केरल में कांग्रेस को सत्ता में आने का भरोसा

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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पिछले लोकसभा चुनावों में जब कांग्रेस को 99 सीटें मिली तो इसके नेताओं का आत्मविश्वास बढ़ गया था. उनको लगा कि पार्टी फिर एक नई ताकत के साथ उभर रही है। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद जब देश में 6 विधानसभायों के चुनाव हुए तो इनमें से कहीं भी पार्टी की जीत नहीं हुई। बल्कि इसे आशा से बहुत कम सीटें मिली। पार्टी को लगता था कि हरियाणा में इसकी जीत सुनिश्चित है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।बिहार जैसे राज्य में पार्टी केवल 6 सीटें मिली। इसी तरह महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षा से कहीं कम था। दिल्ली, झारखंड तथा जम्मू, कश्मीर में भी पार्टी को निराशा का सामना करना पड़ा।
अब अप्रैल के महीने में चार राज्यों की विधानसभायों तथा एक केंद्र शासित राज्य में विधानसभा के चुनाव होने है . इनमें से एक राज्य को छोड़ कर कांग्रेस पार्टी को कहीं भी सत्ता में आने की उम्मीद नहीं है . तमिलनाडु में कांग्रेस वर्तमान में सत्तारूढ़ दल द्रमुक का जूनियर पार्टनर है . राज्य में कुल 234 विधान सभा सीटें है . दोनों दलों में हुए समझौते के अनुसार कांग्रेस पार्टी को कुल 28 सीटें मिली है। पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 25 सीटें मिली थी तथा यह 18 सीटें जीतने में सफल रही थी। द्रमुक ने कांग्रेस पार्टी को सत्ता में भागीदारी नहीं दी थी। इस बार भी द्रमुक ने साफ़ कर दिया है कि अगर उनका गठबंधन फिर सत्ता में आता है तब भी कांग्रेस् के किसी विधायक को मंत्री पद नहीं दिया जायेगा।
असम में बीजेपी लगातार दूसरी बार सत्ता में है . पिछले कुछ दिनों में राज्य कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ने का ऐलान किया तथा बीजेपी में शामिल हो गए . राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिश्व सरमा उत्साह से लबरेज है। राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई के लिए ये चुनाव एक बड़ी चुनौती है . पिछले चुनावों में मुस्लिम पार्टी आल इंडिया डेमोक्रेटिक फ्रंट ने कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था। लेकिन इस बार फ्रंट ने कांग्रेस से गठबंधन से इंकार कर दिया. इसलिए कांग्रेस को मिलने वाले मुस्लिम वोट कम हो जायेंगे। राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 36 प्रतिशत है इसलिए चुनावों में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।हालाँकि बीजेपी और कांग्रेस ने छोटे दलों के साथ मिलकर गठबंधन बना लिया है लेकिन इस मामले भी बीजेपी कांग्रेस से आगे है। वैसे भी मुख्यमंत्री सरमा ने ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ा जिससे राज्य में चुनाव पूरी तरह से हिन्दू बनाम मुस्लिम हो जाने में कमी न हो।
पश्चिम बंगाल में लगभग सीधा मुकाबला बीजेपी और टी एम सी में है. कांग्रेस सहित कोई अन्य दल कहीं नज़र आता। पिछले चुनावों में कांग्रेस पार्टी यहाँ खाता भी नहीं खोल पाई थी।
ऐसी स्थिति में केरल ही एक ऐसा राज्य बचा है जहाँ कांग्रेस दस साल बाद फिर सत्ता में लौटने के लिए पूरी तरह से आश्वस्त है। राज्य में आम तौर पर मार्क्सवादी नीत लेफ्ट मोर्चा तथा कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा हर पांच साल बाद बारी से सत्ता में आते रहे है . लेकिन 2021 के विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में आने में सफल रहा. केवल इतना नहीं बल्कि इसे 2016 के विधान सभा चुनावों से भी अधिक सीटें मिली . यह सब तब हुआ जब कांग्रेस को 2019 तथा 2024 के लोकसभा चुनावों में कुल 20 से 18 सीटें मिली थी। लेकिन इस बार कांग्रेस के आत्मविश्वास का बड़ा कारण राज्य में कुछ महीने पहले हुए पंचायत राज तथा स्थानीय निकायों के हुए चुनावों के नतीजे है . इन चुनावों में कांग्रेस मार्क्सवादी दलों बहुत आगे रही . कांग्रेस पार्टी को 41 प्रत्तिशत वोट मिले जब कि वाम मोर्चे को 38 प्रतिशत ही वोट मिले .इन चुनावों ने बीजेपी भी तीसरे बड़े दल के रूप में सामने आई . इसे 14 प्रतिशत वोट मिले .
इन चुनावों के लिए उम्मीदवार घोषित करने में वाम मोर्चा और बीजेपी आगे रहे . विधानसभा में कुल 140 सीटें हैं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अपने हिस्से के सभी 81 उम्मीदवारों की घोषणा उसी दिन कर दी थी जिस दिन चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम जारी किया था। बीजेपी ने भी अपने अधिकतर उम्मीदवारों घोषणा अगले दिन कर दी। कांग्रेस ने अपने काम करने के तरीके अनुसार उम्मीदवारों की घोषणा करने में अपना समय लिया। इसकी वज़ह कांग्रेस की भीतरी गुटबन्दी के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता .इसमें कोई सन्देह नहीं कि राज्य में आमतौर पर मतदाता वाम मोर्चे की सरकार् से अधिक खुश नहीं। इसका सीधा लाभ कांग्रेस को मिलेगा . बीजेपी को भी इन चुनावों में निश्चित रूप से कुछ लाभ मिलेगा। अभी फ़िलहाल यही कहा जा सकता है बीजेपी राज्य का तीसरा बड़ा राजनीतिक दल बन सकता है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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