बप्पा रावल से पहले का चित्तौड़गढ़

पुरातात्विक प्रमाणों में दुर्ग-पूर्व बस्ती, मध्यमिका-नगरी और मौर्य–मोरी संदर्भों की खोज
लेखक : श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
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प्रस्तावना: चित्तौड़गढ़ का नाम भारतीय इतिहास में प्रायः बप्पा रावल, मेवाड़, राजपूत सत्ता और चित्तौड़ दुर्ग के गौरव से जोड़ा जाता है। किंतु पुरातत्व का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या चित्तौड़ का इतिहास वास्तव में बप्पा रावल के समय से आरंभ होता है? उपलब्ध पुरातात्विक, अभिलेखीय, मुद्राशास्त्रीय और साहित्यिक प्रमाण इस धारणा को स्वीकार नहीं करते। चित्तौड़ की पहाड़ी पर दुर्ग-निर्माण से पहले भी मानव बस्ती और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं। इसके अतिरिक्त चित्तौड़ के निकट स्थित प्राचीन नगरी, जिसे अभिलेखों और सिक्कों में मध्यमिका अथवा मज्झिमिका से जोड़ा गया है, इस पूरे क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को समझने की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी प्रस्तुत करती है। इस शोध का उद्देश्य चित्तौड़ के इतिहास को किसी एक राजवंश या एक धार्मिक परंपरा तक सीमित करना नहीं, बल्कि पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर उसके दीर्घकालीन सांस्कृतिक विकास को समझना है। विशेष रूप से यह लेख बौद्धकालीन, मौर्यकालीन और अशोककालीन संदर्भों को अलग-अलग स्तरों पर देखने का प्रयास करता है, क्योंकि “बौद्धकालीन” और “अशोककालीन” को एक ही अर्थ में प्रयोग करना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है।
चित्तौड़ की पहाड़ी पर दुर्ग से पहले की बस्ती: चित्तौड़ दुर्ग की पुरातात्विक खुदाइयाँ इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की 1957–58 तथा 1958–59 की उत्खनन रिपोर्टों में दुर्ग की सुरक्षा-दीवारों से नीचे स्थित ऐसे सांस्कृतिक निक्षेपों का उल्लेख मिलता है जो दुर्ग-निर्माण से पहले की मानव बस्ती की ओर संकेत करते हैं। उत्खनन में प्राकृतिक धरातल तक पहुँचने पर “पूर्व-दुर्ग” अर्थात् pre-defence deposit की पहचान की गई। इस पूर्व-दुर्ग स्तर को दो उप-कालों में विभाजित किया गया था। पहले स्तर में प्राकृतिक धरातल पर स्थित फर्श मिला, जबकि दूसरे स्तर में पूर्व-पश्चिम दिशा में बनी दीवार तथा नष्ट हो चुकी संरचनाओं के अवशेष मिले। इसके बाद विकसित हुई प्रारंभिक रक्षात्मक संरचनाओं में मिट्टी की प्राचीर और बाहर की ओर पकी ईंटों से सुदृढ़ीकरण के प्रमाण मिले। इसका अर्थ यह है कि चित्तौड़ की पहाड़ी केवल बाद के राजकीय दुर्ग के रूप में ही उपयोग में नहीं आई थी; उससे पहले भी यहाँ मानव निवास और संरचनात्मक गतिविधियाँ थीं। यह तथ्य चित्तौड़ के इतिहास की समय-सीमा को बप्पा रावल के बहुत पहले तक पीछे ले जाता है।
मृद्भांड और प्रारंभिक सांस्कृतिक क्रम: चित्तौड़ दुर्ग की खुदाई में प्राप्त मृद्भांड-सामग्री विशेष महत्व रखती है। प्रारंभिक रक्षात्मक काल के ऊपरी उप-काल में Northern Black Polished Ware अर्थात् उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृद्भांड की उपस्थिति दर्ज की गई। ऐसी सामग्री भारतीय पुरातत्व में सामान्यतः प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन किसी एक प्रकार के मृद्भांड को देखकर सीधे किसी निश्चित सम्राट, राजवंश अथवा घटना की तिथि निर्धारित करना उचित नहीं होगा। इसलिए चित्तौड़ में NBPW की उपस्थिति को मौर्य अथवा अशोककाल का स्वतः प्रमाण कहना वैज्ञानिक दृष्टि से सावधानीहीन होगा। सही निष्कर्ष यह है कि चित्तौड़ पहाड़ी पर एक ऐसा सांस्कृतिक क्रम मौजूद था जो प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक विकसित हो चुका था और जिसकी परतों को आगे वैज्ञानिक डेटिंग तथा पुनः उत्खनन से अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
नगरी और प्राचीन मध्यमिका: चित्तौड़ के प्राचीन इतिहास की दूसरी अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी चित्तौड़ से लगभग 11 किलोमीटर उत्तर स्थित नगरी है। प्राचीन साहित्य, अभिलेखों और सिक्कों के आधार पर नगरी की पहचान प्राचीन मध्यमिका या मज्झिमिका से की जाती है। यह स्थान केवल एक सामान्य प्राचीन बस्ती नहीं था, बल्कि प्रारंभिक ऐतिहासिक राजस्थान की एक महत्वपूर्ण नगरीय-सांस्कृतिक इकाई के रूप में सामने आता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के विवरण में यहाँ प्राचीन संरचनाओं, मंदिर-अवशेषों, सिक्कों तथा बौद्ध स्तूपों का उल्लेख मिलता है। नगरी के प्राचीन अवशेष यह बताते हैं कि चित्तौड़ क्षेत्र में राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक गतिविधियाँ एक विस्तृत भू-दृश्य में फैली हुई थीं। इसलिए चित्तौड़ को केवल वर्तमान दुर्ग की सीमाओं में समझना उसके प्राचीन इतिहास को सीमित कर देना होगा।
मध्यमिका और सिबि जनपद के सिक्के: नगरी और चित्तौड़ क्षेत्र से प्राप्त प्राचीन सिक्कों पर “मज्झिमिकाय सिबि-जनपदस” अथवा इसी प्रकार की पाठ-परंपरा से जुड़े अभिलेख मिलते हैं। इन सिक्कों का महत्व इसलिए है कि वे मध्यमिका और सिबि जनपद के संबंध का प्रत्यक्ष मुद्राशास्त्रीय आधार प्रदान करते हैं। सिक्के किसी क्षेत्र की राजनीतिक पहचान, आर्थिक गतिविधि और स्थानीय सत्ता-संरचना के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि मध्यमिका केवल धार्मिक केंद्र नहीं थी, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक जीवन से जुड़ी एक संगठित नगरी थी।
हाथीबाड़ा और घोषुंडी: प्रारंभिक वैष्णव परंपरा: नगरी के निकट हाथीबाड़ा और घोषुंडी से प्राप्त अभिलेख प्रारंभिक धार्मिक इतिहास की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ब्राह्मी लिपि के अभिलेखों में संकर्षण और वासुदेव के लिए पूजा-शिला प्राकार अर्थात् पत्थर की घेराबंदी/परिसर के निर्माण का उल्लेख मिलता है। हाथीबाड़ा का अभिलेख दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास का माना गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में प्रारंभिक वैष्णव या भागवत परंपरा का महत्वपूर्ण विकास हो चुका था। यह प्रमाण इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि चित्तौड़–मध्यमिका क्षेत्र को केवल किसी एक धार्मिक परंपरा से जोड़ना ऐतिहासिक वास्तविकता को सरल बना देना होगा।
बौद्धकालीन संदर्भ: चित्तौड़–मध्यमिका क्षेत्र में बौद्ध उपस्थिति: अब प्रश्न आता है कि क्या चित्तौड़ क्षेत्र में बौद्ध धर्म की उपस्थिति थी? इसका उत्तर उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर “हाँ, इसके संकेत हैं” कहा जा सकता है, लेकिन इसके साथ प्रमाण की प्रकृति स्पष्ट करना आवश्यक है। नगरी में बौद्ध स्तूपों के अवशेषों की सूचना पुरातात्विक अध्ययनों में मिलती है। कुछ पुराने अध्ययनों में नगरी से प्राप्त एक खंडित ब्राह्मी अभिलेख को सभी प्राणियों के प्रति करुणा जैसी भावना से संबंधित माना गया और लेखक ने इसे बौद्ध प्रभाव की संभावित अभिव्यक्ति के रूप में देखा। किंतु इस व्याख्या को निर्णायक प्रमाण की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। अधिक सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि नगरी में बौद्ध स्थापत्य के अवशेष और बौद्ध उपस्थिति के संकेत मिले हैं तथा यह क्षेत्र धार्मिक रूप से बहुल था।
बौद्धकालीन और अशोककालीन एक ही बात नहीं: इस विषय में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है। बौद्ध धर्म की उपस्थिति को सीधे अशोक के शासनकाल से जोड़ देना उचित नहीं है। बौद्ध धर्म अशोक से पहले भी विद्यमान था और अशोक के बाद भी अनेक शताब्दियों तक विकसित होता रहा। इसी प्रकार किसी स्थान पर बौद्ध स्तूप मिलना अपने आप में यह प्रमाणित नहीं करता कि उस स्थान पर अशोक स्वयं आए थे या वहाँ अशोककालीन निर्माण हुआ था। अशोककालीन प्रमाण के लिए अशोक के अभिलेख, स्पष्ट रूप से दिनांकित मौर्यकालीन स्थापत्य, समकालीन पुरातात्विक परत या अन्य प्रत्यक्ष साक्ष्य अधिक महत्वपूर्ण होंगे। इसलिए चित्तौड़–मध्यमिका क्षेत्र के संदर्भ में “प्रारंभिक बौद्ध उपस्थिति” कहना अधिक वैज्ञानिक है, जबकि “अशोक ने चित्तौड़ में बौद्ध केंद्र स्थापित किया” जैसी बात के लिए वर्तमान उपलब्ध प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं।
मौर्यकालीन संदर्भ: क्या चित्तौड़–मध्यमिका क्षेत्र मौर्यकालीन था? यह प्रश्न अभी भी शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। राजस्थान के अन्य स्थलों की तरह इस क्षेत्र में भी प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के पुरातात्विक संकेत मिलते हैं। नगरी की प्राचीनता, सिक्के, प्रारंभिक अभिलेख और सांस्कृतिक अवशेष इसे मौर्य-उत्तर और उससे जुड़े व्यापक प्रारंभिक ऐतिहासिक परिदृश्य में रखते हैं। कुछ पुराने अध्ययनों ने नगरी के विकास को मौर्यकाल तक पीछे ले जाने का प्रयास किया है, लेकिन किसी विशेष संरचना को केवल अनुमान के आधार पर अशोककालीन घोषित करना उचित नहीं होगा। इसलिए इस लेख में “मौर्यकालीन संदर्भ” का प्रयोग एक व्यापक सांस्कृतिक-ऐतिहासिक संभावना के रूप में किया जा रहा है, न कि चित्तौड़ को प्रत्यक्ष अशोककालीन नगर घोषित करने के लिए।
अशोककालीन प्रमाण की तुलना: बैराठ: राजस्थान में अशोककालीन बौद्ध उपस्थिति का अधिक प्रत्यक्ष उदाहरण बैराठ अर्थात् प्राचीन विराटनगर है। वहाँ अशोक के दो अभिलेख मिले हैं और उत्खनन से मौर्यकालीन गोलाकार स्तूप-श्राइन तथा उससे जुड़े मठीय अवशेष प्राप्त हुए हैं। वहाँ ईंट-निर्मित संरचना, चूने का पलस्तर और स्तंभों की व्यवस्था जैसी सामग्री अशोककालीन बौद्ध गतिविधि को समझने में प्रत्यक्ष आधार देती है। बैराठ का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि जब किसी स्थल को अशोककालीन कहना हो तो किस प्रकार के प्रत्यक्ष प्रमाण अपेक्षित होते हैं। चित्तौड़–मध्यमिका क्षेत्र में वर्तमान प्रमाणों की प्रकृति इससे अलग है; इसलिए दोनों को समान रूप से “अशोककालीन” कहना उचित नहीं होगा।
क्या मध्यमिका ही चित्तौड़ था? उपलब्ध प्रमाण मध्यमिका को आधुनिक नगरी से जोड़ते हैं, न कि सीधे चित्तौड़ दुर्ग से। इसलिए मध्यमिका और चित्तौड़ को एक ही नगर मानना उचित नहीं है। दोनों एक ही व्यापक भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र के महत्वपूर्ण केंद्र थे। चित्तौड़ की पहाड़ी पर पूर्व-दुर्ग बस्ती के प्रमाण और दूसरी ओर नगरी में विकसित नगरीय-सांस्कृतिक केंद्र के प्रमाण इस क्षेत्र में एक बहु-केंद्रित ऐतिहासिक परिदृश्य की संभावना प्रस्तुत करते हैं। भविष्य में GIS, पुरातात्विक सर्वेक्षण, प्राचीन मार्गों और जल-स्रोतों के अध्ययन से यह समझने में मदद मिल सकती है कि इन दोनों केंद्रों के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंध किस प्रकार थे।
चित्तौड़ और मध्यमिका के बीच संभावित संक्रमण: कुछ आधुनिक विद्वानों ने यह संभावना व्यक्त की है कि जब मध्यमिका की राजनीतिक महत्ता में परिवर्तन आया और चित्तौड़ की पहाड़ी पर नया सत्ता-केंद्र विकसित हुआ, तब आसपास के पुराने केंद्रों से स्थापत्य सामग्री अथवा अभिलेखीय अवशेषों का स्थानांतरण हुआ हो सकता है। यह एक संभावित ऐतिहासिक व्याख्या है, स्थापित तथ्य नहीं। चित्तौड़ से प्राप्त कुछ अभिलेखों और मध्यमिका के ऐतिहासिक महत्व को साथ रखकर देखने पर यह प्रश्न महत्वपूर्ण बनता है कि क्या चित्तौड़ का उभार किसी पुराने क्षेत्रीय सत्ता-केंद्र के क्रमिक रूपांतरण से जुड़ा था।
औलिकर काल और चित्तौड़ के अभिलेख: छठी शताब्दी ईस्वी के आसपास के औलिकर कालीन प्रमाण चित्तौड़ और मध्यमिका के इतिहास को एक नए चरण में ले जाते हैं। विद्वानों के अध्ययन के अनुसार यशोधर्मन के समय से संबंधित चित्तौड़ के अभिलेख मध्यमिका क्षेत्र की राजनीतिक महत्ता की ओर संकेत करते हैं। प्रारंभिक औलिकरों की धार्मिक संबद्धता वैष्णव परंपरा से और बाद के औलिकरों की संबद्धता शैव परंपरा से जोड़ी गई है। इससे यह भी पता चलता है कि इस क्षेत्र की धार्मिक पहचान स्थिर नहीं थी, बल्कि समय के साथ बदलती रही।
नगरी का महादेव मंदिर और शैव परंपरा: नगरी क्षेत्र में बाद के काल में शैव धार्मिक परंपरा के भी महत्वपूर्ण प्रमाण मिलते हैं। महादेव मंदिर के स्थापत्य अवशेष और उससे जुड़े अभिलेख यह बताते हैं कि मध्यमिका क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियों का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा। इससे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निष्कर्ष निकलता है—चित्तौड़–मध्यमिका क्षेत्र को किसी एक धार्मिक पहचान में बाँधना उचित नहीं है। यहाँ वैष्णव, बौद्ध और शैव परंपराओं के अलग-अलग कालों के प्रमाण मिलते हैं।
मौर्य और मोरी: एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी: चित्तौड़ के प्रारंभिक इतिहास की चर्चा में “मौर्य” और “मोरी” शब्दों को लेकर विशेष सावधानी आवश्यक है। केवल नाम की समानता के आधार पर मोरी शासकों को सीधे मौर्य सम्राटों का वंशज घोषित नहीं किया जा सकता। मौर्य साम्राज्य का ऐतिहासिक काल और चित्तौड़ के मोरी शासकों का काल अलग ऐतिहासिक संदर्भों में आता है। इसलिए “मौर्यकालीन चित्तौड़” और “मोरी शासित चित्तौड़” दो अलग प्रश्न हैं। इनके बीच संबंध सिद्ध करने के लिए वंशावली, अभिलेख, सिक्के, पुरातात्विक स्तर और समकालीन साहित्यिक प्रमाणों की आवश्यकता होगी।
बप्पा रावल और चित्तौड़: बप्पा रावल का नाम चित्तौड़ के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु उनका महत्व चित्तौड़ के इतिहास का आरंभ बिंदु होने के कारण नहीं माना जाना चाहिए। उपलब्ध पुरातात्विक प्रमाण इससे कहीं अधिक पुराने सांस्कृतिक क्रम की ओर संकेत करते हैं। बप्पा रावल और प्रारंभिक गुहिल/गहलोत सत्ता का अध्ययन मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास के लिए आवश्यक है, लेकिन उससे पहले की चित्तौड़ पहाड़ी और मध्यमिका की प्राचीनता को अलग से समझना होगा। इस दृष्टि से बप्पा रावल चित्तौड़ के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं, आरंभिक अध्याय नहीं।
चित्तौड़ का दुर्ग: एक लंबी निर्माण प्रक्रिया: आज दिखाई देने वाला चित्तौड़ दुर्ग किसी एक समय में निर्मित संरचना नहीं है। इसकी प्राचीरें, द्वार, मंदिर, जल-संरचनाएँ और अन्य स्थापत्य अवशेष विभिन्न कालखंडों की निर्माण और पुनर्निर्माण प्रक्रियाओं का परिणाम हैं। उत्खनन में दुर्ग-रक्षा से पहले की बस्ती और बाद की अनेक रक्षात्मक परतों का मिलना इस बात को मजबूत करता है कि चित्तौड़ की पहाड़ी का उपयोग लगातार बदलते राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों में होता रहा।
धार्मिक विविधता: चित्तौड़–मध्यमिका का महत्वपूर्ण पक्ष: इस क्षेत्र का इतिहास धार्मिक विविधता का भी इतिहास है। नगरी के संकर्षण–वासुदेव संबंधी अभिलेख प्रारंभिक वैष्णव परंपरा की उपस्थिति दिखाते हैं; बौद्ध स्तूपों के अवशेष बौद्ध गतिविधि के संकेत देते हैं; बाद के काल में शैव परंपरा के प्रमाण मिलते हैं। यह विविधता भारतीय इतिहास के उस व्यापक चरित्र को समझने में सहायता करती है जिसमें विभिन्न धार्मिक परंपराएँ समान भू-क्षेत्र में अलग-अलग समयों पर विकसित होती रहीं और कई बार एक-दूसरे के साथ सह-अस्तित्व में रहीं।
बौद्धकालीन चित्तौड़: शोध की भाषा क्या होनी चाहिए? उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर “बौद्धकालीन चित्तौड़” शीर्षक आकर्षक अवश्य है, लेकिन अकादमिक दृष्टि से इसे अधिक सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए। वर्तमान प्रमाणों से चित्तौड़ की पहाड़ी पर किसी निश्चित अशोककालीन बौद्ध विहार या अशोक स्तंभ की पुष्टि नहीं होती। दूसरी ओर निकटवर्ती नगरी में बौद्ध स्तूपों की सूचना और बौद्ध प्रभाव की संभावनाएँ मौजूद हैं। इसलिए अधिक उपयुक्त शोध-वाक्य होगा—“चित्तौड़–मध्यमिका क्षेत्र में प्रारंभिक बौद्ध उपस्थिति के पुरातात्विक संकेत”। इसी प्रकार “अशोककालीन चित्तौड़” कहने के बजाय “चित्तौड़–मध्यमिका क्षेत्र के मौर्यकालीन संदर्भों की खोज” अधिक वैज्ञानिक अभिव्यक्ति होगी।
संत रविदास और चित्तौड़ की सांस्कृतिक स्मृति: चित्तौड़ की यात्रा के दौरान मुझे सहकर्मियों से यह जानकारी मिली कि संत रविदास का चित्तौड़ से संबंध रहा है। संत रविदास से जुड़ी चित्तौड़ की स्मृतियाँ आज भी सामाजिक और धार्मिक संस्कृति का हिस्सा हैं। किंतु मध्यकालीन संत परंपराओं से संबंधित घटनाओं को पुरातात्विक प्रमाणों के समान स्तर पर रखना उचित नहीं होगा। संत रविदास के चित्तौड़ आगमन और उनसे जुड़ी स्थानीय परंपराओं का अध्ययन साहित्यिक स्रोतों, भक्तिकालीन परंपराओं, स्थानीय स्मृति और ऐतिहासिक स्रोत-समीक्षा के आधार पर अलग से किया जाना चाहिए। इस प्रकार सांस्कृतिक स्मृति का सम्मान करते हुए भी उसे पुरातात्विक प्रमाण से अलग रखा जा सकता है।
मेरी चित्तौड़ यात्रा और इस शोध की प्रेरणा: 22 मई 2022 को गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) के एक कार्यक्रम के सिलसिले में चित्तौड़गढ़ जाने का अवसर मिला। उस यात्रा में चित्तौड़ दुर्ग को देखने और उसके विस्तृत ऐतिहासिक परिसर को समझने का अवसर मिला। उसी दौरान मेरे मन में यह प्रश्न उठा कि चित्तौड़ का इतिहास वास्तव में कहाँ से शुरू होता है? क्या इसका आरंभ केवल बप्पा रावल और मध्यकालीन मेवाड़ से माना जाना चाहिए, या इसके पीछे कोई और पुराना सांस्कृतिक इतिहास भी है? उसी यात्रा में सहकर्मियों से संत रविदास के चित्तौड़ आगमन से संबंधित परंपरा की चर्चा भी हुई। इन प्रश्नों ने मुझे चित्तौड़ के पुराने संदर्भों की खोज की ओर प्रेरित किया। जब पुरातात्विक रिपोर्टों, अभिलेखों और नगरी–मध्यमिका के प्रमाणों का अध्ययन किया गया तो यह स्पष्ट हुआ कि चित्तौड़ का इतिहास एक बहुत लंबी प्रक्रिया है, जिसे केवल मध्यकालीन राजवंशों के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
आगे के शोध के लिए आवश्यक कदम: चित्तौड़ के प्राचीन इतिहास को अधिक स्पष्ट करने के लिए नए सिरे से वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता है। प्रथम, चित्तौड़ दुर्ग की पूर्व-दुर्ग परतों का आधुनिक तकनीकों से पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए। द्वितीय, पुरानी उत्खनन सामग्री का आधुनिक वैज्ञानिक डेटिंग विधियों से पुनः परीक्षण होना चाहिए। तृतीय, नगरी और चित्तौड़ के बीच प्राचीन मार्गों, जल-स्रोतों, कृषि क्षेत्र और बस्तियों का GIS आधारित सर्वेक्षण किया जाना चाहिए। चतुर्थ, नगरी के बौद्ध स्तूपों और अन्य संरचनाओं का पुनः अध्ययन कर उनकी निश्चित काल-निर्धारण प्रक्रिया की जानी चाहिए। पंचम, चित्तौड़ और नगरी से संबंधित सभी ब्राह्मी तथा बाद के अभिलेखों का एक समेकित डिजिटल corpus तैयार किया जाना चाहिए। षष्ठम, सिक्कों की धातु, निर्माण तकनीक, वितरण क्षेत्र और पुरातात्विक स्तर का पुनः अध्ययन किया जाना चाहिए। सप्तम, उत्खनन में प्राप्त जैविक सामग्री उपलब्ध हो तो उसका वैज्ञानिक परीक्षण किया जाना चाहिए। अष्टम, पुरातात्विक स्थलों की provenance अर्थात् पत्थर और निर्माण सामग्री के स्रोत का अध्ययन किया जाना चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या किसी पुराने धार्मिक या राजकीय केंद्र से सामग्री बाद के चित्तौड़ दुर्ग में लाई गई थी।

निष्कर्ष: चित्तौड़ का इतिहास बप्पा रावल से आरंभ नहीं होता। पुरातात्विक उत्खनन यह सिद्ध करते हैं कि चित्तौड़ की पहाड़ी पर दुर्ग-निर्माण से पहले भी मानव बस्ती और संरचनात्मक गतिविधियाँ मौजूद थीं। निकटवर्ती नगरी की प्राचीन मध्यमिका पहचान, सिबि जनपद से संबंधित सिक्के, हाथीबाड़ा–घोषुंडी के प्रारंभिक वैष्णव अभिलेख, बौद्ध स्तूपों के प्रमाण और बाद के औलिकर तथा शैव संदर्भ मिलकर इस पूरे क्षेत्र को एक दीर्घकालीन और बहुधार्मिक सांस्कृतिक भू-दृश्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। मौर्यकालीन संदर्भों की संभावना पर गंभीर शोध की आवश्यकता है, किंतु वर्तमान प्रमाणों के आधार पर चित्तौड़ को सीधे “अशोककालीन नगर” कहना उचित नहीं होगा। अशोककालीन प्रमाणों के लिए राजस्थान का बैराठ अधिक प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ अशोक के अभिलेख और मौर्यकालीन बौद्ध स्थापत्य दोनों उपलब्ध हैं। चित्तौड़–मध्यमिका क्षेत्र में बौद्ध उपस्थिति के संकेत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके काल-निर्धारण और स्वरूप पर अभी और वैज्ञानिक शोध आवश्यक है। इसी प्रकार मौर्य और मोरी को केवल नाम-साम्य के आधार पर एक मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि चित्तौड़ को केवल राजपूत गौरव, मध्यकालीन युद्धों या बप्पा रावल की राजनीतिक परंपरा के माध्यम से नहीं, बल्कि एक बहुस्तरीय पुरातात्विक भू-दृश्य के रूप में देखना चाहिए। यहाँ दुर्ग से पहले की बस्ती, प्रारंभिक नगरीय केंद्र, व्यापार और सिक्कों की अर्थव्यवस्था, वैष्णव परंपरा, बौद्ध उपस्थिति, बाद की शैव परंपरा और मध्यकालीन राजनीतिक सत्ता—सभी अलग-अलग कालखंडों में एक विस्तृत ऐतिहासिक क्रम का निर्माण करते हैं। अतः चित्तौड़ का वास्तविक इतिहास किसी एक राजवंश से नहीं, बल्कि उन अनेक मानव समुदायों, बस्तियों, धार्मिक परंपराओं और राजनीतिक परिवर्तनों से निर्मित हुआ है जिन्होंने इस भूभाग को सदियों तक जीवंत रखा। भविष्य में यदि चित्तौड़ और मध्यमिका की पुरातात्विक सामग्री का आधुनिक वैज्ञानिक विधियों से पुनः अध्ययन किया जाता है, तो संभव है कि भारतीय इतिहास में इस क्षेत्र की प्राचीन भूमिका वर्तमान समझ से कहीं अधिक व्यापक रूप में सामने आए।

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