
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में दक्षिण के राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य तमिलनाडु में द्रविड़ ध्रुवीकरण की राजनीति को जोर का झटका लगा है। लगभग 6 दशक के अन्तराल के बाद राज्य में द्रविड़ अस्मिता तथा संस्कृति के नाम चुनाव लड़ने वाली द्रमुक तथा अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियाँ सत्ता से बाहर हो गई हैं। सत्ता में आई तमिल्लगा वेटरी कड़गम (टी वी के ) ने ये विधान सभा चुनाव धर्मनिरपेक्षता तथा सामाजिक न्याय के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था। इसके संस्थापक तथा मुखिया सी जोसफ विजय, जो तमिल फिल्मों के बड़े अभिनेता है, ने साफ कहा था कि उनकी पार्टी द्रविड़ अस्मिता तथा संस्कृति जैसे संकीर्ण मुद्दों को लेकर चुनाव नहीं लड़ेगी। इसके साथ यह भी कहा था कि उनकी पार्टी ऐसी किसी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव भी नहीं लड़ेगी।
विजय के पिता चंद्रशेखर, जो एक जाने माने फिल्म निदेशक, ईसाई हैं। उनकी शादी तब की मशहूर गायिका शोभा से हुई थी जो हिन्दू परिवार से आती है। विजय की शादी भी हिन्दू लड़की संगीता हुई है। वे माँ तथा पत्नी के साथ मंदिर में जाते है तथा माथे पर तिलक भी लगाते हैं।
इन चुनावों में पार्टी को कुल 234 में से 108 सीटों पर विजय मिली। चूँकि खुद विजय ने दो स्थानों से चुनाव लड़ा था इसलिए इसकी प्रभावी संख्या 107 है। पूर्ण बहुमत के लिए 118 सीटों विधायकों की जरूरत थी। क्योंकि टी वी के सबसे बड़े दल के रूप में समाने आई थी इसलिए विजय ने राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया। लेकिन राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर ने कहा कि पहले वे अपना बहुमत जुटाएं तभी वे उनको सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। विजय न तो द्रमुक, जिसके पास 59 विधायक हैं और न ही अन्नाद्रमुक, जिसने 47 सीटें जीती हैं, का समर्थन लेने का फैसला किया। कांग्रेस ने द्रमुक नीत प्रगातिशील धर्मनिरपेक्ष गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इसे पाँच सीटें मिली थी। कांग्रेस ने लगभग दो दशक तक राज्य में द्रमुक के साथ मिलकर चुनाव लडे हैं। फिर भी बिना किसी विलंब के कांग्रेस की आला कमान ने विजय की पार्टी को सरकार बनाने के लिए अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी। फिर दोनों वाम दलों, मुस्लिम लीग तथा वी एस के ने भी समर्थन की घोषणा कर दी. विजय के पास अब 120 विधायक हो गए थे। और उन्होंने अपना दावा फिर से पेश किया तथा अगले दिन ही उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली।
उधर द्रमुक ने सरकार का बाहर से समर्थन करने की घोषणा कर दी। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और द्रमुक के मुखिया एम् के स्टालिन का कहना था कि वे इसलिए समर्थन देने को तैयारथे क्योंकि वे और उनकी पार्टी इस मत की है कि राज्य में कोई भी सरकार बने वह स्थिर होनी चाहिए ताकि राज्य की विकास योजनायें प्रभावित नहीं हो।
उधर अन्नाद्रमुक, जिसके पास 47 विधायक है, में मतभेद पैदा हो गए। एक वर्ग चाहता था कि विजय के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन करना चाहिए। जबकि दूसरा वर्ग इसके विरुद्ध था। मजे की बात यह थी कि विजय ने अपनी ओर से इन दोनों में से किसी एक का भी समर्थन नहीं माँगा था। विजय ने अपने चुनावी भाषणों में ही साफ़ कर दिया था कि वे इन दोनों दलों से दूरी बना कर चलेंगे।
आखिर में अन्नाद्रमुक में इसको लेकर दो गुट बन गए। पार्टी के एक बड़े नेता वेलुमनी ने घोषणा कर दी कि वे और उनके साथी विधेयक विधान सभा में सरकार द्वारा बहुमत सिद्ध करने के प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करेगें। वेलुमनी, अन्नाद्रमुक के महासचिव तथा राज्य के कभी मुख्यमंत्री रहे पालनिस्वामी के बड़े विश्वासपात्र थे। पार्टी में उनका रुतबा भी पार्टी के महा सचिव् से कम नहीं था। मतदान के समय पार्टी के 47 विधायकों में से 25 ने सरकार के बहुमत मत के प्रस्ताव पर सरकार का साथ दिया। जोसफ विजय की सरकार के पक्ष में कुल 144 मत पड़े जो सामान्य बहुमत से कहीं अधिक थे। एक समय ऐसा दिखने लगा था कि कि अन्नाद्रमुक के कम से कम 35 विधायक सरकार के पक्ष में मतदान करेंगे। चूँकि 35 के आंकड़े से इस गुट के पास दो तिहाई विधायक हो जाते। इससे दल बदल कानून के अंतर्गत वे सदन की सदस्यता से अयोग्य नहीं हो पाते।
मतदान के तुरंत बाद अन्नाद्रमुक के महासचिव पालनिस्वामी ने विधानसभा के अध्यक्ष को एक पत्र लिख कर कहा कि चूँकि पार्टी के 25 विधायकों ने पार्टी के व्हिप का उल्लंघन किया है इसलिए उनकी सदन की सदस्यता को समाप्त किया जाये। फिलहाल अध्यक्ष ने इस मुद्दे पर कोई निर्णय नहीं किया है। उधर वेलुमनी ने भी अपना रुख बदल लिया है। वे चाहते है कि पालनिस्वामी अध्यक्ष को लिखे अपने पत्र को वापिस ले लें।
इन चुनावों के बाद यह साफ़ हो गया कि राज्य में द्रविड़ अस्मिता तथा संस्कृति को मुद्दा बना कर चुनाव लड़ने वाले दलों के अब बुरे दिन आ गए है। वे सत्ता में आने के लिए बेताब हो रहे हैं। (लेखक के अपने विचार है)