
लेखक : डा. संजय राणा
लेखक पूर्व पुलिस अधिकारी व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
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वर्षा ऋतु आ रही है, व्यवस्थाएं फिर करोड़ों पौधों का रोपण कार्यक्रम बनाएगी,फिर से कागजों पर योजनाएं बनाई जाएंगी, देश के कर्णधार फिर से एक पेड़ मां के नाम लगाने का आव्हान करेंगे और फिर से एक पौधे को लगाने के लिए बीस – बीस हाथ लगा कर फोटो खिंचवाए जाएंगे। वर्षा ऋतु बीत जायेगी, न पौधों को मालूम होगा कि हाथ लगाने वाले, फोटो खिंचवाने वाले कहां हैं और न ही फोटो में दिखाई देने वाले लोगों को मालूम होगा कि उनके द्वारा लगाया गया पौधा किस हाल में कैसा और कहां है। व्यवस्थाएं फिर विकास के नाम पेड़ो को काटने में मस्त होंगी और समाज अपने – अपने कामों में। तभी तो भारत विश्व में दूसरे नंबर पर पेड़ काटने की लिस्ट में आता है।
आज सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में समाज एवं व्यवस्थाओं के अंदर एक विचित्र प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है। सेवा कम और प्रदर्शन और नारे अधिक दिखाई देने लगे हैं। समाज एवं व्यवस्थाओं में पर्यावरण और मानवता के नाम पर काम करने वालों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन उनके कार्यों की आत्मा कहीं पीछे छूटती प्रतीत होती है। यही कारण है कि आज हर ओर स्वयंभू उपाधियों की भरमार दिखाई देती है — कोई स्वयं को पर्यावरण प्रहरी कहता है तो कोई पर्यावरणविद्, कोई जल योद्धा तो कोई जल पुरुष, कोई जल महिला,कोई ग्रीन मैन, ग्रीन वुमन, वृक्ष मित्र, धरती पुत्र या धरती मित्र, कोई प्रकृति रक्षक तो कोई प्रकृति प्रेमी, कोई पुत्र,नदी मित्र, कोई स्वच्छता दूत, हरित योद्धा या जलवायु प्रहरी, कोई ग्रीन वारियर,ग्रीनमैन या इको हीरो, पृथ्वी रक्षक, कोई पर्यावरण संत, हरित क्रांतिकारी, प्लास्टिक मुक्त अभियानकर्ता, जैव विविधता संरक्षक, या हरियाली बाबा, माउंटेन मैन, पीपल बाबा या फिर पीपल मैन आदि – आदि। प्रश्न यह नहीं कि नाम रखने में क्या बुराई है, बल्कि प्रश्न यह है कि इन नामों के पीछे उद्देश्य क्या है? क्या यह समाज को जागरूक करने का प्रयास है या स्वयं को बड़ा और विशिष्ठ सिद्ध करने की होड़ या कुत्सित प्रयास ?
वास्तव में सेवा का मूल्य उसके प्रभाव में होता है, प्रचार में नहीं। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने समाज और प्रकृति के लिए सबसे अधिक कार्य किया, उन्होंने कभी अपने लिए विशेष उपाधियों की आवश्यकता महसूस ही नहीं की। पेड़ लगाने वाला व्यक्ति यदि सचमुच प्रकृति प्रेमी है तो उसकी पहचान उसके लगाए वृक्ष होंगे, न कि उसके नाम के आगे लगा कोई विशेषण। नदी बचाने वाला यदि वास्तव में समर्पित है तो उसकी पहचान स्वच्छ बहती धारा होगी, न कि मंचों पर गूंजते उसके परिचय।
दुर्भाग्य से आज सामाजिक कार्य भी एक प्रकार की “ब्रांडिंग” में बदलता जा रहा है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है। कैमरे के सामने पौधा लगाना आसान है, लेकिन वर्षों तक उसकी देखभाल करना अति दुरूह और कठिन। नदी किनारे फोटो खिंचवाना सरल है, मगर जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिए जीवनशैली बदलना कठिन। आज सेवा की जगह छवि निर्माण ने ले ली है।
इससे भी अधिक चिंताजनक वह विरोधाभास है जो पर्यावरण संरक्षण के नाम पर आयोजित बड़े-बड़े सेमिनारों और सम्मेलनों में दिखाई देता है। वह चाहे कौप जैसे आयोजन हों या फिर स्थानीय स्तर पर किये जाने वाले सभा-सम्मेलन-संगोष्ठी आदि-आदि। आज तो हालत यह है कि प्रकृति बचाने की बातें वातानुकूलित (एसी) हॉलों में होती हैं। सैकड़ों किलोमीटर की हवाई यात्राएं कर लोग पर्यावरण सम्मेलन में पहुंचते हैं। बोतलबंद पानी, प्लास्टिक की डिस्पोजल क्रौकरी, अत्यधिक बिजली की खपत और भोजन की बर्बादी के बीच “धरती बचाओ” के भाषण दिए जाते हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है? एक ओर हम कार्बन उत्सर्जन कम करने की बात करते हैं, दूसरी ओर ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्वयं पर्यावरण पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं। प्लास्टिक को प्रकृति का सबसे बड़ा शत्रु बताया जाता है, लेकिन वही प्लास्टिक पानी की बोतलों, चम्मचों, प्लेटों और सजावट में खुलेआम उपयोग होता है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में पर्यावरण संरक्षण है या केवल नैतिक संतोष प्राप्त करने का माध्यम?
सच्चाई यह है कि प्रकृति भाषणों से नहीं, व्यवहार परिवर्तन से बचेगी। यदि हम सचमुच पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हैं तो हमें अपनी जीवनशैली में सादगी लानी होगी। साथ ही हर उस कृत्य से बचना होगा जो प्रकृति को नुकसान पहुंचाए। स्थानीय स्तर पर छोटे लेकिन प्रभावी प्रयास करने होंगे। मिट्टी के बर्तनों, स्टील या कांच के गिलासों और पुनः उपयोग योग्य वस्तुओं को अपनाना होगा। अनावश्यक यात्राओं और दिखावटी आयोजनों से बचना होगा। प्रकृति को बचाने के लिए सबसे पहले अपने अहंकार और उपभोगवादी मानसिकता पर नियंत्रण करना होगा।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि समाज में कितने “पीपल मैन” , “पीपल बाबा”, “ग्रीन मैन”, “वाटरमैन” या “हरियाली बाबा” आदि-आदि पैदा हो रहे हैं। देखा जाये तो आजकल ऐसे लोगों की एक अलग जमात पैदा हो गयी है। आवश्यकता इस बात की है कि कितने सामान्य लोग अपनी रोजमर्रा की आदतों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी ला रहे हैं। क्योंकि धरती को उपाधियों से नहीं, ईमानदार आचरण से बचाया जा सकता है। सेवा तब तक अधूरी है, जब तक उसमें विनम्रता और आत्मानुशासन न हो। प्रकृति के साथ खड़े होने का अर्थ केवल मंच से भाषण देना नहीं, बल्कि अपने जीवन को भी प्रकृति के अनुकूल बनाना है। अन्यथा यह पूरा अभियान केवल दिखावे की हरियाली बनकर रह जाएगा, जिसकी जड़ें बहुत गहरी नहीं होतीं।
(लेखक के अपने विचार है)