भूजल संरक्षण एवं दोहन की हकीकत – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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यह सर्वविदित है कि जीवन की सृष्टि जल से है। यह भी कटु सत्य है कि इसकी प्राप्ति के भूजल व सतही जल दो ही मुख्य महत्वपूर्ण स्रोत हैं। देखा जाये तो धरती पर अधिकांश जल की आपूर्ति भूजल से ही होती है। भूजल पानी का वह महत्वपूर्ण स्रोत है जिसे पानी के अनंत भंडार की संज्ञा दी गयी है। लेकिन दुखद यह है कि इसका इतना बेतहाशा दोहन किया गया है जिसके चलते देश में भूजल का स्तर इतना नीचे चला गया है जो न केवल गहराते जल संकट को जन्म दे रहा है, पर्यावरणीय-पारिस्थितिक तंत्र को भी असंतुलित कर रहा है बल्कि भूवैज्ञानिक असंतुलन का भी कारण बन रहा है। सच तो यह है कि भारत में भूजल दोहन की स्थिति काफी भयावह है। देश में कुल सालाना भूजल निकासी लगभग 245-246 बिलियन क्यूबिक मीटर यानी बीसीएस है जो दुनियाभर में सबसे ज्यादा है। इससे देश की 80 फीसदी पेयजल जरूरतों और लगभग 64 फीसदी सिंचाईकी जरूरत पूरी होती है। देश में 267 जिलों में भूजल दोहन का स्तर 64 से लेकर 385 फीसदी है। संसद की लोक लेखा समिति ने केंद्र के जल शक्ति मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह राज्यों से भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने और भूजब संसाधनों की दीर्घकालिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाने को राजी करे। हकीकत यह है कि देश अपनी सालाना पुनर्भरण क्षमता का भारी हिस्सा निकाल रहा है जिससे देश के हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और दिल्ली के कई इलाके गंभीर स्थिति का सामना करते हुए ‘डार्क जोन’ मे आ चुके हैं। पंजाब में तो भूजल दोहन संघारणीय सीमा से 1.5 गुणा से भी ज्यादा हो गया है। नतीजतन जल गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ रहा है। राजस्थान के 27 जिले डार्क जोन में हैं जहां रिचार्ज से डेढ गुणा से भी कहीं ज्यादा पानी निकाला जा रहा है। वहीं बिहार के 14 जिलों में भूजल स्तर ढाई फीट गिर गया है। पिछले साल की तुलना में इस साल सबसे ज्यादा भूजल स्तर में गिरावट सारण और शेखपुरा जिलों में दर्ज की गयी है।
असलियत में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली में भूजल दोहन सौ फीसदी से भी ज्यादा है यानी यहां पुनर्भरण से ज्यादा पानी निकाला जा रहा है। वहीं कुछ जिलों में यह स्थिति 385 फीसदीतक पहुंच गयी है। इसका खुलासा संसद की लोक लेखा समिति ने अपनी ” भूजल प्रबंधन और विनियमन” रिपोर्ट में किया है। समिति ने इसे बहुत बड़ा खतरा बताते हुए कहा है कि केंद्र इस पर तत्काल अंकुश लगाये और कड़े कदम उठाये। पंजाब के तो 85 फीसदी ब्लाक अति शोषित की श्रेणी में हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार और दिल्ली के साथ कर्नाटक, तमिलनाडु की स्थिति भी भूजल के मायने में काफी गंभीर है। दरअसल इस बाबत कृषि के साथ-साथ विशाल स्तर पर किये जा रहे औद्योगिकीकरण और भौतिकवादी जीवन दर्शन ने महत्वपूर्ण भूमिका निबाही है। असलियत में भारत दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल निकालने वाला देश है जहां की तकरीब 60 करोड़ आबादी भूजल पर ही निर्भर है। यह संकट उन गरीब तबकों के लोगों को ज्यादा प्रभावित करता है जो पानी के वैकल्पिक स्रोत वहन करने में असमर्थ हैं। वैश्विक निकासी की दर लगभग 25 फीसदी से भी ज्यादा है। यहां निकाले गये पानी का 87 में से 90 फीसदी हिस्सा कृषि और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है। यहां कुल सिंचाई का लगभग 62 फीसदी, ग्रामीण पेयजल का 85 फीसदी और शहरी पानी की मांग का 50 फीसदी भूजल पर ही निर्भर है। भूजल स्तर में तेजी से गिरावट की मुख्य वजह कृषि कार्यों हेतु बढ़ता भूजल दोहन और बढ़ता प्रदूषण है। अत्याधिक भूजल दोहन के कारण देश के 400 से ज्यादा जिलों के भूजल में फ्लोराइड, आर्सैनिक और नाइट्रेट जैसे जहरीले तत्व मौजूद हैं। इससे वहां पीने का पानी गंभीर रूप से दूषित हो गया है जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें भयावह रूप से पैदा हो रही है। जलभृतों यानी एक्यूफायर की प्राकृतिक भंडारण क्षमता समाप्त हो रही है। साथ ही भूजल खत्म होने से भूधंसाव जैसी समस्यायें आयेदिन बढ़ रही हैं।नतीजतन ढांचागत नुकसान का खतरा लगातार बढता जा रहा है।
जहां तक देश की राजधानी दिल्ली का सवाल है, में पानी की कमी को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का अवैध दोहन हो रहा है। नतीजतन राजधानी में भूजल स्तर तेजी से गिरता जा रहा है। हालात सबूत हैं कि दिल्ली का भूजल स्तर तेजी से पाताल में समा रहा है।पिछले पांच सालों में ही यहां का भूजल स्तर साढ़े चार मीटर से नीचे चला गया है। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण द्वारा एनजीटी में पेश रिपोर्ट में यह खुलासा किया है।प्राधिकरण की मानें तो 2020 में जब दिल्ली की आबादी करीब दो करोड़ थी तब जमीन की सतह से 64.1 मीटर नीचे पानी मिल जाता था जबकि 2025 में जब दिल्ली की आबादी दो करोडो 22 लाख को पार कर गयी तब भूजल स्तर 68.69 मीटर नीचे चला गया। रिपोर्ट के मुताबिक आज दिल्ली में भूजल दोहन की स्थिति बेहद गंभीर है। राजधानी के कुछेक इलाके ही अर्ध गंभीर की श्रेणी में हैं। जबकि औसतन हालात गंभीर हैं। बहुतेरे शोध- अध्ययन इस बात के सबूत हैं कि देश की राजधानी अवैध भूजल दोहन के चलते तेजी से ‘डे जीरो’की ओर बढ़ रही है। यह सब वर्षाजल संचय व संरक्षण में नाकामी का सबूत है।।वह बात दीगर है कि दिल्ली सरकार दिल्ली में पानी की कमी को पूरी करने की खातिर बेहतर प्रबंधन पर जोर दे रही है। अब 520 ट्यूबवैल लगाये गये हैं। राजधानी के 77 तालाबों के कायाकल्प करने की तैयारी की जा रही है। राज्यपाल द्वारा जलसंचय अभियान की शुरुआत की जा रही है। विडम्बना यह है कि यह प्रयास अब जब गर्मी अपने चरम पर है,तब किये जा रहे हैं जबकि पानी के संकट की चेतावनी पिछले साल अगस्त महीने में ही दिल्ली विधानसभा में रोहताश नगर विधायक जितेंद्र महाजन दे चुके थे।सबसे बड़ी बात कचरे के पहाड़ का जहर जो बोरवेल तक पहुंच चुका है, जिससे भूमिगत जल बुरी तरह प्रदूषित है,उस ओर किसी का ध्यान नहीं है। जबकि कचरे के पहाड़ों के जहर से भूमिगत जल में मानकों से कई गुणा ज्यादा अशुद्धियां परीक्षणों में मिली हैं। समझ नहीं आता ऐसी हालत में भी दिल्ली सरकार दिल्ली वालों को किस आधार पर साफ पानी देने का दावा कर रही है।
भूजल की यह हालत अकेले देश की राजधानी की ही नहीं है, एन सी आर के दूसरे गाजियाबाद, फरीदाबाद, नौएडा, गुरुग्राम आदि शहरों की भी है। फरीदाबाद तो डार्क जोन की श्रेणी में है ही। वहां यमुना किनारे के इलाकों में भूजल स्तर 35 मीटर तक नीचे चला गया है। नदी किनारे के रेनीवेल सूख रहे हैं। फरीदाबाद मेट्रोपोलिटन डवलपमेंट अथारिटी केन्द्रीय भूजल बोर्ड के साथ अब सर्वे कराने में व्यस्त है। नौएडा में पिछले छह सालों में 16 मीटर भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की गयी है। यही हाल कमोबेश गाजियाबाद का भी है। इसमें भ्रष्ट और लापरवाह तंत्र की अहम भूमिका है जो पानी के गंभीर संकट के लिए काफी हदतक जिम्मेदार है। असलियत में यह संकट राजधानीवासियों के जीवन को खतरे में डाल रहा है। आने वाले समय में देश के दिल्ली के अलावा जयपुर, चेन्नई, हैदराबाद जैसे दूसरे शहरों की भी यही स्थिति होगी। इसमें दो राय नहीं है। डब्लू एच ओ,सी एस ई और यू एन जैसे संगठन तो इस बारे में पहले ही चेता चुके हैं।
भूजल के अत्यधिक दोहन और उसके प्रदूषण पर चिंता जाहिर करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने कहा है कि भूजल संरक्षण के लिए बने नियम जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो रहे हैं। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य ए.सेथिल वेल व अफरोज अहमद की पीठ ने पिछले दिनों सख्त रवैय्या अपनाते हुए विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति में पीठ ने राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारतीय प्रौद्योगिकीय संस्थान रुड़की के विशेषज्ञ और केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण के सदस्यों को शामिल किया है। पीठ ने इस बात पर दुख व्यक्त करते हुए कहा है कि केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण सीजीडब्ल्यूए की रिपोर्ट से यह साफ है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अवैध भूजल दोहन रोकने और जल स्तर सुधारने की दिशा में पर्याप्त कदम नहीं उठाये हैं। यह भी कि इंडो-गंगेटिक बेसिन के बहुतेरे इलाके पहले ही भूजल के खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके हैं। यह तब है जबकि देश के उत्तर-पश्चिमी इलाके में भूजल गंभीर रूप से कम होने का अनुमान है। एनजीटी की पीठ ने समिति से अपेक्षा की है कि वह राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों की रिपोर्ट का अध्ययन करे, नियमों की पालना में कमियों की पहचान करे और जल संकट वाले इलाकों मे भूजल दोहन रोकने व जलस्तर बढ़ाने के उपाय सुझाने के साथ-साथ राज्य विशेष व सामान्य दोनों तरह की सिफारिशें पीठ को दें।
आज जब संयुक्तराष्ट्र के मुताबिक दुनिया ‘ जल दिवालियेपन ‘ के कगार पर है और यूनेस्को की मानें तो दुनिया की दस फीसदी आबादी गंभीर जल संकट का सामना कर रही है। यह संकट समय के साथ-साथ और गहराता चला जायेगा। दुख इस बात का है कि इसके बावजूद लोग जल संकट की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं। उस स्थिति में भी जबकि पानी का उपभोग जलधारण क्षमताओं से बहुत ही ज्यादा हो रहा है। जल स्रोत दिनबदिन सूखते जा रहे हैं। दुनिया में दो अरब लोग साफ और सुरक्षित जल के लिए संघर्ष कर रहे हैं, दुनिया के लगभग तीन चौथाई आबादी ऐसे देशों में रहने को मजबूर है जहां जल को असुरक्षित या गंभीर रूप से असुरक्षित श्रेणी में रखा गया है, वहीं लगभग चार अरब लोग हरसाल कम से कम एक महीने के लिए गंभीर रूप से जल संकट का सामना करते हैं और पानी की कमी के चलते दुनिया में तेजी से विस्थापन लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में इंसान को ही पानी के महत्व को समझते हुए कुछ करना होगा। इसमें दो राय नहीं कि भूजल भंडारों की क्षतिपूर्ति केवल और केवल वर्षाजल से ही संभव है। लेकिन दुखद स्थिति यह है कि हम उसे संरक्षित कर पाने में आज भी नाकाम हैं। जबकि हमें तकरीबन 40 करोड़ हैक्टेयर मीटर वर्षाजल प्राप्त होता है। इसमें से लगभग साढे ग्यारह करोड़ हैक्टेयर मीटर पानी नदियों में बह जाता है। 7 करोड़ हैक्टेयर मीटर पानी जल वाष्प बनकर उड़ जाता है। और लगभग 12 करोड़ हैक्टेयर पानी धरती सोख लेती है। ऐसी स्थिति में वर्षाजल संरक्षण ही जल संकट से मुक्ति का एकमात्र रास्ता है जिससे हम धरती का पेट भर सकते हैं। दुखद यह है कि इस मामले में स्थानीय लोगों की सीमित भागीदारी सबसे बड़ी रुकावट है। जल संकट की भयावहता समझना सरकार के साथ-साथ हर नागरिक का दायित्व है। जल संचय, उसका संरक्षण और उसका उचित प्रबंधन ही जल संकट से उबरने का एकमात्र उपाय है, इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)

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