एक जीवित तंत्र पेड़ों के ह्वास का दुष्परिणाम – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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देश-दुनिया में यह मान्यता है कि पेड़ों का होना हमारे स्वच्छ पर्यावरण, जीवन, स्वास्थ्य और मानवता का आधार है। यही नहीं हमारे पारिस्थितिकीय तंत्र में भी वनों की अहम भूमिका को नकारा नहीं जा सकता । यह भी कटु सत्य है कि पेड़ों में भूकंपीय ऊर्जा के कुचालक के रूप में कार्य करने की क्षमता होती है।इस सत्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि पहाड़ी इलाकों में भूकंप के दौरान वनविहीन क्षेत्रों ने बड़े-बड़े भूस्खलन झेले हैं। यह मान्यता निराधार नहीं है कि वनाच्छादित क्षेत्र काफी हदतक भूकंप की ऊर्जा की तीव्रता को कम कर देते हैं। परंपरागत भूकंपरोधी घरों में लकड़ी का उपयोग इसी सोच के तहत किया जाता है। यही वह अहम वजह है जिसके कारण देश-दुनिया में आजकल वन क्षेत्र बढ़ाने कहें या पेड़ों को लगाने की होड़ लगी हुयी है। इसके पीछे संयुक्त राष्ट्र की 27 अप्रैल 2017 को जारी वनीकरण सम्बंधी वह योजना है। उसके तहत उसने वैश्विक स्तर पर 26 लक्ष्य निर्धारित किये थे जिसके तहत समूची दुनिया में साल 2030 तक तीन फीसदी जंगल का दायरा बढ़ाना था। इस योजना के तहत जंगल बढ़ाने का दायरा फ्रांस के कुल क्षेत्रफल के दोगुणे से भी अधिक था। लेकिन बीते नौ सालों में उस लक्ष्य का केवल सात फीसदी की ही पूर्ति कर पाने में कामयाबी मिली है। खेदजनक यह है कि उनमें से दो लक्ष्य तो पूरी तरह अस्तित्व में आये ही नहीं। चिंता की बात यह है कि दुनिया के 48 देशों में जहां कुल वनों का 51 फीसदी हिस्सा वनाच्छादित है, वहां बीते 10 सालों में वन क्षेत्र में तकरीब चार करोड़ हैक्टेयर से भी ज्यादा की कमी आयी है। सबसे अधिक केवल एक साल यानी अकेले 2025 के दौरान ही दुनिया ने करीब 43 लाख हैक्टेयर यानी 1.06 करोड़ एकड़ वन खो दिये। यह लगभग 42,933 वर्ग किलोमीटर वाले डेनमार्क जैसे देश के बराबर है। अगर हम फुटबाल मैदानों की बात करें तो डेनमार्क में लगभग 60 लाख फुटबाल मैदान समा सकते हैं। इसका अर्थ यह कि धरती ने एक साल में 43,000 वर्ग किलोमीटर हरियाली खो दी । मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अध्ययन से यह खुलासा हुआ है कि दुनिया में हर मिनट 11 फुटबाल मैदानों जितने बड़े वन खत्म हो रहे हैं। यह नुकसान एक दशक पहले की तुलना में 46 फीसदी से भी ज्यादा है। समझ नहीं आता कि यह सब। जानते-समझते हुए भी हहम वन विनाश पर क्यों तुले हैं और ऐसा कर हम क्यों हम पर्यावरणके साथ ही भूकंप के विनाश को दावत दे रहे हैं। चिंतनीय यह है कि अब वनीकरण का निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने में केवल चार साल का ही समय बचा है। ऐसी हालत में यह सवाल बहस का मुद्दा बन गया है कि आखिर वह कौन से कारण रहे जिसके चलते वन संरक्षण की दिशा में दुनिया क्यों पिछड़ती जा रही है? यह भी गौरतलब है कि 2030 तक सतत विकास लक्ष्य हासिल करने के लिए वनावरण के दायरे को बढ़ाने और उपलब्ध वनों को सहेजने की दिशा में दुनियाभर में प्रगति संतोषजनक नहीं है।
दरअसल 2021 के जलवायु शिखर सम्मेलन में 100 से भी अधिक देशों ने वादा किया था कि 2030 तक वे वनों की कटाई पूरी तरह रोक देंगे लेकिन मौजूदा रफ्तार को देखते हुए दुनिया इस लक्ष्य से 70 फीसदी पीछे चल रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 1.6 अरब लोगों के लिए जंगल, भोजन,पानी,ईंधन और रोजगार के स्रोत हैं। हालांकि बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, भूमि उपयोग में बदलाव, दावानल,वनोन्मूलन और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के कारण वनों का अस्तित्व खतरे में है। वनों के विनाश में केवल वनों की आग की ही अहम भूमिका नहीं है, इंसानी जरूरतें भी वन विनाश का बड़ा कारण है। जबकि वन न केवल सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जरूरी हैं बल्कि वे जैवविविधता के संरक्षण, खाद्य व आजीविका की सुरक्षा,गरीबी उन्मूलन, आक्सीजन की निरंतरता,मृदा संरक्षण, कार्बन अवशोषण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भी जरूरी हैं।
भारत में दावा बराबर वन क्षेत्र में बढ़ोतरी का किया जा रहा है लेकिन हकीकत में वन क्षेत्र में मामूली बढ़ोतरी के बावजूद देश में जगह-जगह जारी विकास परियोजनाओं,खनन, प्राकृतिक दवाबों के कारण पुराने बड़े वनों के घनत्व में काफी कमी और मैंग्रोव वनों में गिरावट दर्ज की गयी है। हमारा कुल वन क्षेत्र 7,15,342.61 वर्ग किलोमीटर यानी 21.76 फीसदी है जबकि वृक्ष आवरण 1,12,014.34 वर्ग किलोमीटर यानी कुल 3.41 फीसदी है। यह कुल वन क्षेत्र और कुल वनावरण मिलाकर 8,27,356.95 वर्ग किलोमीटर है। कुल वन क्षेत्र के मामले में हमारे देश का दुनिया में 99वें वां नम्बर है। इसके पीछे सड़क निर्माण, वह भी बड़े-बड़े हाई-वे निर्माण, बांध निर्माण, खदानें और शहरीकरण जैसे विकस कार्यों की अहम भूमिका के चलते पुराने वनों का घनत्व लगातार गिरता जा रहा है। 2023-24 में केन्द्र शासित पुडुचेरी में 29 हजार हैक्टेयर वन भूमि गैर वन गतिविधियों यानी सड़क, खनन,बिजली की लाइनों,सिंचाई एवं जल विद्युत परियोजनाओं के लिए दे दी गयी। इंडिया इस्टेट आफ फॉरेस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल वन काटे जाने में 66 फीसदी की बढ़ोतरी हुयी।वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की मानें तो इस दौरान चार राज्यों यथा गुजरात, मध्य प्रदेश, ओडिसा और तेलंगाना में 49 फीसदी वन भूमि कम हो गयी।
देश में हरसाल वृक्षारोपण के नामपर हरेक राज्य में करोड़ों-करोड की तादाद में पेड़ लगाये जाते हैं। वे कितने लगते हैं,इसकी बानगी देखिए। सरकारी अधिकारियों के द्वारा निचले स्तर के अधिकारियों,पंचायत विभाग, ग्राम्य विकास विभाग और स्कूलों को पेड़ लगाने को दिये जाते हैं।वे ऊपर से स्कूल आते-आते 1000 पेड़ों से 100 रह जाते हैं। स्कूल टीचर उन पेड़ों को लगाने का जिम्मा बच्चों को दे देती हैं। उनमें से कितने पेड़ लगते है, सूख जाते हैं,पता ही नहीं चलता। विचारणीय यह है कि जब हरसाल करोड़ों-करोड पेड़ों का रोपण किया जाता है, उस दशा में तो पूरा देश पेड़ों से पट जाता और सर्वत्र हरियाली ही हरियाली दिखाई देती। सरकारी लापरवाही का उदाहरण देश की राजधानी दिल्ली है जहां कंक्रीट से धधकती दिल्ली को राहत पहुंचाने और हरियाली बढ़ाने के नाम पर करोड़ों रुपये का घोटाला हुआ। यहां सड़क किनारे 23 लाख 82 हजार झाड़ियां सहित पेड़ों को लगाने के लिए करोड़ों खर्च करने का दावा किया गया लेकिन वे कहां लगे, कितने बचे या कितने मर गये, इसका हिसाब पीडब्ल्यूडी के पास है ही नहीं। सबसे बड़ी बात पेड़ों के लगाने के बाद उनके सरवाइवल रेट जांचने के लिए आडिट कराया जाता है जो हुआ ही नहीं।मैंग्रोव वन इसके ताजे उदाहरण हैं जिनमें 7.4 वर्ग किलोमीटर की कुल गिरावट आयी है जिसका ज्यादा खामियाजा गुजरात और अंडमान निकोबार को उठाना पड़ा है।
यह कटु सत्य है कि जंगल सिर्फ पेड़ नहीं, एक जीवित तंत्र है। पेड़ और जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि पृथ्वी की जीवन रक्षक प्रणाली का आधार हैं। स्थलीय जैव विविधता का बड़ा हिस्सा वनों पर निर्भर है। सुंदरवन के मैंग्रोव वन, समुद्र-स्तर वृद्धि और चक्रवातों से जूझ रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र में हिम तेंदुए जैसी प्रजातियाँ आवासीय क्षेत्र में बदलाव और मानवीय दबाव के कारण संवेदनशील स्थिति में हैं। कीट-पतंगों और परागण तंत्र के जीवनचक्र में बदलाव के संकेत मिले हैं, जो कृषि उत्पादन पर भी प्रभाव डाल सकते हैं। विकास परियोजनाओं के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। देवभूमि उत्तराखंड में सड़क, रेल और सुरंग परियोजनाओं को लेकर विकास के नाम पर देवदार, बांज, बुरांश, खरसू, मौरूं, फर, कैल, मुरेंडा प्रजाति के छोटे बड़े 10 लाख हरे पेड़ों को काट डाला गया है। बीते 8-9 सालों के दौरान ढाई लाख से ज्यादा पेड काट दिये गये हैं। इनमें से एक लाख से ज्यादा पेड आल वैदर रोड के नाम पर, शेष पर्यटन, देहरादून से लेकर दिल्ली तक सड़क चौडी़करण, ऋषिकेश – कर्णप्रयाग रेल परियोजना, सुरंग आधारित परियोजनाओं के नामपर बांज, राई, कैल और चीड जैसी प्रजातियों का तो अस्तित्व ही मिटा दिया गया है। हर साल सरकार वाणिज्यिक प्रयोग के नामपर 3 से 4 लाख पेड कटवाती है। इससे भूस्खलन और बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। आने वाले बरसों में विकास योजनाओं के नामपर 5 हजार फीट की ऊंचाई से लगभग साढे आठ हजार ऊंचाई के जंगल के 3 लाख शंकुधारी प्रजाति के पेड़ों को काटे जाने की योजना है। ऋषिकेश, श्यामपुर, ढालवाला,वीरभद्र और पशुलोक के जंगल से 3000 से ज्यादा पेड़ों को काट दिया गया। पंजाब के रूपनगर के शिवालिक क्षेत्र से चिन्हित तो150 पेड़ों को किया गया लेकिन शासन की कुल्हाड़ी ने 5000 के करीब पेड़ों को काट दिया। मध्य प्रदेश में नई रेल लाइन के लिए 1.24 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। सिंगरौली में कोयले की भूख के चलते घिराली कोल ब्लॉक के जंगलों में हजारों हरे-भरे पेड़ों का सफाया कर दिया गया है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में खनन और सड़क परिवहन योजनाओं से जंगल सिमटते जा रहे हैं । वहां वन्यजीव भटक रहे हैं और जलस्रोत सूख गये हैं। कर्नाटक में हाल के वर्षों में 3 लाख से ज्यादा हरे-भरे वृक्षों को विभिन्न योजनाओं के नामपर काट दिया गया है। तेलंगाना में हाई वे चौडी़करण आदि विभिन्न परियोजनाओं के लिए हजारों हरे-भरे पेड़ों की कटाई को स्वीकृति दी गयी है। इससे गर्मी बढ़ेगी, बारिश कम होगी और हवा जहरीली होगी। अंडमान -निकोबार में ग्रेट निकोबार विकास परियोजना के नामपर 130 किलोमीटर के दायरे में एक से दस मिलियन तक पेड़ों के काटे जाने की योजना है। झारखंड में कारो ओपन कास्ट परियोजना के लिए भी लगभग 35 हजार पेड़ों की कटाई को मंजूरी मिली है, जिससे वन्यजीव आवास, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय जीवन पर गहरा संकट खड़ा हो गया है। यह पूरे देश में हो रहा है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार 1990 से 2020 के बीच भारत में करोड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र का ह्रास हुआ है। 2015 से 2020 के बीच के पांच सालों में 6,68,400 हेक्टेयर वनों का खात्मा हुआ। यह आंकड़ा दुनिया में ब्राजील के बाद सबसे ज्यादा है। भारत में 1990 से 2020 के बीच 42 करोड हैक्टेयर जंगलों का सफाया हुआ। देश में खनन, सड़क, उद्योग के नामपर साल 2014 से 2019 तक एक करोड नौ लाख पचहत्तर हजार आठ सौ चवालीस पेड़ काटे गये। इस दौरान 20 गुणा से अधिक जंगल विकास यज्ञ की समिधा बने हैं। हकीकत यह है कि हर साल तकरीबन 22 लाख से ज्यादा पेड़ों की बलि विकास यज्ञ में दी जा रही है। राजस्थान में सोलर ऊर्जा के नाम पर पिछले वर्षों से खेजड़ी के हजारों – लाखों पेड़ों की हर साल बलि दी जा रही है। यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। वहां बीकानेर में नोखा दइया में खेजड़ी के पेड़ों की कटाई के विरोध में साल 2024 की जुलाई 18 से विरोध स्वरूप धरना जारी है। बीकानेर कलक्ट्रेट पर भी 18 जुलाई 2025 से किसान धरना दे रहे हैं। इन हालात में वन भूमि में कैसे बढ़ोतरी होगी, यह समझ से परे है। दरअसल आंकड़ों के जाल के तहत भारत में आधिकारिक आंकड़े कुल वन आच्छादन में भले स्थिरता दर्शाते हैं, किंतु प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता और जैव विविधता का स्तर कम होने की प्रवृत्ति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उसमें आये-दिन कमी आ रही है।वास्तविक चुनौती प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की संरचना, उनकी जैविक विविधता और उनकी पुनरुत्पादक क्षमता को सुरक्षित रखने की है। जबतक ऐसा नहीं होगा, यह संकट गहराता ही चला जाएगा। (लेखक के अपने विचार हैं)

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