
निशांत की रिपोर्ट
लखनऊ (यूपी) से
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समुद्र कभी सिर्फ पानी नहीं होता।
उसके भीतर व्यापार चलता है, राजनीति चलती है, देशों की सांस चलती है।
और जब वही समुद्र अचानक बंद हो जाए, तो असर सिर्फ बंदरगाहों पर नहीं पड़ता।
रसोई तक पहुंचता है। खेत तक पहुंचता है। बिजली के बिल तक पहुंचता है।
इस बार दुनिया ने यही देखा है।
मध्य पूर्व में ईरान के साथ शुरू हुए युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में आई बाधा ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ार को हिला दिया है। की नई रिपोर्ट कहती है कि यह 1973 के अरब ऑयल एम्बार्गो के बाद सबसे बड़ा ऊर्जा झटका है। लगभग 18.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल सप्लाई प्रभावित हुई है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा है। साथ ही दुनिया के करीब 20 प्रतिशत LNG व्यापार और एक-तिहाई उर्वरक व्यापार पर असर पड़ा है।
रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह नहीं कि तेल महंगा हुआ।
बल्कि यह कि दुनिया अब पहली बार ऐसे ऊर्जा संकट में है, जहां विकल्प मौजूद हैं।
तेल की कीमतें करीब 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 90 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। एशिया में LNG की कीमतें दोगुने से ज्यादा बढ़ गईं। इसका असर ट्रांसपोर्ट, खाना, बिजली और खेती की लागत पर दिखने लगा है।
भारत जैसे देशों के लिए यह सिर्फ विदेशी खबर नहीं है।
क्योंकि होर्मुज़ से गुजरने वाला 84 प्रतिशत कच्चा तेल और 80 प्रतिशत LNG एशियाई देशों के लिए ही जाता है।
रिपोर्ट में भारत का एक उल्लेख बहुत कुछ कह जाता है।
LPG की कमी के बाद भारत में इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री 3 गुना से लेकर 30 गुना तक बढ़ गई।
यानी लोगों ने इंतजार नहीं किया कि सरकारें क्या करेंगी।
उन्होंने खुद विकल्प तलाशने शुरू कर दिए।
रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत के पास रणनीतिक तेल भंडार केवल लगभग 10 दिन की मांग के बराबर है।
ऐसे में लंबे समय तक संकट बना रहा तो असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा। खेती, ट्रांसपोर्ट, छोटे कारोबार, होटल, ढाबे, सब प्रभावित होंगे।
दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में रेस्तरां ने समय घटा दिए हैं। कुछ जगह उत्पादन सीमित करना पड़ा है। पाकिस्तान ने दुकानों और रेस्तरां के समय सीमित किए। श्रीलंका ने चार दिन का कार्य सप्ताह लागू किया। बांग्लादेश ने विश्वविद्यालय बंद किए और बिजली बचाने की अपील की।
लेकिन इसी संकट के बीच एक दूसरा दृश्य भी उभर रहा है।
भारत में सोलर आयात एक साल में 141 प्रतिशत बढ़ा।
भारत अब पवन ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज परियोजनाओं को तेजी से मंजूरी दे रहा है।
रिपोर्ट का केंद्रीय तर्क यही है कि जीवाश्म ईंधन आधारित व्यवस्था असल में बेहद नाजुक है।
क्योंकि वह लगातार चलती सप्लाई चेन पर निर्भर है। जहाज रुकते हैं तो संकट शुरू हो जाता है।
इसके उलट सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बैटरियां और इलेक्ट्रिक वाहन एक बार स्थापित होने के बाद वर्षों तक ऊर्जा देते रहते हैं। उनका बड़ा खर्च शुरुआत में होता है। बाद में वे वैश्विक तेल बाज़ार की हर हलचल से प्रभावित नहीं होते।
रिपोर्ट कहती है कि अगर मौजूदा ऊंची कीमतें बनी रहीं, तो दुनिया को 2026 में केवल महंगे तेल और गैस खरीदने पर अतिरिक्त 1 से 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं। यह रकम लगभग उतनी ही है जितनी हर साल स्वच्छ ऊर्जा बदलाव के लिए अतिरिक्त निवेश की जरूरत बताई जाती है।
यानी दुनिया के सामने सवाल अब सिर्फ जलवायु परिवर्तन का नहीं रह गया है।
सवाल यह भी है कि क्या भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था ऐसी होगी, जिसे कोई एक समुद्री रास्ता बंधक बना सके?
दिलचस्प बात यह है कि इस बार ऊर्जा संकट का जवाब सिर्फ और ज्यादा तेल निकालना नहीं माना जा रहा।
रिपोर्ट साफ कहती है कि नई तेल और गैस परियोजनाएं शुरू करने में 5 से 10 साल लग सकते हैं। लेकिन रूफटॉप सोलर, बैटरियां, हीट पंप और EV कुछ महीनों में लगाए जा सकते हैं।
यानी शायद पहली बार दुनिया यह समझ रही है कि क्लाइमेट एक अलग मुद्दा नहीं है।
ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई, भू-राजनीति और जलवायु अब एक ही कहानी के अलग-अलग अध्याय हैं। (लेखक का अपना अध्य्यन एवं अपने विचार है)