
लेखक : सुरेश भाई
लेखक जाने-माने पर्यावरणविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
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बंदरपूंछ ग्लेशियर से आ रही यमुना उत्तराखंड, हिमाचल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से होते हुए 1326 किमी चलकर प्रयागराज में गंगा से मिल जाती है। लेकिन इसके उद्गम से नीचे की ओर लगभग 60 किमी की दूरी तक बाढ़ और भूस्खलन के लिए बेहद संवेदनशील बन गया है। पिछले वर्षों से लगातार यमुनोत्री जाने वाले तीर्थ यात्रियों का मुख्य पड़ाव स्याना चट्टी के पास कुपड़ा गाड़ से आ रहे मलवे ने तीन-चार बार यमुना के प्रवाह को रोककर झील बनायी है। जिसके कारण स्यानाचट्टी और इसके आसपास कुपड़ा, कुनसाला, तिरखली गांव के संपर्क पूरी तरह कट जाते हैं और अभी तक यहां झील बनने का भय लोगों को रात-दिन सता रहा है। ये गांव बार- बार पानी में डूब चुके है।अभी भी कुपड़ा गाड़ से लगातार आ रहा मलवा यहां जमा हो रहा है और स्याना चट्टी का निचला हिस्सा मलवे के नीचे दब रहा है।
पिछले वर्षों की भीषण आपदा में जब झील बनी तो प्रशासन और निर्माण एजेंसियों ने बड़ी मेहनत से जल निकासी की थी जिसके बाद यहां मलवे के ऊंचे- ऊंचे ढेर जमा हुए जो धीरे-धीरे निचले क्षेत्र की बर्बादी का कारण बन रहा है। बरसात छोड़कर साल भर के अन्य मौसम में देखेंगे तो यमुना में पानी की मात्रा बहुत कम रहती है।इसका कारण यह भी है कि बंदरपूछ ग्लेशियर अन्य ग्लेशियरों से अधिक तेजी से पिघल रहा है और इसके अलावा यमुना को फीडबैक करने वाली छोटी नदियों में पानी निरंतर घट रहा है। लेकिन मानसून के समय इन्हीं सहायक नदियों से यमुना में भारी मलवा एकत्रित हो रहा है।
प्रदूषण,शोषण और अतिक्रमण का राज इस नदी पर वर्षों से बना हुआ है। जिससे भविष्य में उद्गम से ही और अधिक जल संकट बढ़ने की संभावना है।
यमुनोत्री जाने से पहले बड़कोट से आगे लगभग 24 किमी की दूरी तक बाढ़ के लिए संवेदनशील भौगोलिक संरचना को नजरअंदाज करते हुए सड़क चौड़ीकरण के दौरान अमूल्य मिट्टी और बोल्डरों को सीधे यमुना में उड़ेला गया।
सीधे खड़े पहाड़ों को जिस बेदर्दी से पोकलैंड और जेसीबी मशीनों ने काटा है उसके कारण यहां के पहाड़ कम बारिश में ही टूटने लगे हैं। इससे आगे भी पालीगाड से जानकी चट्टी के बीच तीन और डेंजर जोन दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा सिलाई बैंड,झझर गाड, जंगल चट्टी जैसे अनेकों स्थानों पर पहाड़ दरकने का भय बना हुआ है। मसूरी से होते हुए यमुना पुल से जानकी चट्टी के बीच में छोटे-बड़े भूस्खलन जोन बने हुए हैं। यह स्थिति सड़क चौड़ीकरण में पहाड़ों पर हुई अंधाधुंध छेड़छाड़ और पुराने पेड़ों को काटने का परिणाम है जिससे बार-बार सड़क मार्ग बाधित होता रहता है।और सुरक्षित यात्रा के नाम पर यात्रियों को बार-बार यमुनोत्री जाने के लिए रोकना पड़ता है। इन चिंताजनक स्थितियों के बीच महसूस होता है कि चौड़ी सड़क बनाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग और वन,पर्यावरण और जलवायु ,नमामि गंगे और आपदा प्रबंधन के संबंधित मंत्रालयों के बीच तालमेल की कमी है।जिस तरह की मॉनिटरिंग आपदा प्रबंधन को अन्य विभागों के साथ करना चाहिए था उसकी बेहद कमी नजर आती है। सीमा सड़क संगठन यहां की संवेदनशील भौगोलिक संरचना के लिए असहनीय बड़े निर्माण कार्यों में जुटा हुआ है। इस विषय पर सावधानी बरतने के लिए भूगर्भविदों की सलाह की भी अनदेखी का परिणाम है।
यमुना के ऊपरी क्षेत्र में पर्यावरण विनाश की गतिविधियां हाल के वर्षों में बहुत तेजी से बढी है। उत्तराखंड में यमुना पर बाढ़ और भूस्खलन से जितना संकट बढ़ रहा है। उससे कहीं अधिक मैदानी क्षेत्र में भी भीषण जल प्रलय के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।यमुनानगर के पास हथिनीकुंड बैराज से छोड़े जा रहे पानी से दिल्ली तक भयंकर बाढ़ हर साल देखने को मिलती है। 1996- 99 में हथिनी कुंड बैराज का निर्माण किया गया था। जिससे पश्चिमी यमुना नहर और पूर्वी यमुना नहर के द्वारा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश को पानी की आपूर्ति की जाती है। मानसून के समय इसमें 38 हजार क्यूसेक से अधिक पानी जमा रहता है। जब इस बैराज में पानी भर जाता है तो यहां से लगभग 20 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा जाता है जो 48 से 72 घंटे के अंदर ही दिल्ली पहुंच जाता है। जिसके कारण दिल्ली और उत्तर प्रदेश के शहरों में भीषण बाढ़ के साथ अत्यधिक गंदा पानी, कचरा और सीवर सीधे बस्तियों में घुस जाता है। जहां लोगों को हर साल अपने बचने के लिए इधर-उधर शरण लेनी पड़ती है। जिस पर दिल्ली विश्वविद्यालय और ईसर भोपाल के द्वारा किए गए शोध बताते हैं कि यमुना का पाट करीब 68 प्रतिशत सिकुड़ गया है और बाढ़ वाले मैदान का एक तिहाई हिस्सा पूरी तरह गायब हो गया है। जिसका तात्पर्य है कि मानसून के समय हथिनी कुंड बैराज का पानी जल प्रलय की स्थिति खड़ी कर देता है लेकिन उसके बाद यमुना एक गंदे नाले के रूप में बहती है। यमुना के सीवर जैसे गंदे पानी का शोधन एसटीपी भी नहीं कर सकता है। लेकिन यमुना के जल ग्रहण क्षेत्र में ही अत्यधिक भूजल का दोहन करके पेयजल के रूप में उपयोग करने से तरह-तरह की बीमारियों हो रही हैं। अतः यमुना नदी में पानी की मात्रा मानसून के समय बढ़ जाती है लेकिन उसके बाद वह एक ऐसा नाला बन जाता है जहां देखना भी महामारी को आमंत्रित करने जैसा है। बैराज और तटबंधों के निर्माण के साथ बढ़ते शहरीकरण के अवैध कब्जों ने फ्लड प्लेन खत्म कर दिया है।यह स्थिति हथनी कुंड बैराज के बाद ही पैदा हो रही है। यमुना अपनी हजारों वर्ष पुरानी प्राकृतिक क्षमता लगभग खो चुकी है। गंगा की सबसे बड़ी नदी की जब यह हालात हो गई है तो गंगा कैसे बचेगी? जहां गंगा- जमुनी संस्कृति और सभ्यता के अस्तित्व पर भीषण जल प्रलय का खतरा है वहीं दूसरी ओर पानी का संकट भी बढ़ा रहा है। इन ज्वलंत सवालों पर लंबे समय तक खामोश रहकर चंद समय की सुख- सुविधाओं से कुछ हासिल नहीं होगा। (लेखक के अपने विचार हैं)