
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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तमिलनाडु में जोसफ सी. विजय के नेतृत्व वाली टी.वी.के . की नई भी सरकार राज्य में हिंदी पढाये जाने तथा इसका प्रसार करने के मामले में उतनी ही विरोधी है जितनी कि पिछली सरकारें. इनमें भी विशेषकर द्रमुक पार्टी जो हिंदी की घोर विरोधी है।
पिछली द्रमुक सरकार के काल में केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को तमिलनाडु के प्रत्येक जिले में एक नवोदय विद्यालय खोले जाने का प्रस्ताव भेजा था तथा इन विद्यालयों की स्थापना के जमीन आवंटित किये जाने का आग्रह किया था . केंद्र सरकार ये विद्यालय जल्दी से जल्दी खोलना चाहता था . लेकिन राज्य सरकार ने इस दिशा में कोई काम नहीं किया।
जब मामला लटकता गया तो मद्रास हाई कोर्ट में एक याचिका के जरिये कोर्ट से आग्रह किया कि राज्य सरकार को बिना किसी विलम्ब के इन विद्यालयों के लिए जमीन आवंटित करे . सरकार की ओर से कहा गया कि चूँकि इन विद्यालयों में हिंदी भी पढाई जायेगी इसलिए सरकार राज्य में ये विद्यालय स्थापित किये जाने के विरुद्ध है . शिक्षा राज्य सरकार का विषय है राज्य में लागू द्विभाषी फार्मूले के अनुसार केवल तमिल और अंग्रेजी ही पढाई जाती है . जबकि नवोदय स्कूलों में त्रिभाषी फार्मूला में इन दो भाषायों के साथ हिंदी भी पढाया जाना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार् के तर्क को स्वीकार नहीं किया तथा स्पष्ट निदेश दिया कि इस मामले को राजनीतिक रूप देने के बजाये राज्य सरकार केंद्र के प्रस्ताव को स्वीकार कर जल्दी से जल्दी जमीन देने के मुद्दे को सुलझाये . कोर्ट ने यह भी कहा कि राजनीतिक कारणों से हिंदी का विरोध नहीं किया जाना चाहिए . राज्य सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के इस निर्णय को पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में मद्रास हाई कोर्ट के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट टमें चुनौती दी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकार के याचिका को खारिज कर दिया तथा इस मामले को जल्दी से जल्दी सुलझाने को कहा . लेकिन विधानसभा चुनाव नज़दीक होने के कारण माला ठन्डे बसते में पड़ा रहा . जब राज्य में सरकार में बदलाव हुआ तो नई सरकार द्वारा इस विषय पर एक पुनर्विचार याचिका पेश की गई . इसमें वही सब दोहराया गया कि केंद्र के फार्मूले के अनुसार नवोदय विद्यालय स्थापित किया जाना और उसमें हिंदी पढाया जाना राज्य की शिक्षा नीति के विरुद्ध है. देश में संघीय व्यवस्था होने के कारण राज्य सरकार अपनी शिक्षा नीति लागू करने का अधिकार है . लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की नई सरकार के यह याचिका भी खारिज कर दी. इसके साथ यह निदेश भी दिया कि राज्य सरकार तीन महीने के भीतर इन विद्यालयों के लिए जमीन तय करे . केद्र सरकार तथा राज्य सरकार के प्रतिनिधियों को मिल बैठ कर इस मामले पर केंद्र तथा राज्य सरकार को इस पर निर्णय करना चाहिए ताकि तमिलनाडु में जो लोग हिंदी भी पढ़ना चाहते है उनको इससे वंचित नहीं किया जा सके . इस मामले को बिना किसी राजनीतिक नजरिये से हल किया जाना चाहिए . इस मुद्दे पर केंद्र को राज्य सरकार की बात सुननी चाहिए तथा केंद्रीय सरकार को राज्य सरकार के नजरिये को गंभीरता से लेना चाहिए. माननीय जजों ने यह भी कहा कि तमिलनाडु में हिंदी के विरोध का कोई औचित्य नहीं है।
इस समय था जब राज्य के सिनेमा घरों में हिंदी फिल्में नहीं दिखाई जाती थीं. उनके पोस्टर फाड़ दिए जाते थे . निजी दुकानों तथा केंद्र सरकार के प्रतिष्ठानों पर हिंदी में लिखे साईन बोर्ड तोड़ दिए जाते थे . यह सब तमिल संस्कृति तथा अस्मिता को बड़ा मुद्दा बना कई राजनीतिक दलों का ने यहाँ हिंदी के विरोध का माहौल बनाने कोई कमी नहीं रखी . पिछले कुछ सालों में स्थिति में बड़ा बदलाव आया है. बड़े शहरों में अब आम आदमी भी हिंदी समझने लगा है तथा टूटी फूटी हिंदी में बात भी कर सकता है . राज्य में हिंदी फिल्मों का प्रदर्शन देश के अन्य राज्यों की तरह हो रहा है . टीवी चैनलों पर दिखाए जाने वाले हिंदी के लोकप्रिय सीरियल भी तमिल परिवारों उतनी ही दिलचस्पी से देखे जाते हाँ जितने की हिंदी भाषी तथा अन्य गैर हिंदी भाषी प्रदेशों में देखे जाते है।
सबसे आश्चर्य के बात है कि पिछले चुनावों में खुद द्रमुक ने एक विधानसभा चुनाव क्षेत्र के हिंदी बहुल इलाके में अपने चुनावी पोस्टर हिंदी में लगाये थे . सुप्रीम कोर्ट ने अपने अपने ताजे फैसले तथा जजों ने अपनी टिप्पणियों भी यह बात अपने तरीके से कही है. राज्य सरकार के वकील से कहा कि अब समय आ गया है कि इस प्रदेश में हिंदी का विरोध नहीं किया जाना चाहिए। (लेखक के अपने विचार हैं)