अलनीनो के खतरनाक संकेत – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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अलनीनो के शुरुआती संकेत मानसून पर दिखाई देने लगे हैं। मानसून की चाल और तीव्रता पर अलनीनो का असर दिनोंदिन बढ़ता दिखाई दे रहा है। देखा जाये तो मानसून की रफ्तार धीमी होने की वजह से देश में सूखे जैसे हालात का अंदेशा बढ़ने लगा है। अक्सर जून के तीसरे हफ्ते तक देश के बड़े हिस्से को मानसून सामान्यत: कवर कर लेता है। लेकिन पिछले पखवाड़े से इसकी गति ठहरी होने का सीधा – सीधा असर बारिश पर पड़ा है जिसका नतीजा देश के आधे से ज्यादा हिस्से पर सूखे जैसे हालात हैं। संयुक्त राष्ट्र की संस्था खाद्य एवं कृषि संगठन यानी एएफओ ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि अलनीनो का भारत सहित एशिया के कई देशों की कृषि और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक असर पड़ सकता है। खासकर भारत में मानसून कमजोर होने से धान और मक्का जैसी वर्षा आधारित फसलों के उत्पादन पर खासा असर पड़ सकता है और अलनीनो के प्रभाव के चलते भारत के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है। महाराष्ट्र, ओडिसा, छत्तीसगढ, झारखंड और बिहार के बड़े हिस्से अब भी अच्छी बारिश की आस लगाये बैठे हैं। ऐसे हालात में खेती के लिए जरूरी नमी में कमी आयेगी और फसलों की बढ़ोतरी खासकर मक्का और धान के उत्पादन पर दबाव बढ़ेगा। यही नहीं इसका असर वैश्विक खाद्य बाजारों और कीमतों पर भी पड़ेगा जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। होगा यह कि उत्पादन पर असर पड़ने से जहां खाद्यान्न आपूर्ति प्रभावित होगी, वहीं कुछ देशों को आयात पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है। एएफओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत, पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया और तिमोर-लेस्ते जैसे देशों पर इसकी अत्यधिक मार पड़ेगी। इन देशों पर सूखे की मार का खतरा बढ़ सकता है। इससे इन देशों की कृषि पर आधारित लाखों लोगों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। स्काईमेट की मानें तो फिलहाल देश के लगभग आधे हिस्से में बारिश की भारी कमी है।

दरअसल अलनीनो के दौरान प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से काफी अधिक गर्म होने लगता है। नतीजन इसका असर दुनिया के कई देशों के ऊपर पड़ता है। भारत में इसका असर कमजोर मानसून और कम बारिश से जोड़ा जाता है। इतिहास इस बात का सबूत है कि ऐसी स्थिति में भारत में मौसमी बारिश न केवल कम हुयी है बल्कि उसकी असमानता भी खतरनाक स्थिति तक बढ़ी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगले आठ से दस दिनों में बदलाव के कोई संकेत नहीं हैं। आमतौर पर मानसून में ब्रेक की यह स्थिति अक्सर जुलाई या अगस्त में दिखाई देती है लेकिन इस बार मानसून की यह सुस्त रफ्तार चिंता का विषय है। इसके चलते देश का तकरीबन 48 फीसदी हिस्सा कम बारिश और 24 फीसदी इलाका अत्यधिक कम बारिश की श्रेणी में पहुंच चुका है।इलाका बार देखें तो मध्य भारत में 64 फीसदी, गुजरात में 90 फीसदी, कोंकण एवं गोवा में 84 फीसदी, मध्य महाराष्ट्र में 81 फीसदी, झारखंड में 70 फीसदी, बिहार में 40 व उत्तर प्रदेश में 24 फीसदी कम बारिश हुयी है। इसकी अहम वजह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में किसी मजबूत मौसम प्रणाली का विकसित न हो पाना है। दरअसल बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव वाले क्षेत्र और चक्रवात मानसून को मजबूती देते हैं और उसे दूसरे हिस्सों में आगे बढने में मदद करते हैं। फिर अरब सागर में लो लेवल जेट भी पर्याप्त रूप से विकसित न हो पाना भी इसकी अहम वजह है।
सबसे बड़ी बात यह है कि अलनीनो का सबसे बड़ा असर बारिश की वितरण व्यवस्था पर पड़ता है। असलियत यह है कि कई बार कुल बारिश बहुत कम नहीं होती लेकिन उसका समय और क्षेत्रीय वितरण असंतुलित हो जाने से विभिन्न राज्यों में बुआई, अंकुरण और फसल की शुरूआती बढ़ोतरी पर काफी असर पड़ता है। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता उन इलाकों को लेकर है कि जहां अब भी खेती बारिश पर ही निर्भर है। फिर देश के लगभग आधे से अधिक कृषि क्षेत्र में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था ही नहीं है। वहां किसानों की सारी उम्मीद बारिश पर ही टिकी होती है। सच्चाई यह है कि तेलंगाना , तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में सामान्य से काफी कम बारिश हुयी है। कम बारिश का असर खेती पर पड़ा है, खेती की नमी खत्म हो रही है। फसलें प्रभावित होने लगी हैं। जल भंडारण पर भी असर साफ दिखाई दे रहा है। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक देश के कुल 166 प्रमुख जलाशयों में कुल क्षमता का केवल 27.5 फीसदी पानी ही उपलब्ध है। यदि मानसून की सुस्ती लम्बे समय तक बनी रहती है तो पेयजल और सिंचाई दोनों मोर्चों पर दबाव काफी बढ़ जायेगा। जबकि मौसम विभाग का मानना है कि आने वाले दिनों में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में लू का प्रकोप जारी रह सकता है। कोंकण , गोवा, मध्य महाराष्ट्र, बिहार, तेलंगाना, विदर्भ और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में अगले कुछ दिनों गर्म हवायें चलने की आशंका है। खरीफ के सीजन के लिए जून का आखिरी हफ्ता निर्णायक हो सकता है।
मानसून की सुस्त चाल से कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल उपलब्धता पर व्यापक असर पड़ सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक का भी मानना है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर पड़ने से घरेलू आर्थिक बढ़ोतरी और मुद्रास्फीति के परिदृश्य पर दबाव पड़ेगा। यही नहीं अलनीनो का खतरा छोटी राशि का कर्ज देने वाले संस्थानों के लिए ऋण वसूली को भी प्रभावित कर सकता है। क्रिसिल की रिपोर्ट का तो यहां तक कहना है कि परिवारों के खर्च करने योग्य नगदी में कमी बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है। यही नहीं ग्रामीण आय पर अलनीनो के असर पर नजर रखने की जरूरत है।

वह बात दीगर है कि मौसम विज्ञानी अलनीनो की स्थिति हाल-फिलहाल भले ज्यादा प्रभावी न मानें लेकिन आसन्न खतरे को नजरअंदाज तो नहीं कर सकते। सितम्बर तक इसके मजबूत होने की उम्मीद की जा रही है। फिर भी हाथ पर हाथ धरे तो नहीं बैठा जा सकता। अलनीनो के संभावित खतरे को देखते हुए सरकार अलर्ट मोड पर है। दरअसल अलनीनो का खतरा केवल मौसम का मुद्दा नहीं है, बल्कि कृषि,उत्पादन, खाद्य कीमतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है। यही वजह है सरकार घबराने की जगह इससे निपटने के मूड में है और हर तरह की तैयारी रखने पर जोर दे रही है। सरकार की रणनीति केवल बारिश का इंतजार करने की नहीं है। उसकी कम बारिश होने की स्थिति से मुकाबला हेतु वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखने की है। यही कारण है कि सरकार ने राज्यों से स्थानीय परिस्थितियों के मद्देनजर फसल योजना बनाने, कम पानी में बेहतर उपज देने वाली फसलों को बढ़ावा देने और किसानों तक समय पर वैज्ञानिक सलाह पहुंचाने के लिए कहा गया है। यही नहीं अलनीनो के असर के कारण आपूर्ति में आने वाली किसी भी समस्या या कीमतों में बढ़ोतरी से निपटने के लिए सरकार ने एक रणनीतिक सुरक्षा कवच तैयार किया है। सरकार के पास 43 लाख टन रिकार्ड दलहन का भंडार है। दालों का मौजूदा सुरक्षित भंडार मई 2025 में मौजूद 18 लाख टन के मुकाबले दो गुणे से भी ज्यादा है। सरकार का मानना है कि यदि अलनीनो से खरीफ की फसल की बुआई प्रभावित होती है तो दलहन के इस सुरक्षित भंडार का इस्तेमाल किया जायेगा। अक्सर देखा गया है सरकार दावे तो बहुत करती है लेकिन जब अमल का समय आता है तो सरकारी अमले के हाथ फूल जाते हैं या उसमें लूट-खसोट और बेईमानी के चलते पीड़ित ठगे से रह जाते हैं। जरूरत है ईमानदारी, संवेदनशीलता और समयबद्ध कार्रवाई की, तभी हम अलनीनो जैसे इस गंभीर संकट का मुकाबला करने में समर्थ हो सकते हैं। (लेखक के अपने विचार हैं)

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