
लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
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बचपन में मन में एक इच्छा थी चिकित्सक बनने की पर अधूरी रह गई। कक्षा 7 में पढ़ती थी तभी मां का आकस्मिक निधन हो गया था। सारी परिस्थितियां बदल गई। पिताजी सरकारी विद्यालय में अध्यापक थे। शिक्षक होने के कारण हम भाई-बहनों की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आई। 11 वीं कक्षा के बाद स्नातक की डिग्री उदयपुर के मीरा गर्ल्स कॉलेज से ली। मां नहीं होने के कारण परिवार वालों ने छोटी उम्र में शादी कर दी। कुशाग्र बुद्धि थी।शादी के बाद दो विषय में मास्टर आफ आर्ट्स की डिग्री प्राप्त की।
घरेलू कारण से आगे नहीं बढ सकी। नौकरी करने का अवसर नहीं मिला। उस समय में कालेज में व्याख्याता की नौकरी के लिए पीएचडी करना जरूरी नहीं था।लोक सेवा आयोग द्वारा प्रतियोगी परीक्षा आयोजित होती थी। पर इतनी समझ नहीं थी।
मन में कुछ कर गुजरने की इच्छा थी कि मेरी पढ़ाई भी काम आ जाए और मेरी योग्यता को भी नाम मिल जाए।वर्षों तक प्रथम श्रेणी से लेकर 12 वी कक्षा के बच्चो को नि:शुल्क पढ़ाया। पुस्तक पढ़ना मेरा शौक था। चित्तौड़ के जिला पुस्तकालय की सदस्य बन कर प्रतिदिन एक पुस्तक पढ़ लेती थी। जिसमें मुंशी प्रेमचन्द, जय शंकर प्रसाद, जैसे साहित्यकारों की पुस्तकें भी थी।
उस जमाने में मोबाइल, टीवी का प्रचलन नहीं था। वर्षों से पत्रिका पढती आ रही थी। पाठक पीठ कालम आता था उसको भी पढ़ती थी। किस पते पर लिख कर प्रेषित करना है ये नहीं पता था। डाक विभाग द्वारा ही सूचना का आदान प्रदान होता था। इसी क्रम में एक दिन पत्रिका देख रही थी कि भीलवाड़ा संस्करण से एक कालम प्रकाशित हुआ उसका नाम था पब्लिक फोरम उसमें एक विषय दिया गया था राजनीति में महिला की भागीदारी, और उसका पता भी दिया गया था। मन में सोचा यह तो मैं भी लिख सकती हूं कागज पेन उठाया और अच्छा खासा आर्टिकल लिख दिया। उस जमाने में सोशल मीडिया का प्रचलन नहीं था डाक द्वारा आदान-प्रदान होता था। लिफाफा पड़ा था दिए हुए पत्ते को लिखकर डाकखाने में जाकर डाल दिया वह मेरा पहला पत्र था। वह फोटो सहित अखबार में आ गया था क्योंकि उस कॉलम में पासपोर्ट साइज का फोटो भी मांगा था। उस दिन से पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगभग 20 वर्ष हो गए है। निरंतर लिखने का क्रम आज भी जारी है।
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर के सभी अखबारों में लेख, कहानी लिख चुकी हूं, समसामयिक विषय पर भी लिखती हूं। आकाशवाणी में भी मेवाड़ी में कहानिया लिख कर सीधा प्रसारण व भेंट वार्ता के कार्यक्रम भी प्रस्तुत कर चुकी हूं। प्रिंट मीडिया के साथ-साथ अब प्रिंट मीडिया के समय से लेखन के क्षेत्र में कार्य करने वाले एक सहयोगी के कारण अपने आर्टिकल, खबरें, कहानियां, देश के प्रशासनिक विभाग के भ्रष्टाचार, शिक्षा, गरीबी, दुष्कर्म जिस भी विषय पर मन में पीड़ा होती सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से भी पूरे देश, दुनियां तक पहुँच रहे हैं। मुझे इस कार्य से बहुत आत्म संतुष्टि मिलती है और मैंने सीखा कि अगर ठान लिया जाए तो सब कुछ किया जा सकता है। मैं समसामयिक, जन समस्याएं, महिलाएं, युवा, बच्चों, सामाजिक, ऐतिहासिक विषयों के साथ समय के अनुसार सामाजिक अनछुए विषयों पर भी लिखने का प्रयास करती हूँ। लेखन मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। सोशल मीडिया पर देश, दुनिया से कमेंट भी आते है।मैं उस मित्र का आभार जरूर व्यक्त करती हूं जिसके कारण मेरे आलेख वर्ल्ड प्रेस तक पहुंच रहे हैं। (लेखिका के अपने विचार है)