
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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देश में नदियों का प्रदूषण खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है।कोई एक नदी ऐसी नहीं है जिसे शुद्ध और निर्मल नदी के रूप में जाना जाये। जिसे पतितपावनी और मुक्तिदायिनी कहा जाता है और जिसका जल पुण्य का सबब माना जाता है, सबसे पहले देश की उसी पुण्य सलिला, मोक्षदयिनी नदी गंगा को लें, राजीव गांधी के प्रधान मंत्रित्व काल 1985 से लेकर आजतक मां गंगा ने मुझे बुलाया है, का दर्दभरा घोष करने वाले प्रधानमंत्री मोदी जी के कार्यकाल तक, गंगा प्रदूषण मुक्ति हेतु 42,000 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है। इसके अलावा 1985 में गंगा एक्शन प्लान पर शुरुआत में ही 1200 करोड़ की राशि खर्च की गयी। लेकिन गंगा आज अपने मायके उत्तराखंड में ही साफ नहीं है। दावे कुछ भी किये जायें वह आज भी मैली है और उसका जल पुण्य का नहीं, मौत का सबब बन गया है। कैग की रिपोर्ट इसका जीता जागता सबूत है। अब देश की दूसरी प्रमुख नदी यमुना को लें, संसद में दिये आंकड़ों के मुताबिक अभी तक यमुना की सफाई पर पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कुल 5,536 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है जबकि यमुना संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर पहले ही लगभग 1,951 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी थी। इसके अलावा दिल्ली सरकार के ग्रीन बजट के तहत दिल्ली जल बोर्ड को 6485 करोड़ रुपए की राशि दी गयी और अभी हाल फिलहाल में ही दिल्ली सरकार ने यमुना की सफाई के लिए 4500 करोड़ की राशि की मंजूरी दी है लेकिन यमुना गंदगी और दुर्गंध से बजबजा रही है। वह जहरीली है। इसके अलावा देश की और दूसरी नदियों को छोड़ भी दें, केवल गंगा और उसकी सहायक नदियों की बात की जाये, तो उनपर अभीतक 21,340 करोड़ रूपये से ज्यादा की राशि स्वाहा हो चुकी है। लेकिन इतनी भारी-भरकम राशि खर्च करने के बाद भी नदियां आज भी अपने ताड़नहहार की बाट जोह रही हैं कि कौन भगीरथ आयेगा जो उन्हें प्रदूषण के दानव से मुक्ति दिलायेगा? हालत तो इतनी खराब है कि उनका पानी आचमन की बात तो दीगर है, वह सीवेज और कारखानों के रासायनिक अपशिष्ट से इतना विषैला है कि प्राणी मात्र और जलजीवों की सेहत के लिए भी जानलेवा साबित हो रहा है।

विडम्बना देखिए कि इस बाबत देश की सुप्रीम अदालत नौ साल पहले ही आदेश दे चुकी है कि नदियों में शोधन के बगैर सीवेज न बहाया जाये। लेकिन दुखद यह है कि इसके बावजूद न राज्य सरकारों पर इसका कोई असर पड़ा और न ही सीवेज निस्तारण करने वाली एजेंसियों पर कि वह इस मामले पर कारगर कदम उठातीं। उसका नतीजा यह है कि नदियों का प्रदूषण लोगों को जानलेवा बीमारियों की सौगात देकर उन्हें मौत के मुंह में ढकेल रहा है। देखा जाये तो देश में रोजाना लगभग 73,000 मिलियन लीटर, एम एल डी सीवेज उत्पन्न होता है। इसमें से केवल 28 फीसदी हिस्से का ही शोधन हो पाता है। बाकी लगभग 72 फीसदी यानी 52,000 मिलियन लीटर से ज्यादा अनुपचारित सीवेज का गंदा पानी सीधे-सीधे देश की नदियों और दूसरे जलस्रोतों में गिर रहा है। यदि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट की मानें तो देश के विभिन्न राज्यों में लगभग 296 प्रदूषित नदी खंड चिन्हित किये गये हैं जिसका मुख्य कारण उनमें गिरने वाला बिना शोधित किया हुआ सीवेज है। जबकि एक अन्य जानकारी के अनुसार देश की लगभग 463 छोटी-बड़ी नदियों में बिना शोधन के सीधे-सीधे सीवेज गिराया जा रहा है। यदि सी एस ई की एक रिपोर्ट को मानें तो देश की लगभग चार सौ से भी अधिक नदियां ऐसी हैं जो प्रदूषित हैं और उसका सबसे बड़ा कारण अनुपचारित सीवेज का उनमें लगातार गिरना है।

हकीकत यह है कि देश के शहरी इलाकों से रोजाना लगभग 72,368 एम एल डी सीवेज निकलता है। इसमें से केवल 31,841 एम एल डी यानी केवल लगभग 44 फीसदी का ही उपचार हो पाता है जिसमें से वास्तविक रूप से इस्तेमाल होने वाला हिस्सा और भी कम है। सच्चाई यह है कि देश में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडु और गुजरात ये पांच राज्य ऐसे हैं जो देश का 50 फीसदी से ज्यादा सीवेज पैदा करते हैं और जिसके कारण गंगा, यमुना और साबरमती जैसी नदियां सर्वाधिक प्रभावित होती हैं। देश में 271 नदियों में से 37 गंभीर रूप से प्रदूषित हैं। 311 में गंगा, यमुना, हिंडन, साबरमती और दामोदर ये पांच शीर्ष नदियां सर्वाधिक प्रदूषित हैं। जबकि तमिलनाडु की कूवम और यमुना की सर्वाधिक जहरीली नदियो में गिनती की जाती है।

देश में नदियों में सीवेज गिराये जाने के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है जहां हजारों की तादाद में नाले सीवेज का गंदा पानी सीधे-सीधे नदियों में गिरा रहे हैं। यहां बिना शोधन के गंगा, यमुना, वरुणा, रोहिणी, पांडु, ईशन, सई, घाघरा, काली, गोमती, रामगंगा, कोसी, राप्ती, तमसा, सरयू, नीमा, बीटा, सेंगर, अरिंद, सरायन, करवन, काक, उल्ल जैसी नदियों में सीवेज का गंदा विषैला पानी 1385 गंदे नालों के जरिये बहाये जाने के मामले में बीते बरसों से बेतहाशा बढ़ोतरी देखी गयी है। गौरतलब है यह हालत तब है जबकि 2017 में ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पारित किया था कि बगैर शोधित किये सीवेज का गंदा पानी नदियों में प्रवाहित न किया जाये। उस समय तो केवल 1230 नाले ही सीवेज का गंदा पानी बिना शोधन के नदियों में बहा रहे थे। इसका खुलासा राज्य सरकार की एनजीटी में पेश रिपोर्ट से हुआ है। एनजीटी प्रमुख न्यायमूर्ति श्री प्रकाश श्रीवास्तव की अगुआई वाली पीठ के समक्ष राज्य में ठोस कचरा प्रबंधन से जुड़े मामले में नियुक्त न्याय मित्र व अधिवक्ता कात्यायनी एवं विक्रांत बडेसरा ने गत दिनों पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उत्तर प्रदेश में 85 फीसदी यानी 2869 नालों के जरिये बिना शोधन के सीवेज का गंदा पानी नदियों, तालाबों, झीलों व अन्य जलस्रोतों में सीधे सीधे गिराया जा रहा है। रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जाहिर की गयी है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बीते नौ सालों में नदियों में सीवेज गिराने वाले नालों में कमी आने के बजाय उनमें 155 अतिरिक्त नालों यानी 12.6 फीसदी की और बढ़ोतरी हुयी है। यह सरकारी नाकारेपन का जीता जागता सबूत है। इस बारे में न्याय मित्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश के सबसे बड़े प्रदेश और उसकी सर्वाधिक बड़ी आबादी इसे देश का शहरी कचरा और सीवेज का सबसे बड़ा उत्पादक बनाती है। नदियों और झीलों की बदहाली का आलम यह है कि एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री प्रकाश श्रीवास्तव व विशेषज्ञ सदस्य जनाब अफरोज अहमद की पीठ ने बिहार में एशिया की सबसे बड़ी झील के नाम से विख्यात कांवर झील की बदहाल पर्यावरणीय स्थिति का स्वत: संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार समेत अन्य को नोटिस जारी कर तत्काल जबाव मांगा है।

नदियों के प्रदूषण का आलम यह है कि उनका पानी कई जानलेवा बीमारियों का सबब बन रहा है। नदिया का जल सीसा, पारा, आर्सैनिक और कैडमियम जैसी विषैली धातुओं व कारखानों के विषाक्त रासायनिक अपशिष्ट लीवर के संक्रमण, आंत में सूजन, तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क, गुर्दे, फेफडो़ं के कैंसर, त्वचा , फाइब्रेसिस, लिवर सिरोसिस, लेप्टोस्पाइरोसिस, सार्कोप्टेस एलर्जी के घुन के लिए प्रजनन स्थल प्रदान करने के साथ साथ हैजा, पीलिया, किडनी, डर्मेटाइटिस और हड्डियों व प्रजनन सम्बंधी जानलेवा रोग के कारण बन रहे हैं। बिहार में तो बूढ़ी गंडक, बागमती, गंडक, कमला, बलान आदि नदी क्षेत्र के लोग हैपेटाइटिस की बीमारी के भीषण चंगुल में हैं। इसका अहम कारण इन नदियों का दूषित पानी है जिसे ये लोग अपने रोजमर्रा के काम में इस्तेमाल करते हैं। हैपेटाइटिस-ए का वायरस एच ए वी दूषित पानी से तेजी से फैलता है। यह तीव्र वायरल हैपेटाइटिस का एक रूप है। यह वायरल संक्रमण लिवर के सूजन और क्षति का कारण बनता है। इन नदियों के किनारे रहने-बसने वाले लोग थकान, पेट दर्द, मल के रंग मे बदलाव, जोड़ों में दर्द से बहुतायत में पीड़ित हैं। ऐसे लोगो के इलाज में काफी समय लग रहा है। किसी किसी मरीज को तो इलाज में महीने से भी ज्यादा का समय लग रहा है। इससे नदी किनारे रहने वाले लोग ही नहीं, उनका इलाज करने वाले डाक्टर भी पूरी सतर्कता बरतने के बावजूद इसकी चपेट में आ रहे हैं। असलियत में इलाज के दौरान संक्रमित मरीजों की जांच और निडिल व खून के संपर्क में आने से वह संक्रमित हो रहे हैं। इसका खुलासा श्री कृष्ण मेडीकल कालेज, मुजफ्फरपुर के चिकित्सकों ने किया है।

सबसे बड़ा दुख इस बात का है कि नदियों की यह दुर्दशा उस धर्मभीरू देश में है जहां नदियों की मां की तरह पूजा की जाती है, जिनके किनारे सभ्यताओं और संस्कृतियों ने जन्म लिया है, उनके किनारे कुंभ जैसे विशालकाय मेले लगते हैं जिनमें करोड़ों-करोड की तादाद में धर्मप्राण जनता स्नान कर खुद को धन्य मानती है। लेकिन इतनी विशेषताओं वाली नदियां आज अपने दुर्भाग्य पर रो रही हैं। लगता है आज उनका पुरसाहाल कोई नहीं है। बीता इतिहास और मौजूदा हालात गवाह हैं कि सरकारों से उनकी प्रदूषण मुक्ति की उम्मीद करना बेमानी प्रतीत होती है। उनकी प्रदूषण मुक्ति के लिए घोषित हजारों करोड़ किस लोक में चले गये, उनका क्या हुआ, यह सब अतीत बन चुका है। अब तो वे उस दिन के इंतजार में टकटकी लगाये बैठी हैं कि कोई भगीरथ आयेगा और वह प्रदूषण के दानव के चंगुल से निकलकर खुली हवा में सांस ले सकेंगी। (लेखक के अपने विचार हैं)