काल की दृष्टि में सब बराबर है : प्रो (डॉ.) सोहन राज तातेड़

समय और ज्वार भाटा कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करते
लेखक : प्रोफेसर (डॉ.) सोहन राज तातेड़
पूर्व कुलपति सिंघानिया विश्वविद्यालय, राजस्थान
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मानव जीवन में समय का बहुत महत्व है। जिसने अपने जीवन में समय का सदुपयोग किया उसकी उन्नति होती है और जिसने समय का दुरुपयोग किया या समय को नष्ट किया, उसको समय नष्ट कर देता है। समय बड़ा बलवान होता है। समय का विवेचन साहित्यिक, धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से किया जा सकता है। साहित्यिक दृष्टि से समय या काल का विवेचन अनेक साहित्यकारों ने किया है। कबीरदासजी ने संसार को काल का चबैना बताया है- जगत् चबैना काल का कुछ मुख में कुछ गोद। संसार काल का चबैना है, कुछ को तो काल ने चबा डाला है और कुछ उसकी गोद में बचा हुआ है। समय आने पर उसको भी काल चबाकर समाप्त कर देगा। इस प्रकार काल एक ऐसा तत्व है जो सबके साथ समान रूप से बर्ताव करता है। काल की दृष्टि में सब बराबर है। धार्मिक दृष्टि से काल का महत्व धर्मकर्म के लिए किया जाता है। कुछ दिन या कुछ मास धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होते है। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि महीनों में माघ का महीना हूं। इसी से पता चलता है कि धार्मिक दृष्टि से भी काल का महत्व है। कुछ दिनों या कुछ महीनों में दान या पुण्य का कर्म अधिक फलदायी होता है। दार्शनिक दृष्टि से भी काल का विवेचन किया गया है।
दार्शनिक दृष्टि से काल अनुमेय है। परिवर्तन के द्वारा काल का ज्ञान होता है। बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था में परिवर्तन निरन्तर चल रहा है। इसी से अनुमान किया जाता है कि इस परिवर्तन के पीछे काल ही कारण है। अतः काल का हर दृष्टि से महत्व है। जिसने काल का सदुपयोग कर लिया वहीं श्रेष्ठ बन जाताह है। द्रौपदी के स्वयंवर के समय अनेक राजे, महाराजे और धनुर्धर सभा में एकत्रित हुए थे। सभी ने अपनी शक्ति और पराक्रम से निर्धारित शर्त के अनुसार लक्ष्य को भेदना चाहा लेकिन सफलता अर्जुन को मिली। अर्जुन ने देशकाल और परिस्थिति के अनुसार अपनी शक्ति का संचय कर लक्ष्य को भेदा। जब अर्जुन से पूछा गया कि आप क्या देख रहे हो तो अर्जुन ने कहा कि इस समय मैं केवल मछली की आंख देख रहा हूं जिस पर हमें शरसंधान करना है। अर्जुन का पराक्रम सही दिशा में किया गया था और उन्होंने सफलता प्राप्त की। समय के अनुकूल कार्य करना चाहिए। आज का किया गया कर्म ही भाग्य या पुरुषार्थ बनता है और पुरुषार्थ के परिणाम के अनुसार ही हमें इस जीवन में फल भोगना पड़ता है। जिसने पूर्वजन्म मंे अच्छा कर्म किया है उसको अच्छा फल मिलता है और जिसने बुरा कर्म किया है उसे बुरा फल मिलता है। भारतीय संस्कृति का यह विश्वास है कि कर्म अपना फल दिये बिना समाप्त नहीं होता। यह धर्म प्रधान संस्कृति है। आत्मा और पुनर्जन्म में विश्वास करती है। चार्वाक अनात्मवादी दर्शन है।
चार्वाक का मानना है कि आत्मा पंचतत्वों के मिश्रण से अपने आप बन जाती है। अतः आत्मा भी भौतिक है। किन्तु अन्य आत्मवादी दर्शन ऐसा नहीं मानते। उनके अनुसार आत्मा सच्चिदानंद स्वरूप है। यह घट-घट व्यापी है। इसी के द्वारा संसार का प्रत्येक कार्य हो रहा है। काल के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि वास्तव में काल ही बलवान होता है मनुष्य नहीं। भगवान् राम को चौदह वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा और वहां पर उन्होंने मर्यादा की रक्षा के लिए पूरे तन-मन से प्रयास किया। कोई भी कार्य कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। यदि काम को करना है तो उसे तत्काल को कर डालना चाहिए। क्योंकि आने वाले क्षण में क्या स्थिति रहेगी इसे कोई नहीं जानता। समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होता। वृक्ष को यदि आज रोपण किया गया है तो समय पर ही वह फल देगा। कितना भी प्रयास किया जाये वह समय से पहले फल नहीं दे सकता। कार्य को करने के लिए योजनाबद्ध होना जरूरी है। समय का सही इस्तेमाल किजीए और मोके का फायदा उठाकर लाभ लिया जा सकता है।
हर व्यक्ति के जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए इस पर तीन अवसर देता है। पहला बचपन, दूसरा जवानी, तीसरा बुढ़ापा। बचपन खेलने-कूदने और शिक्षा ग्रहण करने का काल है। जिसने अच्छे ढ़ंग से शिक्षा प्राप्त करके जीवन को सफल बना लिया है वह पूरी जिन्दगी आराम से जीता है और उसकी जवानी और बुढ़ापा आराम से बीतता है। जिसने अनावश्यक कर्म में अपने जीवन को बीताया है वह जीवन भर दुःख उठाता है। उसकी सोच नकारात्मक हो जाती है। मानव के दिमाग में केवल एक ही विचार रखना चाहिए। वह विचार सकारात्मक होना चाहिए। नकारात्मक विचार मनुष्य को निराशा प्रदान करता है। समय एक प्रकार का धन है जिसे या तो खर्च किया जा सकता है या उसका निवेश किया जा सकता है। यदि समय का ईमानदारी से निवेश किया गया है तो सफलता मिलती है। संसार में अच्छी आदतों को ही अपनाना चाहिए। समय का पालन, यथार्थ दृष्टि कर्त्तव्यपरायणता और कार्यकुशलता इन्हीं आदतों के बल पर मनुष्य सफलता प्राप्त करता है। समय बहुमूल्य है इसलिए हमें समय को कभी बर्बाद नहीं करना चाहिए। बच्चों को बचपन से ही समय के मूल्य या महत्व के बारे में बताना चाहिए। समय धन से भी अधिक मूल्यवान है। धन को खर्च कर देने पर उसे पुनः प्राप्त किया जा सकता है किन्तु यदि समय को नष्ट कर दिया तो उसको प्राप्त नहीं किया जा सकता।
समय और ज्वार भाटा कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करते यह बिल्कुल पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व की तरह ही सत्य है। समय निर्वाद रूप से चलता रहता है। यह कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। इसलिए हमें जीवन में कभी भी बहुमूल्य समय को व्यर्थ में गवांना नहीं चाहिए। हमें जीवन में कुछ न कुछ निरंतर सीखते रहना चाहिए। हमें हर पल समय से नियमितता, निरंतरता और प्रतिबद्धता सीखनी चाहिए। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का प्रयास करना चाहिए। समय सभी के लिए अनमोल है, सभी के लिए निःशुल्क है। इसे न तो कोई खरीद सकता है न कोई बेच सकता है। जो व्यक्ति समय को खो देता है, वह उसे कभी वापस प्राप्त नहीं करता है। यदि हम समय पर भोजन नहीं करेंगे या समय पर अपनी दवाईया नहीं लेंगे तो समय हमारे स्वास्थ्य को नष्ट कर सकता है। समय बहती हुई नदी की तरह है। जो निरंतर आगे बढ़ता रहता है कभी वापस नहीं आता।
हमें सही समय पर उठना, तरो ताजा होना, स्नान करना, नाश्ता भोजन इत्यादि करना, विद्यालय जाने के लिए तैयार होना गृहकार्य करना, अध्ययन करना इत्यादि कार्य को समय से करना चाहिए। यदि हम अपनी दिनचर्या को नियमित नहीं रखेंगे तो हम जीवन में दूसरे लोगों से पीछे रह जायेंगे। बहुत से लोग अपना जीवन अर्थहीन ढ़ंग से जी रहे है। वे समय का उपयोग केवल अपने मित्रों के साथ खाने खेलने में और आलस्य मंे बीता देते है। वे कभी भी यह नहीं सोचते कि उनके द्वारा किया गया कार्य समय के अनुकूल है या प्रतिकूल। मनुष्य एक पल मे अमीर हो सकता है और एक पल में ही गरीब। अतः जीवन में समय का अंकन जरूरी है। समय बहुत ही आश्चर्यजनक वस्तु है इसका न आदि है न अंत, यह बहुत ही बलवान् है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)

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