आज का मेन्यू

लेखक : रमेश जोशी
प्रधान सम्पादक, ‘विश्वा’, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए.
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आज आते ही तोताराम ने वैसे ही दमित इच्छाओं का पिटारा खोल दिया जैसे किसी पेटू और गरीब ब्राह्मण को कोई धनवान जजमान मन इच्छा भोजन का न्यौता दे दे । वैसे ही जैसे किसी टुच्चे व्यक्ति को बड़ा पद मिल जाए तो वह पागल हो जाता है । फिर तो अंगूठा छाप होते हुए भी चार-चार महँगे पेन ऊपर वाली जेब में प्रदर्शित करता है, दिखाने के लिए अंग्रेजी का अखबार पढ़ते हुए या कोई फ़ाइल देखते हुए या किसी कागज पर हस्ताक्षर करते हुए या फोन करते हुए फ़ोटो खिंचवाता है। दिन में दस दस ड्रेसें बदलता है । हो सकता है सोता भी कोई महंगा सूट पहन कर ही हो । उसका मन करता है कि कैसे हाथ पैरों की 16 अंगुलियों में 32 अंगूठियाँ पहन लूँ ।
इसी के लिए अपने मारवाड़ी में एक कहावत भी है-
नादीदी कै होई कटोरी
पानी पी पी मरगी छोरी

बोला- मास्टर, आज तेरी सड़ियल चाय नहीं चलेगी । आज तो बस एक गिलास बिहार का सत्तू और दो चार जरदालू ही लूँगा ।
हमने कहा- सत्तू तो समझ आता है । बचपन में तो खैर पता नहीं था लेकिन मुहावरे में जरूर पढ़ते थे ‘सत्तू बांधकर पीछे पड़ना’ जैसे आजकल लोग देश के पीछे पड़े हुए हैं । जिन्हें पानी मिल जाता है वे हाथ धोकर भी पीछे पड़ जाते हैं । आजकल तो सेवक लोग तृणमूल वालों को उल्टा लटकाकर सीधा करने में व्यस्त हैं । लेकिन यह आलू, कचालू, रतालू, श्रद्धालु, झगड़ालू, शंकालु जैसा जरदालू क्या है ? क्या कोई ज़र्दे से बना हुआ पदार्थ है ?
बोला- विश्वगुरु मोदी जी को नहीं सुनेगा तो ऐसे ही अज्ञान के अंधकार में भटकता रहेगा । तरह तरह की समस्याओं, बीमारियों, कठिनाइयों से घिरा रहेगा । जरदालू एक प्रकार का आम होता है । मोदी जी ने बताया है कि इस आम की खुशबू इतनी बेजोड़ होती है कि इसे दूर से ही पहचाना जा सकता है जैसे कि किसी आतंकवादी को उसके वस्त्रों से । अब यह आम लोकल से ग्लोबल हो गया है जैसे कि मोदी जी खुद राष्ट्रीय से अधिक अंतर्राष्ट्रीय हो गए हैं । मदर लैंड से फादर लैंड जाने लगे हैं ।
हमने कहा- हाँ, यह और बात है कि जापान ने हमारे आम और चीन ने चावल स्तरहीन बताकर वापिस कर दिए हैं । वैसे मान ले अगर हम तेरा प्रिय आम जरदालू उपलब्ध भी करवा दें तो खाएगा कैसे ?
बोला- खाने को तो क्या है कैसे भी खाया जा सकता है । जाएगा तो इसी पापी पेट में लेकिन कल की ‘मन की बात’ में मोदी जी ने यह नहीं बताया कि खाना कैसे है?
हमने कहा- जैसे यूट्यूब पर इलाज बताने वाले इधर उधर की हजार बातें करते हैं लेकिन यह नहीं बताते कि अमुक रामबाण औषधि कितनी, कैसे लेनी है । मतलब कि आखिर में जाना तो उसी के पास पड़ेगा । वैसे ही मोदी जी संकेत कर देते हैं कभी मोरिंगा के पराँठे का, कभी आम का लेकिन यह स्पष्ट नहीं करते कि चाटना, चूसना, काटना, गटकना, भकोसना या अमरस बनाकर कैसे सेवन करें । किस पार्टी वाले को आम किस तरह खाना चाहिए । मूल रूप से राष्ट्रवादी या ईडी से डरकर राष्ट्रवादी पार्टी में आये दोनों एक ही तरह आम का सेवन करेंगे या अलग अलग तरीके से । किस मुद्रा में, किस समय किस गृह-नक्षत्र में सेवन करना उपयुक्त रहेगा ?
वैसे फिलहाल जब तक मोदी जी द्वारा अनुशंसित इस मेन्यू का इंतजाम नहीं होता चाय के बारे में क्या नवीनतम निर्देश हैं ? चाय पत्ती किस ब्रांड की होगी, एक गिलास में कितना पानी, कितनी चीनी, कितना दूध डाला जाएगा; पानी, चीनी, दूध,अलग अलग रहेंगे या सब कुछ बनाने वाले की सुविधा और मर्जी के मुताबिक होंगे ? क्या चाय की पत्ती स्टेशन की चाय की तरह बार बार काम में ली जा सकती है ?
बोला- मास्टर, यह तो किसी सरकारी योजना का लाभ लेने, जनगणना के प्रश्नों के उत्तर देने या किसी मुसलमान के लिए वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने या श्याम रंगीला की तरह वाराणसी से नामांकन दाखिल करने की तरह बड़ा कठिन काम है ।
मैं चलता हूँ । कल मिलेंगे ।
वैसे यूट्यूब में मोदी जी की मन की बात के सारे एपिसोड उपलब्ध हैं । सारे दिन बैठ बैठा मक्खी मारता रहता है । कुछ ढंग का देख सुन लिया कर तो कुछ ज्ञान बढ़ेगा, जीने का सलीका आएगा और परलोक भी सुधरेगा। (लेखक के अपने विचार है)

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