
विचार मंथन:
लेखक : डा. संजय राणा
लेखक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद एवं एस्रो नामक संस्था के निदेशक हैं।
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आजकल पूजा के स्वरूप और उसके महत्व की चर्चा बहस का मुद्दा बनी हुयी है। जब से देश में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के अयोध्या स्थित श्री राम मंदिर से ‘चढ़ावा चोरी’ का प्रकरण प्रकाश में आया है, तब से यह सवाल जनमानस में बहस का मुद्दा बना हुआ है कि क्या पूजा केवल मंदिरों में जाकर शीश नवाना, आरती करना, चढ़ावा चढ़ाना और भगवान की मूर्तियों के चरण स्पर्श करना ही है? यदि कोई व्यक्ति जीवनभर छल, कपट, अहंकार, अन्याय और द्वेष में जीता रहे, तो क्या केवल धार्मिक अनुष्ठान उसे धार्मिक बना देते हैं?
भारतीय दर्शन इस प्रश्न का उत्तर केवल कर्मकांड में नहीं, बल्कि आचरण में खोजता है। “यथा आचरणं तथा धर्मः” — मनुष्य का व्यवहार ही उसके धर्म का परिचय है। वेदों में भी निष्काम कर्म, सत्य, दया, आत्म संयम और लोक कल्याण को श्रेष्ठ जीवन का आधार बताया गया है।
मेरे व्यक्तिगत विचार से सच्ची पूजा वह है जो हमारे व्यवहार में दिखाई दे—ईश्वर प्रदत्त प्रकृति का संरक्षण, जल, वायु, वन और वन्य जीवों का सम्मान, माता-पिता एवं बुजुर्गों की सेवा, महिलाओं का सम्मान, प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, सत्य और ईमानदारी का पालन तथा “जियो और जीने दो” की भावना। यही पूजा है, यही धर्म है और यही ईश्वर के प्रति वास्तविक श्रद्धा है।
यदि कोई व्यक्ति जीवनभर मंदिर न जा सके, किंतु अपने आचरण से मानवता, प्रकृति और समस्त जीव-जगत का सम्मान करता रहे, तो वह निस्संदेह धार्मिक है। इसके विपरीत, यदि पूजा केवल मंदिर की चौखट तक सीमित रह जाए और जीवन में उसका कोई प्रभाव न दिखे, तो वह अधूरी है।
अंततः, धर्म का उद्देश्य केवल ईश्वर के सामने झुकना नहीं, बल्कि ऐसा जीवन जीना है जिसे देखकर समाज ईश्वर की करुणा, सत्य और प्रेम का अनुभव कर सके। जब पूजा हमारे चरित्र का हिस्सा बन जाती है, तभी वह वास्तव में पूजा कहलाती है।
आओ मानवता की ओर लौटें।
(लेखक के अपने विचार है)