क्या इस अतिरेक को सह पाएगा हिमालय? – डा. संजय राणा

लेखक : डा. संजय राणा
लेखक ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता, एस्रो के निदेशक एवं पर्यावरणविद हैं।
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भारत में हिमालय केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, जल और जीवन का आधार है। विशेषतः उत्तराखंड को “देवभूमि” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां स्थित केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थ सदियों से मानव को प्रकृति के प्रति विनम्रता, संयम और आध्यात्मिकता का संदेश देते आए हैं। किंतु विडंबना यह है कि आज वही तीर्थ अत्याधिक भीड़, अव्यवस्थित पर्यटन और बाजारवादी धार्मिक संस्कृति के दबाव में कराहते दिखाई दे रहे हैं।
वर्ष 2026 की चारधाम यात्रा में जिस प्रकार प्रतिदिन लगभग एक लाख लोगों के पहुंचने के आंकड़े सामने आ रहे हैं, वह केवल धार्मिक उत्साह का विषय नहीं है, बल्कि यह हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी के लिए गंभीर चेतावनी है। यह विडम्बना नही तो और क्या है कि यह संख्या उस संवेदनशील भू-भाग की वहन क्षमता (Carrying Capacity) से कहीं अधिक प्रतीत होती है और दुखद यह है कि सरकारें इसे “रिकॉर्ड तीर्थाटन” बताकर अपनी उपलब्धि मान रही हैं और समाज भी बिना दीर्घकालिक परिणामों को समझे इस अंधी भीड़ का हिस्सा बनता जा रहा है।
हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। भूगर्भीय दृष्टि से यह आज भी स्थिर नहीं है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और विभिन्न पर्यावरणीय अध्ययनों ने बार-बार चेताया है कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। यहां बढ़ती मानवीय गतिविधियां, वाहनों का अत्यधिक दबाव, होटल निर्माण, सड़क चौड़ीकरण, हेलीकॉप्टर सेवाओं का अनियंत्रित संचालन और प्लास्टिक कचरे का बढ़ता अंबार हिमालय के संतुलन को तेजी से बिगाड़ रहा है।
विशेष चिंता का विषय “ब्लैक कार्बन” है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार डीजल वाहनों, जनरेटरों और भारी मानवीय गतिविधियों से निकलने वाला ब्लैक कार्बन हिमालयी ग्लेशियरों पर जमा हो रहा है जिससे बर्फ सूर्य की गर्मी को अधिक अवशोषित कर रही है और ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगे हैं। उत्तराखंड के कई ग्लेशियरों में पिछले दशकों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। गंगोत्री ग्लेशियर, जो गंगा का प्रमुख स्रोत है, लगातार पीछे हट रहा है, यमनोत्री को जन्म देने वाला बंदर पूंछ ग्लेशियर भी पीछे हट चुका है। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में गंगा-यमुना जैसी नदियों के अस्तित्व पर भी संकट गहरा सकता है।
चारधाम यात्रा के दौरान उत्पन्न होने वाला ठोस कचरा भी एक बड़ा संकट है। प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य सामग्री के रैपर, कपड़े, धार्मिक सामग्री और अन्य अपशिष्ट पर्वतीय क्षेत्रों में जमा हो रहे हैं। इनमें से अधिकांश कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। पर्वतीय ढलानों और नदी घाटियों में यह कचरा अंततः जल स्रोतों और मिट्टी को प्रदूषित करता है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि तीर्थ यदि पवित्रता के प्रतीक हैं, तो उनका यह प्रदूषण हमारी आस्था की वास्तविकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
दरअसल आज तीर्थाटन धीरे-धीरे “धार्मिक पर्यटन उद्योग” में बदल चुका है। दर्शन अब साधना नहीं, बल्कि “टारगेट” बन गया है। लोग कुछ घंटों में चारधाम “कवर” करने की मानसिकता लेकर पहुंच रहे हैं। सोशल मीडिया ने भी इस प्रवृत्ति को बढ़ाया है, जहां आध्यात्मिक अनुभव की अपेक्षा फोटो और वीडियो प्रदर्शन अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। यही कारण है कि हमने यहां “भक्त” शब्द के स्थान पर “भीड़” शब्द का प्रयोग किया है। क्योंकि वास्तविक तीर्थयात्री प्रकृति और स्थान की मर्यादा को समझता है, जबकि भीड़ केवल उपभोग करती है।
हिमालय पहले ही कई त्रासदियों के संकेत दे चुका है। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की ऋषिगंगा त्रासदी, जोशीमठ भू-धंसाव, और हाल के वर्षों में धराली तथा थराली क्षेत्रों में हुई प्राकृतिक घटनाएं स्पष्ट संकेत हैं कि हिमालय का संतुलन बिगड़ रहा है। वैज्ञानिकों ने इन घटनाओं के पीछे अनियंत्रित निर्माण, अतिक्रमण, वन अग्नि, वन विनाश और जलवायु परिवर्तन को प्रमुख कारण माना है। बावजूद इसके विकास और तीर्थाटन के नाम पर संवेदनशील क्षेत्रों में दबाव लगातार बढ़ाया जा रहा है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि सरकारें इस विषय को राजस्व और राजनीतिक लाभ के चश्मे से देख रही हैं। तीर्थयात्रियों की संख्या को नियंत्रित करने, पंजीकरण की वैज्ञानिक सीमा तय करने, प्लास्टिक प्रतिबंध को कठोरता से लागू करने, सार्वजनिक परिवहन .को बढ़ावा देने और पर्यावरणीय वहन क्षमता के अनुसार यात्रा संचालन जैसे कदमों पर गंभीर इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती। दूसरी ओर समाज भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं कि प्रकृति की भी एक सीमा होती है।
हिमालय प्रतिशोध नहीं लेता, बल्कि वह अपने संतुलन को पुनर्स्थापित करता है। किंतु जब मनुष्य प्रकृति की सीमाओं का अतिक्रमण करता है, तब वही प्राकृतिक प्रक्रिया मानव समाज के लिए विनाशकारी प्रतीत होती है। यदि अभी भी चेतना नहीं आई, तो भविष्य में बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने, बादल फटने और भू-धंसाव जैसी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ेगी।
अब समय आ गया है कि चारधाम यात्रा को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में देखा जाए। तीर्थाटन को सीमित, नियंत्रित और प्रकृति-सम्मत बनाना होगा। “कम लोग, बेहतर व्यवस्था और अधिक आध्यात्मिकता” ही भविष्य का मार्ग होना चाहिए। अन्यथा आने वाली पीढ़ियां शायद केवल पुस्तकों में पढ़ेंगी कि कभी हिमालय सचमुच देवभूमि हुआ करता था।
हिमालय हमें जीवन देता है। प्रश्न यह है कि क्या हम उसे जीवित रहने देंगे?
(लेखक के अपने विचार हैं)

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