
जाफ़र लोहानी
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मनोहरपुर (जयपुर)। गठवाड़ी गांव में श्री श्याम बाबा का विशाल जागरण हुआ। भजन, कीर्तन, जयकारे। पर सबसे बड़ी ‘आरती’ तब हुई जब मंच से आवाज आई – “किन्नर सिमरन बाई को सम्मानित किया जाता है”।
पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठा। क्यों? क्योंकि ये ‘ताली बजाने वाली’ नहीं, ‘ताली बजवाने वाली’ है।
सिमरन-नामा’
‘गरीबों को खाना = अन्नपूर्णा का रूप
लॉकडाउन में जब लोग घरों में दुबके थे, सिमरन बाई गली-गली घूमकर कई थाली रोज बांटती थी। आज भी हर अमावस-पूर्णिमा को ‘खाने का भंडारा’ लगाती है। भूखा कोई ना सोए – ये उसका नियम है।
बेसहारों का सहारा’ = मां का दर्जा
जिस बेटी को बाप ने घर से निकाला, जिस बूढ़ी को बेटे ने ठुकराया – सिमरन बाई का दरवाजा 24 घंटे खुला 15 बेसहारा बच्चियों की पढ़ाई, 7 बुजुर्गों का इलाज – अपने खर्चे पर।
लोग कहते हैं “ताली बजाने वाले के पास दिल नहीं होता”, अरे, दिल तो इसी के पास है।
‘गऊ भक्त’ = गोपाल की सेवक
गांव की गोशाला में हर महीने चारा दान। गर्मी में गायों के लिए पानी के टैंकर। बीमार गाय का इलाज अपनी जेब से। बोली – “गऊ हमारी माता, मैं माता की बेटी”।
‘सामूहिक विवाह’ = बेटियों का कन्यादान
पिछले 3 साल में कई गरीब कन्याओं की शादी करवाई। हर बेटी को बेड, बर्तन, पायल-बिछुआ। मुंह बोली मां बनकर विदा किया। दहेज नहीं, ‘आशीर्वाद’ दिया।
जागरण में ‘सम्मान’ का सीन
श्री श्याम सेवा समिति के अध्यक्ष ने शॉल ओढ़ाई, श्रीफल दिया, माइक पर बोले – “सिमरन बाई किन्नर नहीं, ‘किन्नर के भेष में देवी’ है”। सिमरन बाई मंच पर रो पड़ी। बोली – “जिंदगी में पहली ‘इंसान’ कहकर बुलाया है”।
पूरा पंडाल नम हो गया साहब।
‘समाज को आईना
जिसे बस-ट्रेन में देखकर हम मुंह फेर लेते हैं, वो हमारी भूख मिटा रही है। जिसे ‘तीसरा’ कहकर दुत्कारते हैं, वो ‘पहली’ पंक्ति में दान दे रही है।
शर्म उन ‘मर्दों’ को आनी चाहिए जो AC में बैठकर भी 100 रुपये दान नहीं करते।
‘सिमरन बाई के 3 अनमोल बोल
“ताली बजाकर मांगना पाप नहीं, भूखे को खिलाना पुण्य है”
“भगवान ने मुझे ‘किन्नर’ बनाया, पर ‘कर्म’ मेरे हाथ में दिए”
“इज्जत कपड़ों से नहीं, करमों से मिलती है”
आखिरी पंच’
श्याम बाबा ने गीता में कहा था – “कर्म ही पूजा है”। सिमरन बाई रोज श्याम बाबा की ‘लाइव पूजा’ कर रही है।
मंदिर में घंटी बजाने से बड़ा पुण्य, भूखे के पेट में घंटी बजाना है।