लोकतंत्र में जाति धर्म का जंगलराज क्यों? -वेदव्यास

27 मई देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पुण्यतिथि पर विशेष
लेखक : वेदव्यास
लेखक साहित्य मनीषी व वरिष्ठ पत्रकार हैं
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आज के भारत में महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू ही दो ऐसे नाम हैं जिनके बारे में बच्चे बूढ़े कुछ न कुछ जरूर बोल सकते हैं और लिख भी सकते हैं। लेकिन इन दोनों की विडम्बना भी यह है कि लोग अब इन्हें अप्रासंगिक समझकर अनुकरण की मुख्यधारा से बाहर धकेलते जा रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों बाल दिवस पर जवाहर लाल नेहरू के जीवन को सुनकर मुझे फिर से यह विश्वास मिला कि भारतीय समाज और राजनीति के अनेक उत्तर आज भी नेहरू के व्यक्तित्व और कृतिव में खोजे जा सकते हैं। क्योंकि जवाहर लाल नेहरू, स्वभाव से एक राजनीतिज्ञ नहीं थे और स्वप्नदृष्टा देशभक्त थे इसलिए नए भारत की उनकी अवधारणा मुझे आज भी प्रासंगिक लगती है।
जवाहर लाल नेहरू, अपने 75 वर्ष के जीवन में 17 वर्ष तक (1947-1964) देश के पहले और लोकप्रिय प्रधानमंत्री रहे तथा भारत के विकास की नींव रखने का उनका योगदान कभी कोई भुला नहीं सकता। वह महात्मा गांधी के सबसे प्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे और एक ऐसे समृद्ध परिवार से थे जिसने अपना सर्वस्व भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने में समर्पित कर दिया था। नेहरू के व्यक्तित्व का जादू ही कुछ ऐसा था कि जनता उन्हें एक स्वप्न की तरह ही देखती थी। भारत की राजनीति में अब जवाहर लाल नेहरू के विचार और चिंतन की कोई विरासत हमें नहीं दिखती क्योंकि राजनीति अब अपराधियों का स्वर्ग है तथा लोकतंत्र धनबल और बाहुबल का बंदी है। अब राजनीति के सबसे शक्तिशाली अंगरक्षक ही धर्म और जाति के पहलवान हैं तथा इस गंदे खेल में जवाहर लाल नेहरू अब एक तस्वीर मात्र रह गए हैं। जवाहर लाल नेहरू ने 15 अगस्त, 1947 को लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम जो उद्बोधन दिया था वह मुझे आज भी याद दिलाता है कि हिंदुस्तान एक समस्या प्रधान राष्ट्र होने के साथ-साथ संभावना प्रधान राष्ट्र भी है। नेहरू ने तब यह कहा था कि गरीबी, अशिक्षा और फिरका परस्ती आज की हमारी सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। जवाहर लाल नेहरू क्योंकि एक व्यावहारिक राजनेता नहीं थे और विचारशील अध्येता और समाजशिल्पी थे- उन्होंने देश में विविधता को एकता का जो स्वर दिया वह आज भी हमारे विकास की प्राणवायु है।
उन्होंने भारत गणराज्य की स्थापना के समय ही यह जान लिया था कि अनेक धर्म, संप्रदाय, जाति, भाषाएं, क्षेत्रीयताएं और मत मतांतर में उलझी एशिया की यह संस्कृति और सभ्यता अपने साझा सरोकार रखकर ही जीवित है तथा अतिवाद और संकीर्णतावाद का कोई स्थान नहीं है। इसी दूरगामी समझ को अपनाते हुए उन्होंने देश को मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता दिया तथा यूरोप को जानकर इसका एक ऐसा मजबूत औद्योगिक ढांचा तैयार किया जिसमें सार्वजनिक उपक्रम और निजी क्षेत्र को बराबर से आगे बढ़ने का अवसर मिला। बड़े इस्पात के संयंत्र और बड़े बांध बनाने का उनका निर्णय ही आज हमें इस बात का भरोसा दिलाता है कि विकास का मूलभूत ढांचा भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बिजली, पानी, सड़क और शिक्षा के बल पर ही खड़ा हो सकता है। जवाहर लाल नेहरू, मुझे तो आज भी इसलिए प्रासंगिक लगते हैं कि यदि वह नए भारत की बुनियाद में योजना आयोग, पंचायती राज, सर्वशिक्षा, अणुशक्ति आयोग, गुट निरपेक्ष आंदोलन, संस्कृति केंद्रों की स्थापना और औद्योगिक संयंत्र तथा बड़े बांधों का निर्माण नहीं कराते तो यह 140 करोड़ देवी-देवताओं का देश 21वीं शताब्दी के किस चौराहे पर आज खड़ा मिलता। वस्तुतः नेहरू के भीतर यूरोप, भारत और समाजवादी सोवियत संघ की एक सामूहिक चेतना का उद्भव सक्रिय था और वह युद्ध तथा शांति के बीच शांति को ही मनुष्य और दुनिया का विकल्प मानते थे।
जवाहर लाल नेहरू की इतिहास और संस्कृति की समझ कितनी व्यापक थी इसे जानने के लिए आप उनकी लिखी तीन पुस्तकें ही (हिंदुस्तान की खोज, विश्व इतिहास की झलक और पिता के पत्रःपुत्री के नाम) पढ़ लें। आप देखेंगे कि वह एक शासक और शहंशाह नहीं थे अपितु, एक संयोजक और सूत्रधार अधिक थे। नेहरू की इतिहास और संस्कृति की समझ इतनी गहरी और आधुनिक थी कि दुनिया के महानतम व्यक्तियों में उन्हें माना जाता था और उनकी समझ को समाज विज्ञान में बदलाव का प्रेरक कहा जाता था। जवाहर लाल नेहरू के लालकिले की प्राचीर से दिए गए भाषण, संविधान सभा और संसद की बहसों और यत्र-तत्र व्यक्त विचारों को फिर से पढ़ने पर मुझे तो बार-बार यह लगता है कि भारत और दुनिया के बारे में उनकी अवधारणाएं कितनी यथार्थ परक थीं। आजादी के बाद भारत को वैज्ञानिक समाजवाद के रास्ते पर ले जाने का उनका विचार और धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल प्रेरणा बनाने का प्रयास कितना महत्वपूर्ण और दूरगामी था। आप और हम नेहरू को भला कैसे कम आंक सकते हैं। जब पूरी दुनिया आज भी उनके गुट निरपेक्ष आंदोलन को पुनः सक्रिय करने में जुटी हुई है। उन्होंने पूंजीवाद को कभी इस गरीब और विभाजित दुनिया का विकल्प नहीं माना अपितु वह हर बार वैज्ञानिक समाजवाद को ही नई दुनिया का आदर्श प्रतिमान बताते थे।

जवाहर लाल नेहरू, बच्चों के प्रिय चाचा नेहरू, इसलिए थे कि उनके मन में बाल सुलभ मनोवैज्ञानिक गहराइयां थीं और वह बहुत सहज और स्वाभाविक व्यक्ति थे। उनका सौंदर्यप्रेम उनके विचारों में और स्वप्न में बोलता था और यही कारण है कि गांधीजी और जवाहर लाल भारतीय भाषाओं की कविताओं में सबसे अधिक प्रेरक और नायक समझे गए हैं। नेहरू ने मेरी समझ से कभी मूर्तिपूजा और व्यक्तिपूजा को पसंद नहीं किया और वह बच्चों के द्वारा बड़ों के चरण स्पर्श करने को भी अच्छा नहीं कहते थे। जवाहर लाल नेहरू अर्थशास्त्री तो नहीं थे लेकिन एक वैज्ञानिक समाजशास्त्री जरूर थे और देश के पर्यावरण और प्रकृति से बहुत प्यार करते थे। उनका व्यक्तित्व भले ही एक सपनों के राजकुमार जैसा था लेकिन वह मन से बहुत सरल इंसान थे। यह हमारा दुर्भाग्य ही रहा कि नेहरू के बाद हमें अनेक शासक तो मिले लेकिन कोई इतिहास बोध से भरा स्वप्नजीवी प्रधानमंत्री नहीं मिला। उन्होंने 1952 में देश का पहला आम चुनाव जिस ईमानदारी और शांति से पूरा करवाया हम आज उसी सशक्त नींव पर चुनाव-दर-चुनाव दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र को विकसित देख रहे हैं। आज कांग्रेस भले ही जवाहर लाल नेहरू की समाधि पर वर्ष में एक बार चक्कर लगाती हो लेकिन वह नेहरू की साझा सांस्कृतिक विरासत और विकास के आदर्श को लगभग भुलाती जा रही है। जवाहर लाल नेहरू, कांग्रेस के वर्षों तक अध्यक्ष भी रहे हैं और इनकी विरासत से हमें इंदिरा गांधी भी मिली है लेकिन नेहरू का पर्याय भारत के राजनीतिक जीवन में हमें आज भी ढूंढ़े नहीं मिल रहा है।
नेहरू एक गुणग्राहक व्यक्ति थे और साहित्य, संगीत एवं कला की सुरुचि से भरपूर थे। वह एक समय था जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और भीमराव अंबेडकर तथा राजगोपालाचारी जैसे नायक नए भारत के निर्माता-निर्देशक थे और अनेक मतभेदों और असहमतियों के बावजूद भी एक लोकतांत्रिक समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य की संप्रभुता के लिए काम करते थे। यह भी एक युग था जब राजनीति में आत्मत्यागी लोगों का बोलबाला था और व्यक्ति से बड़ा समाज को माना जाता था। जवाहर लाल नेहरू को आज एक बार फिर से देश के लिए प्रासंगिक मानते हुए मेरा तो यही सोचना है कि भारत-पाकिस्तान के विभाजन और कश्मीर समस्या को लेकर उन्हें दोषी मानना भी हमारी भूल है तथा वंशवाद की विकृत समाजवादियों द्वारा दुराग्रह से प्रायोजित बहस भी, जवाहर लाल नेहरू के संपूर्ण योगदान के प्रति अन्याय है। (लेखक के अपने विचार है)

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