

एआई, वैश्विक अवसर और नेतृत्व पर हुई चर्चाएं, लेकिन सरकारी स्कूलों की बदहाली और शिक्षा की बुनियादी समस्याओं पर कितना हुआ मंथन ?
नादिरा बानो की रिपोर्ट
www.daylifenews.in
जयपुर। प्रदेश में स्कूली शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। कहीं शिक्षकों की कमी है तो कहीं संसाधनों का अभाव, वहीं सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। ऐसे में जयपुर सहोदय स्कूल्स कॉम्प्लेक्स (जेएसएससी) की ओर से होटल क्लार्क्स आमेर में आयोजित ‘प्रिंसिपल्स कॉन्क्लेव 2.0’ में शिक्षा के भविष्य, एआई तकनीक, वैश्विक अवसरों और नेतृत्व जैसे विषयों पर लम्बा मंथन हुआ, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस आयोजन में शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक समस्याओं को भी उतनी ही गंभीरता से उठाया गया ?
‘लीडिंग लर्निंग, शेपिंग लेगेसीज’ थीम के साथ आयोजित इस कॉन्क्लेव में शिक्षा जगत के विशेषज्ञों, निजी स्कूलों के प्रधानाचार्यों और शिक्षाविदों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम के संयोजक सुबोध पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल डॉ. संजय पाराशर ने बताया कि इस कार्यक्रम का उद्घाटन सीबीएसई के निदेशक (प्रशिक्षण) एवं मुख्य अतिथि मनोज कुमार श्रीवास्तव ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। उन्होंने शिक्षक क्षमता निर्माण और पेशेवर विकास पर जोर दिया।
कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय जीवन के कोच डॉ. नितिन सारस्वत ने नेतृत्व और सकारात्मक ऊर्जा पर अपने विचार रखे। वहीं इस कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर आमंत्रित फिल्म अभिनेता राजा मुराद ने प्रेरणादायक संबोधन दिया। हास्य कवि शंभु शिखर ने हास्य-व्यंग्य के माध्यम से उपस्थित लोगों का मनोरंजन किया। इस कॉन्क्लेव में एआई आधारित तकनीक, भविष्य के करियर, पाठ्यक्रम पुनर्गठन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, वैश्विक अवसर, अभिभावक स्कूल संबंध और कौशल विकास जैसे विषयों पर चर्चा की गई। हालांकि इन चर्चाओं के बीच शिक्षा के व्यवसायीकरण, निजी स्कूलों की बढ़ती फीस, अभिभावकों पर आर्थिक बोझ, विद्यार्थियों पर पढ़ाई का दबाव, शिक्षकों की कार्य परिस्थितियों और शिक्षा में बढ़ती असमानता जैसे मुद्दों को कितनी प्राथमिकता मिली, यह स्पष्ट नहीं हो पाया। शिक्षा में तकनीक और नवाचार की बातें करना निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन सवाल यह भी है कि जब बड़ी संख्या में विद्यार्थी आज भी बुनियादी शैक्षिक सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब केवल आधुनिक तकनीक और वैश्विक अवसरों की चर्चा से शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक बदलाव कैसे आएगा? आयोजन में कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए। सूत्रों की माने तो ऐसे सम्मेलनों की वास्तविक सफलता मंचों पर होने वाले भाषणों से नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था में दिखाई देने वाले ठोस सुधारों से तय होनी चाहिए।