
हम कहां आ गए?
लेखक : संजय राणा
लेखक ख्यात पर्यावरणविद एवं एस्रो के निदेशक हैं।
www.daylifenews.in
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का गंगा–यमुना दोआबा कभी अपने प्रचुर और स्वच्छ जल संसाधनों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध रहा है। सदियों से यह क्षेत्र दो महान नदियों गंगा और यमुना के आशीर्वाद से सिंचित और समृद्ध रहा है, साथ ही कृष्णी, काली और हिंडन जैसी छोटी नदियों का साथ मिला। उपजाऊ भूमि, पर्याप्त वर्षा और भरपूर भूमिगत जल के कारण यह इलाका कृषि और मानव जीवन दोनों के लिए स्वर्ग समान माना जाता था है। यही कारण रहा कि इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग 400 से 1200 वर्ष के मध्य राजस्थान और हरियाणा से लोगों ने यहां आ कर रहना प्रारंभ किया। किंतु आज स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि वही क्षेत्र, जो कभी जल की समृद्धि का प्रतीक था, अब जल प्रदूषण और जल संकट के भयावह भविष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
हाल ही में सामने आई एक जल गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट इस संकट की गंभीरता को उजागर करती है। रिपोर्ट के अनुसार भूमिगत जल में कुल कठोरता (Total Hardness) 960 mg तक पहुंच चुकी है, जबकि मानक सीमा 200 mg मानी जाती है। इसी प्रकार TDS (Total Dissolved Solids) का स्तर 1080 mg दर्ज किया गया है, जो यह संकेत देता है कि पानी में घुले हुए खनिज और रसायन अत्यधिक मात्रा में मौजूद हैं। मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे तत्व भी मानक सीमा के आसपास या उससे अधिक पाए गए हैं। यह स्थिति केवल पीने योग्य पानी के लिए ही नहीं, बल्कि सामान्य उपयोग के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है। सरल शब्दों में कहें तो यह पानी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बन चुका है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह प्रदूषण केवल सतही जल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भूमिगत जल स्रोतों तक पहुंच चुका है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में यह प्रदूषण 100 से 120 फीट गहराई तक दर्ज किया जा चुका है। यह तथ्य उस भ्रम को भी तोड़ देता है कि भूमिगत जल हमेशा सुरक्षित रहता है। आज स्थिति यह है कि जहां लगभग 20 से 30 वर्ष पहले तक 40–50 फीट के हैंडपंप से स्वच्छ पानी उपलब्ध हो जाता था, वहीं अब आर्थिक रूप से सक्षम लोग 200–350 फीट या उससे अधिक गहराई तक बोरिंग करवाने के लिए मजबूर हो चुके हैं।
इस भयावह स्थिति के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है?
सबसे पहला और बड़ा कारण है अनियंत्रित औद्योगिक प्रदूषण।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला रासायनिक कचरा बिना पर्याप्त शोधन के नदियों और नालों में छोड़ा जाता रहा है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा स्थानीय नदियों ने भुगता है। इन नदियों का पानी आज कई स्थानों पर इतना प्रदूषित हो चुका है कि वह जीवनदायिनी नदी की बजाय रासायनिक नाले जैसा दिखाई देता है।
दूसरा बड़ा कारण है कृषि में रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग।
हरित क्रांति के बाद उत्पादन बढ़ाने की होड़ में कीटनाशकों, रासायनिक उर्वरकों और खरपतवारनाशकों का अत्यधिक उपयोग शुरू हुआ। इन रसायनों का एक बड़ा हिस्सा वर्षा और सिंचाई के माध्यम से मिट्टी के भीतर चला जाता है और धीरे-धीरे भूमिगत जल को भी प्रदूषित कर देता है। नाइट्रेट, सल्फेट और अन्य रसायन इसी प्रक्रिया के माध्यम से जल स्रोतों में घुलते जाते हैं।
तीसरा और शायद सबसे चिंताजनक कारण है व्यवस्थागत विफलता।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनाए गए संस्थान और विभाग अक्सर केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी संस्थाओं का दायित्व है कि वे औद्योगिक इकाइयों की निगरानी करें और प्रदूषण फैलाने वालों पर कठोर कार्रवाई करें, किंतु वास्तविकता यह है कि अनेक मामलों में ये संस्थाएं या तो संसाधनों की कमी का बहाना बनाती हैं या फिर भ्रष्टाचार और उदासीनता के कारण प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पातीं। परिणामस्वरूप प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग निर्भय होकर अपने अपशिष्ट जल को नदियों और जमीन में छोड़ते रहते हैं।
आज स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि आम जनता के पास सुरक्षित जल का विकल्प सीमित होता जा रहा है। सरकार की हर घर नल योजना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन यदि स्रोत का पानी ही प्रदूषित होगा तो पाइपलाइन से आने वाला पानी भी सुरक्षित नहीं रहेगा। दूसरी ओर आर्थिक रूप से संपन्न लोग गहरे बोरिंग, महंगे फिल्टर और आरओ सिस्टम के सहारे अपनी व्यवस्था कर लेते हैं, जबकि गरीब और ग्रामीण परिवार वही प्रदूषित पानी पीने के लिए मजबूर रहते हैं।
यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं है; यह सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी गंभीर खतरा है। दूषित जल के कारण पेट और आंतों के रोग, त्वचा संबंधी समस्याएं, किडनी की बीमारियां और यहां तक कि कैंसर जैसी घातक बीमारियों का जोखिम भी बढ़ जाता है। यदि समय रहते इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र जल संकट और स्वास्थ्य संकट दोनों का केंद्र बन सकता है।
समस्या गंभीर है, लेकिन समाधान असंभव नहीं। सबसे पहले औद्योगिक इकाइयों के लिए शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति अपनानी होगी। बिना शोधन के अपशिष्ट जल छोड़ने वाले उद्योगों को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। दूसरी ओर कृषि में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना होगा। जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन जैसे कदम भी अत्यंत आवश्यक हैं।
सबसे महत्वपूर्ण है जनजागरूकता और सामुदायिक भागीदारी। जब तक समाज स्वयं जल संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानेगा, तब तक केवल सरकारी योजनाएं इस समस्या का समाधान नहीं कर पाएंगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दोआबा कभी प्रकृति की उदारता का प्रतीक था। आज वही क्षेत्र मानव लालच और लापरवाही की कीमत चुका रहा है। सवाल यह है कि क्या हम समय रहते चेतेंगे, या फिर आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल प्रदूषित नदियां और जहरीला पानी ही छोड़कर जाएंगे?
क्योंकि सच यही है — यदि पानी बचा रहेगा, तभी भविष्य बचेगा। (लेखक के अपने विचार हैं)