इतिहास सिर्फ़ तारीखों और वाक़ेआत का ब्यौरा नहीं एक ज़िन्दा एहसास होता है

नवाबी नगरी टोंक की दास्तान
बुक रिव्यू
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इतिहास सिर्फ़ तारीखों और वाक़ेआत का ब्यौरा नहीं एक ज़िन्दा एहसास है।
वो एहसास जिसमें हम अपनी जड़ों को, अपनी तहज़ीब को और अपनी असली पहचान को साफ़-साफ़ देख पाते हैं।
“नवाबी नगरी टोंक की दास्तान” उसी ज़िन्दा एहसास की एक अदना-सी कोशिश है।
टोंक—बनास नदी की लहरों के किनारे बसा वो शहर, जहाँ विराट सभ्यता की गूँज अभी भी सुनाई देती है, पाण्डवों के अज्ञातवास की परछाइयाँ अभी भी महसूस होती हैं, जहां सूफ़ी संतों की रूहानी ख़ुशबू आज भी हवा में बसी हुई है।
इस धरती ने पृथ्वीराज चौहान,इल्तुतमिश और रज़िया सुल्तान के दौर देखे, अलाउद्दीन खिलजी की तलवार की चमक देखी, सोलंकियों की ख़ुद्दारी देखी,मुग़लों और मराठों के उतार-चढ़ाव महसूस किए, फिर नवाब अमीर ख़ाँ की बेपनाह शान-ओ-शौकत को अपनी गोद में समेटा और रियासत ए टोंक का ‘ दार उल ख़िलाफ़ा’ होने का शरफ़ हासिल किया। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की मेहमान नवाज़ी की, आज़ादी से लेकर आज तक के नशेबो फ़राज़ देखे, इन सबको मैंने इस तारीखी ड्रामे में महज़ सूखे तथ्यों तक सीमित नहीं रखा।इसे एक ज़िन्दा ड्रामाई दास्तान की शक्ल दी है—ताकि पाठक न सिर्फ़ पढ़े, बल्कि देखे, महसूस करे और जी सके।
यहाँ नवाबों के कारनामे हैं, तो बेगमात की खिदमात भी।
चारबेत की सदा है, तो मुशायरों की महफ़िलें भी।
मीलाद शरीफ़ की रौनक़ है, तो इल्मी और अदबी सरगर्मियों की चमक भी।सबसे ख़ास बात—यह दास्तान टोंक की उस गंगा-जमुनी तहज़ीब की कहानी है, जिसमें मुहब्बत, रवादारी और इल्म की रौशनी सदियों से लगातार फैलती रही है।
अतीत की शान और वर्तमान की हक़ीक़त—मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अरबी-फ़ारसी शोध संस्थान की मौजूदा हालत से लेकर आज़ादी के बाद के विकास तक—सब कुछ इस किताब में एक साथ साँस लेता है।
यह तहरीर किसी एक ज़ेहन की पैदावार नहीं।यह उन तमाम मुहक़्क़िक़ीन और मुसन्निफ़ीन की अमानत है जिनकी मेहनत और इल्मी काविशों ने मुझे यह हौसला दिया कि मैं टोंक की इस रौशन तारीख़ को एक नए अंदाज़ में पेश कर सकूँ।
इस किताब का मुक़द्देमा आलमी शोहरत याफ़्ता अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जीनियस प्रोफ़ेसर ज़िया उर्रहमान सिद्दीक़ी साहब ने लिखा। इसके लिए मैं सरापा सिपास हूं।कंपोजिंग और कवर पेज में सआदत रईस ने अपना ख़ून ए जिगर सर्फ़ किया जिसके लिए मैं ज़ाती तौर पर उनका शुक्रिया अदा करता हूं।
मैं दावा नहीं करता कि यह किताब मुकम्मल है, लेकिन यह ज़रूर कह सकता हूँ कि इसमें ख़ुलूस , मुहब्बत और अपने वतन टोंक के लिए सच्चा जज़्बा है।
अगर यह दास्तान आपके दिल में टोंक के लिए मुहब्बत और उसकी तारीख़ को समझने का शौक़ पैदा कर सके, तो मेरी यह कोशिश कामयाब समझी जाएगी।
इन शा अल्लाह बहुत जल्द (मई 2026 )इस किताब का इजरा अमल में आएगा। लेखक : डॉ सैयद सादिक अली

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