा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को भी टी. वी .के. का समर्थन जुटाने में बड़ी भूमिका निभाई। इससे इस नई पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल गया। यहाँ तक कि प्रमुख विपक्षी दल अन्नाद्रमुक के लगभग दो दर्जन विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन करके विश्वास मत के दौरान सरकार का समर्थन किया। बाद में अन्नाद्रमुक के एक दर्ज़न विधायकों ने टी.वी . के में शामिल होने का लिए विधान सभा अध्यक्ष को पत्र लिखा। योजना यह थी कि दल बदल कानून के अंतर्गत जब उनकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी तो वे टी. वी .के की टी टिकेट पर फिर विधानसभा में लौट आएंगे। लेकिन एक कानून अड़चन के कारण अध्यक्ष ने इनका इस्तीफ़ा मंजूर करने से इंकार कर दिया। इन सभी विधायकों के खिलाफ चुनावी याचिकाएं अदालत में लंबित थी। अध्यक्ष का तर्क यह था कि जब तक इस याचिका पर फैसला नहीं होता तब तक वे उनका इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं कर सकते। क्योंकि उप चुनाव अदालत के निर्णय पर निर्भर हैं।
उधर कांग्रेस से नाराज़ द्रमुक पार्टी के नेताओं ने इस पार्टी के साथ अपना रिश्ता तोड़ने का निर्णय किया। हालाँकि अभी द्रमुक ने इंडिया गठबंधन से अपने आप को अलग नहीं किया लेकिन विधान सभा चुनावों के बाद इंडिया गठबन्धन की किसी बैठक में भाग नहीं लिया। ऐसा माना जाता है कि धीरे-धीरे द्रमुक बीजेपी के निकट जा रही है। इसके नेता बार यह बात कह रहे हैं कि उनकी पार्टी मुद्दों के आधार पर केंद्र में एन.डी.ए . सरकार का समर्थन कर सकती है। लोकसभा तथा विधानसभा के चुनावों क्षेत्रों के परिसीमन को लेकर सरकार एक बार फिर संसद में संविधान संशोधन प्रस्ताव लाने के तैयारी कर रही है। इसके लिए अभी उनके पास पर्याप्त सदस्यों का समर्थन अभी नहीं है। ऐसा माना जाता है कि द्रमुक इस मामले में सरकार का साथ दे सकती है। द्रमुक के इस समय लोकसभा में 22 सदस्य है तथा राज्य सभा इनके 8 सदस्य है। नई पार्टी के रूप में टी.वी. के पास दोनों सदनों में एक भी सदस्य नहीं है। (लेखक के अपने विचार हैं)