
लेखक से बड़ा कोई योद्धा नहीं
जाफर लोहानी
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मनोहरपुर (जयपुर)। दयालु भामाशाह मोहन कुड़ी ने कहा कि आज 1 नवंबर, राष्ट्रीय लेखक दिवस है। यह दिन उन सभी कलमकारों के नाम है, जो अपनी लेखनी से समाज को नई दिशा देते हैं। लेखक केवल किताबें नहीं लिखते, वे समाज का आइना होते हैं। उनकी कलम सत्ता से सवाल करती है, गरीब की आवाज बनती है और आने वाली पीढ़ी के लिए इतिहास लिखती है।
राष्ट्रीय लेखक दिवस क्यों मनाया जाता है?
राष्ट्रीय लेखक दिवस की शुरुआत अमेरिका में 1928 में नेली वर्ना बर्ट मैकफर्सन ने की थी। उनका मानना था कि लेखकों के बिना समाज अधूरा है। धीरे-धीरे यह दिन पूरी दुनिया में मनाया जाने लगा। भारत में 1 नवंबर को इस दिन को इसलिए भी खास माना जाता है क्योंकि आज ही के दिन कई राज्यों का गठन हुआ और साहित्य के क्षेत्र में नई चेतना का विकास हुआ।
आज के दौर में पत्रकार व लेखक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण
कुड़ी ने इस अवसर पर कहा कि, आज जब लोकतंत्र, वोट के अधिकार और देश की एकता पर सवाल उठ रहे हैं, तब एक निष्पक्ष लेखक और पत्रकार की भूमिका एक सिपाही से भी बड़ी हो जाती है। इंदिरा जी ने और सरदार पटेल ने जिस एकता की बात की थी, उसे लेखक ही अपनी कलम से जिंदा रख सकते हैं।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में हर व्यक्ति लेखक है, लेकिन सच्चा लेखक वही है जो सच लिखने की हिम्मत रखे।
मनोहरपुर-आंधी क्षेत्र के लेखकों का योगदान
हमारा शाहपुरा-मनोहरपुर-आंधी क्षेत्र भी साहित्य के मामले में धनी रहा है। यहां के कई लोक कवि, पत्रकार और युवा लेखक हैं जो ग्रामीण समस्याओं, किसान, शिक्षा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर लगातार लिख रहे हैं। दिव्य जनजागृति समाचार हमेशा से ऐसे कलमकारों को मंच देता रहा है।
एक अपील
राष्ट्रीय लेखक दिवस पर हम सभी का कर्तव्य है कि हम अपने क्षेत्र के एक बुजुर्ग लेखक, एक शिक्षक या एक युवा कवि व पत्रकार को सम्मानित करें। उसकी एक रचना को साझा करें। क्योंकि कहा गया है –
“तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है कलम, और लेखक से बड़ा कोई योद्धा नहीं होता।”