क्या योग सिर्फ आसन है?” — एक युवा का प्रश्न

झोला क्वीन डॉ. अनुभा पुंढीर की
योग, भरतनाट्यम, भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण चेतना की प्रेरक यात्रा
जब अधिकांश लोग योग को केवल व्यायाम और भरतनाट्यम को केवल एक नृत्य शैली मानते हैं, तब डॉ. अनुभा पुंडीर इन दोनों को जीवन जीने की समग्र भारतीय पद्धति के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर, शोधकर्ता, पर्यावरण कार्यकर्ता और भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रचारक डॉ. अनुभा पुंडीर पिछले लगभग 35 वर्षों से योग और भरतनाट्यम की साधना कर रही हैं। शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और भारतीय ज्ञान प्रणाली के क्षेत्र में उनके योगदान ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।
वर्ष 2012 में प्रारम्भ हुए उनके “झोला अभियान” ने उत्तराखंड, राजस्थान तथा भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में व्यापक जन-जागरूकता उत्पन्न की। कपड़े के झोले को पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बनाकर उन्होंने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के विरुद्ध एक सामाजिक आंदोलन खड़ा किया। इसी कारण आज वे पूरे देश में “झोला क्वीन” के नाम से जानी जाती हैं।

लेखिका : डा. अनुभा पुंढीर
एसोसिएट प्रोफेसर, ग्राफिक इरा यूनिवर्सिटी, देहरादून
लेखिका देश में झोला क्वीन के नाम से विख्यात पर्यावरणविद व ग्राफिक इरा यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर है।
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एक विश्वविद्यालय के कार्यक्रम के बाद एक युवक मेरे पास आया।
वह लगभग 20 वर्ष का होगा।
उसने कहा—
“मैम, मैं पिछले कई वर्षों से योग कर रहा हूँ। सूर्य नमस्कार करता हूँ, प्राणायाम करता हूँ, ध्यान भी करता हूँ। लेकिन आज मेरे मन में एक सवाल आया है।”
मैंने कहा—
“पूछो बेटा।”
उसने कहा—
“क्या योग सिर्फ आसन है?”
उसका प्रश्न सुनकर मैं कुछ क्षणों के लिए मौन हो गई।
क्योंकि यह प्रश्न केवल उसका नहीं था।
आज की पूरी पीढ़ी का प्रश्न है।
हम योग को इंस्टाग्राम की तस्वीरों में देखते हैं।
कठिन आसनों में देखते हैं।
फिटनेस वीडियोज़ में देखते हैं।
लेकिन क्या वास्तव में योग इतना ही है?
मैंने उससे कहा—
“यदि योग केवल आसन होता, तो हमारे ऋषियों ने हजारों वर्षों तक जंगलों में बैठकर उसकी साधना नहीं की होती।”
योग शरीर को मोड़ने की कला नहीं है।
योग जीवन को जोड़ने की कला है।
योग का अर्थ है—
अपने शरीर, मन, बुद्धि, व्यवहार, परिवार, समाज, प्रकृति और अंततः परम चेतना को एक सूत्र में जोड़ना।
आज का युवा सुबह योग करता है।
लेकिन क्या वह अपने माता-पिता से प्रेम और सम्मान से बात करता है?
यदि नहीं,
तो योग अधूरा है।
वह ध्यान करता है।
लेकिन क्या वह मोबाइल और सोशल मीडिया की लत पर नियंत्रण रख पाता है?
यदि नहीं,
तो योग अधूरा है।
वह प्राणायाम करता है।
लेकिन क्या वह अपने शब्दों से किसी को चोट पहुँचाने से बचता है?
यदि नहीं,
तो योग अधूरा है।
योग केवल शरीर को स्वस्थ बनाने का विज्ञान नहीं है।
योग चरित्र निर्माण का विज्ञान है।
एक विद्यार्थी के जीवन में योग
एक छात्र के लिए योग का अर्थ केवल सुबह का एक घंटा नहीं है।
योग तब है—
जब परीक्षा के तनाव में भी वह ईमानदारी नहीं छोड़ता।
जब प्रतियोगिता के बीच भी वह दूसरों की सफलता से ईर्ष्या नहीं करता।
जब वह नकल करने की बजाय परिश्रम को चुनता है।
जब वह असफलता को स्वीकार कर पुनः प्रयास करता है।
जब वह अपने शिक्षक का सम्मान करता है।
जब वह अपने माता-पिता के संघर्ष को समझता है।
जब वह अपनी बहन, मित्र और समाज की महिलाओं का सम्मान करता है।
यह सब योग है।
ध्यान क्या है?
आज अधिकांश युवा सोचते हैं कि ध्यान का अर्थ आँखें बंद करना है।
नहीं।
ध्यान का अर्थ है—
जहाँ हो, पूरी तरह वहीं होना।
यदि तुम पढ़ाई कर रहे हो और मन पाँच जगह नहीं भटक रहा—
वह ध्यान है।
यदि तुम अपने मित्र की बात पूरे मन से सुन रहे हो—
वह ध्यान है।
यदि तुम भोजन करते समय मोबाइल नहीं देख रहे—
वह ध्यान है।
यदि तुम अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र हो—
वह ध्यान है।
योग और पर्यावरण
फिर मैंने उस युवक से पूछा—
“तुम योग करके घर जाते समय प्लास्टिक की बोतल सड़क पर फेंक देते हो?”
वह बोला—
“नहीं मैम।”
मैंने कहा—
“अच्छा है, क्योंकि यदि तुम ऐसा करते तो तुम्हारा योग अधूरा होता।”
योग हमें प्रकृति से जोड़ता है।
जो व्यक्ति पृथ्वी का सम्मान नहीं करता,
वह योग को नहीं समझ सकता।
जब तुम बाजार जाते समय अपना कपड़े का झोला साथ रखते हो—
वह भी योग है।
जब तुम एक प्लास्टिक बैग कम उपयोग करते हो—
वह भी योग है।
जब तुम पानी बचाते हो—
वह भी योग है।
जब तुम पेड़ लगाते हो और उसकी देखभाल करते हो—
वह भी योग है।
योग और पशु-पक्षी
भारतीय ज्ञान परंपरा हमें सिखाती है—
“सर्वे भवन्तु सुखिनः”
सिर्फ मनुष्य नहीं।
सभी जीव।
जब गर्मियों में तुम पक्षियों के लिए पानी रखते हो—
वह योग है।
जब किसी घायल पशु की सहायता करते हो—
वह योग है।
जब तुम जीवों के प्रति करुणा रखते हो—
वह योग है।
योग और नागरिकता
योग केवल व्यक्तिगत विकास नहीं है।
योग सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
यदि तुम ट्रैफिक नियमों का पालन करते हो—
वह योग है।
यदि तुम सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखते हो—
वह योग है।
यदि तुम देश के संसाधनों का सम्मान करते हो—
वह योग है।
यदि तुम भ्रष्टाचार को “सिस्टम का हिस्सा” मानकर स्वीकार नहीं करते—
वह योग है।
भारतीय ज्ञान परंपरा क्या कहती है?
भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) में योग केवल आसन नहीं है।
योग है—
यम,
नियम,
आसन,
प्राणायाम,
प्रत्याहार,
धारणा,
ध्यान,
और समाधि।
आसन तो आठ चरणों में से केवल एक चरण है।
हमने योग के विशाल वृक्ष की केवल एक शाखा पकड़ ली है।
जड़ों तक पहुँचना अभी बाकी है।
उस युवक को मेरा उत्तर
मैंने उससे कहा—
“जिस दिन तुम्हारा व्यवहार बदल जाएगा, तुम्हारे विचार शुद्ध हो जाएँगे, तुम अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञ हो जाओगे, प्रकृति के प्रति संवेदनशील हो जाओगे, समाज के प्रति जिम्मेदार हो जाओगे, और अपने भीतर की अच्छाई को पहचान लोगे— उस दिन तुम योग करना नहीं, योग जीना शुरू कर दोगे।”
वह मुस्कुराया।
शायद उसे उत्तर मिल गया था।
और शायद हमें भी।
क्योंकि—
आसन शरीर को स्वस्थ बनाते हैं।
ध्यान मन को शांत बनाता है।
लेकिन योग मनुष्य को बेहतर इंसान बनाता है।
और यही योग की वास्तविकता है।
यही भारतीय ज्ञान परंपरा का संदेश है।
यही वह योग है जिसकी आज के युवाओं को सबसे अधिक आवश्यकता है।
समापन उद्धरण
“योग वह नहीं जो हम सुबह एक घंटे करते हैं; योग वह है जो हम दिन के चौबीस घंटे जीते हैं।”
(लेखिका के अपने विचार हैं)

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