

दादा कान्हा रावत के शहीदी दिवस पर विशेष
लेखक : डॉ शिवसिंह रावत
सिंचाई विभाग हरियाणा के पूर्व अधीक्षण अभियंता हैं और वाक फार यमुना अभियान के संयोजक हैं।
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आज जब युवा पीढ़ी रील्स, ट्रेंड्स और वर्चुअल पहचान के संसार में अपनी दिशा खोज रही है, तब इतिहास हमें वास्तविक नायकों की ओर लौटने का आह्वान करता है। अमर शहीद दादा कान्हा रावत का जीवन स्मरण कराता है कि राष्ट्र निर्माण लाइक्स और फॉलोअर्स से नहीं, बल्कि चरित्र, साहस और सामाजिक जिम्मेदारी से होता है। यदि समाज अपने बलिदानियों को भुला दे, तो उसकी आत्मा क्षीण हो जाती है। उनका जीवन अतीत की कथा मात्र नहीं, बल्कि आज के समाज विशेषकर युवाओंके लिए नैतिक दृढ़ता का जीवंत संदेश है।
सत्रहवीं शताब्दी का उत्तर भारत राजनीतिक और धार्मिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के शासनकाल में 1679 में जज़िया कर पुनः लागू हुआ, जिससे ब्रज और मेवात क्षेत्र में असंतोष बढ़ा। इसी पृष्ठभूमि में 1640 ईस्वी में हरियाणा के बहीन (वर्तमान पलवल) में जन्मे दादा कान्हा रावत ने ग्रामीण समाज को संगठित कर अन्यायपूर्ण कराधान और धार्मिक दबावों का विरोध किया। वे किसी राजसत्ता के शासक नहीं थे, बल्कि लोकचेतना के नेतृत्वकर्ता थे, जिनकी शक्ति जनता के विश्वास और सामुदायिक एकता से आती थी।
लोकपरंपराओं के अनुसार, उन्होंने जज़िया और जबरन धर्मांतरण के विरुद्ध प्रतिरोध का आह्वान किया। 1669 में जाट नेता गोकुला के विद्रोह के बाद क्षेत्रीय तनाव और गहरा गया। इसी दौर में दादा कान्हा रावत ने खाप और पंचायतों के माध्यम से ग्रामीण स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प लिया। 1682 में दिल्ली में उनकी शहादत की कथा प्रचलित है, जहाँ उन्होंने प्रलोभनों और यातनाओं के बावजूद अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
कृषक पृष्ठभूमि से जुड़े दादा कान्हा रावत का संघर्ष केवल धार्मिक अस्मिता का नहीं, बल्कि ग्रामीण आर्थिक गरिमा का भी प्रतीक था। आज जब कृषि जल संकट, बाज़ार अस्थिरता और भूमि विखंडन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब उनका जीवन संगठन, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक नेतृत्व की प्रेरणा देता है।
उनका कालखंड गुरु तेगबहादुर सिंह के बलिदान का भी युग था, जिसने धार्मिक स्वतंत्रता और स्वाभिमान को राष्ट्रीय चेतना का विषय बनाया। दादा कान्हा रावत उसी व्यापक सामाजिक जागरण की एक महत्वपूर्ण कड़ी थे।
आज के युवाओं के लिए उनका संदेश स्पष्ट है—साहस के बिना परिवर्तन नहीं, संगठन के बिना शक्ति नहीं, और आत्मसम्मान के बिना जीवन नहीं। डिजिटल सक्रियता महत्वपूर्ण है, पर उससे अधिक आवश्यक है सामाजिक उत्तरदायित्व। यदि युवा शिक्षा, नैतिकता और समाजसेवा को प्राथमिकता दें, तो वही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
डिजिटल युग में जब छवि को चरित्र से अधिक महत्व दिया जा रहा है, तब दादा कान्हा रावत की विरासत हमें स्मरण कराती है कि असली पहचान साहस, समरसता और जिम्मेदारी से बनती है। यदि युवा इन मूल्यों को अपने जीवन में उतार लें, तो उनकी शहादत केवल इतिहास नहीं रहेगी—वह भारत के भविष्य की नैतिक दिशा बनेगी।
दादा कान्हा रावत की पावन स्मृति में उनके पैतृक गाँव बहीन की गौशाला में प्रतिवर्ष दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस वर्ष यह आयोजन 28 फरवरी और 1 मार्च को संपन्न हो रहा है, जहाँ समाज उनके बलिदान को स्मरण कर नई पीढ़ी को उनके आदर्शों से प्रेरित करने का संकल्प लेता है। (लेखक के अपने विचार हैं)