
सिमरन बाई ने इंसानियत’ का झंडा बुलंद कर दिया
जाफ़र लोहानी
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मनोहरपुर (जयपुर)। ताली बजाने वाले हाथ अब थाली भर रहे हैं समाज ने मुंह मोड़ा तो इन्होंने गले लगा लिया जिस्म से नहीं, ‘कर्म’ से पहचान बनाई, ऐसी सिमरन हर शहर को चाहिए
जिन्हें लोग मांगने वाला कहकर बस स्टैंड पर 10 रुपये दे देते हैं, उनमें से एक सिमरन बाई ने बता दिया कि ‘औकात’ जात से नहीं, ‘जज्बात’ से होती है।
- ‘भात’ वाली माई: भूखे का पेट, इनकी जन्नत
शहर में जहां कोई भूखा सोता मिल जाए, सिमरन बाई का लंगर चालू हो जाता है। हर मंगल – शनिवार को मंदिर के बाहर लोगों को खाना। खुद खड़ी होकर परोसती हैं। बोलती हैं – “मेरा कोई नहीं, तो सब मेरे हैं”। - ‘बेसहारा का सहारा’: अनाथ आश्रम से वृद्धाश्रम तक
- यतीम बच्ची की शादी: दहेज, कपड़ा, गहना – सब सिमरन बाई का।
- बुजुर्गों की दवा: वृद्धाश्रम में महीने का राशन-पानी, दवाई का खर्च इनके जिम्मे।
- लावारिस लाश: कफन-दफन का इंतजाम भी ये ही कराती हैं।
लोग कहते हैं – “जिसे दुनिया ने बेसहारा कहा, वो हजारों का सहारा बन गई”।
- ‘गऊ भक्त’ सिमरन: गौशाला की अन्नपूर्णा
शहर की गौशाला में हर अमावस्या को ट्रक भरकर चारा भिजवाती हैं। बीमार गाय का इलाज, बछड़ों की देखभाल। पंडित जी बोले – “ये तो साक्षात ‘गौ माता’ की बेटी है”। - ‘सामूहिक विवाह’ की लक्ष्मी
हर साल होने वाले सामूहिक विवाह सम्मेलन में सबसे बड़ी दानदाता सिमरन बाई। 51 जोड़ों को बेड, बर्तन, पंखा, मंगलसूत्र। स्टेज पर बुलाते हैं तो हाथ जोड़कर बोलती हैं – “मैं तो निमित्त हूं, देने वाला ऊपर वाला है”
समाज को आईना - ताली से तालीम तक: जिन्हें हम ताली बजाने वाला समझते थे, वो ‘तालियां बटोरने’ वाला काम कर रहे हैं।
- ‘किन्नर’ नहीं ‘किनारा’ हैं: समाज के किनारे लगे लोग ही डूबते को किनारा देते हैं।
- धर्म का असली मतलब: मंदिर-मस्जिद जाने से बड़ा धर्म है ‘भूखे को खाना खिलाना’ – ये सिमरन ने सिखा दिया।
‘सिमरन बाई के 3 बोल’ – जो दिल चीर दें - “रब ने मुझे औलाद नहीं दी, तो मैंने दुनिया को औलाद मान लिया”।
- “लोग 10 रुपये देकर पाप धोते हैं, मैं 10 लाख देकर पुण्य कमाती हूं”।
- “इज्जत कपड़ों से नहीं, कर्मों से मिलती है”।
लोहानी की अपील:
अगली बार सिमरन बाई दिखे तो 10 का नोट नहीं, ‘सिर झुकाकर सलाम’ करना। और हो सके तो इनके ‘नेकी के लंगर’ में अपना हिस्सा भी डालना।