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राजस्थान में पेड़ों की कम होती दुर्लभ प्रजातियां, सैकड़ो वर्ष पुराने पेड़ों की पहचान नहीं होने, सरिस्का बाघ परियोजना क्षेत्र जैसे अभयारण्य क्षेत्रों में सैकड़ो हजारों वर्ष पुराने वृक्ष होना ग्रामीणों द्वारा बताए जाते हैं, पेड़ों की अनेकों दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती है, लेकिन उनकी पहचान अभी तक सार्वजनिक नहीं हो सकी, यह एक बड़ा चिंतनीय विषय है। एलपीएस विकास संस्थान के प्रकृति प्रेमी राम भरोस मीणा ने कहा कि क्षेत्र में सैकड़ो प्रजातियों के वर्षो पुराने बरगद पीपल नीम गुलर धोक सहित अनेकों प्रकार के दुर्लभ पेड़ मोजूद है जिन्हें संरक्षण दिया जाना आवश्यक है, लोगों की आस्थाओं से जुड़े हुए हैं, लेकिन आज तक किसी भी पेड़ को हेरिटेज ट्री की उपाधि प्राप्त नहीं होना चिंतनीय है। मीणा ने कहा कि हेरिटेज वृक्ष नहीं होने के चलते लोगों में वृक्षों के प्रति आई निराशा, लकड़ी की आपूर्ति के लिए पेड़ों का अंधाधुंध कटान, दुर्लभ पेड़ों की खत्म होती प्रजातियां, वृक्षों के लिए चिंता का विषय है, सरिस्का राष्ट्रीय अभ्यारण क्षेत्र में सैकड़ो पौराणिक स्थान, कल-कल बहती नदियां, वन्य जीव, झरनें, मनमोहक प्राकृतिक स्थल देखने को मिलते हैं।
राजस्थानी संस्कृति में पेड़ों की पुजा की जाती रही है, इसके चलते पेड़ों को सरंक्षण प्राप्त हुआ, नारायणपुर में पीर जी महाराज के स्थान पर स्थित खेजड़ी का वृक्ष पांच सो वर्ष से अधिक पुराना है, ग्राम भोपाला के उपली गुवाड़ी में नीम का पेड़ तीन सो पच्चास वर्ष पुराना स्थिति है, सालेटा में बसंता नाथ के कुएं पर स्थित बरगद का पेड़ दो सो वर्ष से अधिक पुराना है, जिन्हें उपेक्षा के चलते सरंक्षण प्राप्त नहीं हो रहा।
वृक्षों को हेरिटेज घोषित कर सुरक्षा दी जानी चाहिए, इससे एतिहासिक पहचान के साथ टयुरिजम को बढ़ावा मिलेगा, पेड़ों को संरक्षण प्राप्त होगा, इकोलॉजिकल सिस्टम बना रहेगा, पेड़ों के प्रति आस्था जागरूक होगी, बढ़ते तापघात से बचा जा सकेगा, इसलिए वर्तमान स्थिति को देखते हुए पेड़ों को हेरिटेज घोषित करना आम व्यक्ति के लिए लाभकारी सिद्ध होगा।