
लेखक: डॉ. पी.डी. गुप्ता
पूर्व निदेशक ग्रेड वैज्ञानिक, कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र, हैदराबाद, भारत
अनुवाद : फातिमा जौहर (अहमदाबाद)
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प्रकाश और छाया की तरह, प्रेम और घृणा भी अविभाज्य थे। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं था। आइए सबसे पहले प्रकाश को समझते हैं। प्रकाश ऊर्जा का एक रूप (विद्युतचुंबकीय विकिरण) है, जिसके प्रति हमारे शरीर के अंग प्रतिक्रिया करते हैं। प्रकाश की तरंगदैर्ध्य 400 से 700 नैनोमीटर के बीच होती है। इस पृथ्वी पर प्रकाश का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है।
दरअसल, सर सी.वी. रमन (1888-1970) एक भारतीय भौतिक विज्ञानी थे, जिन्हें प्रकाश स्पेक्ट्रम की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने पहली बार यह दर्शाया कि अलग-अलग तरंगदैर्ध्य अलग-अलग रंग प्रदान करती हैं।
प्रकाश तरंगों के रूप में 299,972 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से यात्रा करता है। दिन और रात का बदलना (सर्केडियन चक्र) पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने के कारण होता है। दूसरे शब्दों में, सूर्य ही हम सभी को नियंत्रित करता है। हमारी आधुनिक जीवन-शैली हमारी प्राकृतिक घड़ियों से पूरी तरह मेल नहीं खाती, और इसी कारण आज हम इतनी अधिक बीमारियों का सामना कर रहे हैं। वास्तव में, अपनी जैविक घड़ियों की लय को बिगाड़कर हम अपने शरीर के भीतर ही अव्यवस्था और भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं।
रोशनी कैंसर बनने में मदद करती है
जैविक गतिविधियाँ रोज़ाना के रोशनी-अंधेरे के चक्र (सर्केडियन रिदम) से नियंत्रित होती हैं, जिसके दो अलग-अलग परिणाम होते हैं। रात में अंधेरे में सोने के बजाय, अगर हम रात में रोशनी के संपर्क में आते हैं, तो सर्केडियन रिदम में रुकावट के कारण हम पर बुरा असर पड़ेगा। रोशनी का प्रदूषण इंसानों द्वारा पैदा की गई ज़्यादा या परेशान करने वाली रोशनी है और यह औद्योगिक सभ्यता का एक दुष्प्रभाव है। रात की शिफ्ट में काम करने वालों में यह बात अच्छी तरह से दर्ज की गई है। नर्सों, रेडियो-टेलीफ़ोन ऑपरेटरों, फ़्लाइट अटेंडेंट और उन कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं में कैंसर का खतरा बढ़ने की रिपोर्ट मिली है, जहाँ 60% कर्मचारी रात में काम करते हैं। कई अध्ययनों से स्कैंडिनेवियाई देशों में रात की शिफ्ट में काम करने और BC (स्तन कैंसर) की घटनाओं में बढ़ोतरी के बीच एक साफ़ संबंध सामने आया है। ये अध्ययन हमारा ध्यान “रात की रोशनी” (LAN) की ओर खींचते हैं, जिसे एक संभावित “कार्सिनोजेन” (कैंसर पैदा करने वाला तत्व) माना जा रहा है। इसका संबंध रोशनी के प्रति संवेदनशील मेलाटोनिन (जो कैंसर-रोधी है) के कम स्राव और BC के बढ़ने से जोड़ा गया है। मेलाटोनिन, जिसे “अंधेरे का हार्मोन” भी कहा जाता है, को कैंसर-रोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों वाला भी माना गया है। रात में कृत्रिम रोशनी के कारण प्राकृतिक मेलाटोनिन और एस्ट्रोजन के संतुलन में गड़बड़ी को, बिजली की रोशनी के संपर्क में आने वाली महिलाओं में हार्मोन-नियंत्रित BC के बढ़ने से जोड़ा जा सकता है।
एक और महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने यह दिखाया था कि जब प्रकाश कुछ खास पदार्थों पर पड़ता है, तो वे पदार्थ इलेक्ट्रॉन छोड़ते हैं, और नीली रोशनी ऐसा सबसे ज़्यादा करती है। माना जाता है कि दिन के समय नीली रोशनी फायदेमंद होती है, क्योंकि यह ध्यान, प्रतिक्रिया समय और मूड को बेहतर बनाती है। हालाँकि, ये रोशनी दिन के समय के लिए बहुत अच्छी होती हैं, क्योंकि ये हमें जगाए रखती हैं; लेकिन रात के समय ये नुकसानदायक होती हैं, क्योंकि ये अक्सर नींद में रुकावट डालती हैं और हमारी कोशिकाओं में मौजूद DNA को भी नुकसान पहुँचाती हैं। अब, मोबाइल फ़ोन, टीवी, लैपटॉप वगैरह जैसे नीली रोशनी छोड़ने वाले उपकरण, दुनिया भर में स्तन कैंसर और हार्मोन से जुड़े अन्य कैंसर के बढ़ते मामलों के लिए ज़िम्मेदार माने जा रहे हैं।
न केवल रात के समय रोशनी के संपर्क में आना, बल्कि दिन के समय भी सूरज की UV-A किरणें मुख्य रूप से कैंसर के विकास के लिए ज़िम्मेदार होती हैं; इसके अलावा, उच्च-ऊर्जा वाली दृश्य (HEVIS) रोशनी भी ऑक्सीडेटिव तनाव पैदा कर सकती है, जिससे कोशिकाओं का DNA क्षतिग्रस्त हो जाता है। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने हमें केवल सुबह और शाम के समय ही “संध्या” करने की सलाह दी थी। इस समय, सूरज की किरणों में UV-A और HEVIS, दोनों ही न्यूनतम मात्रा में होते हैं।
रोशनी से कैंसर का मुकाबला
फोटोडायनामिक थेरेपी में एक ऐसी दवा का इस्तेमाल किया जाता है जो रोशनी से एक्टिवेट होकर कैंसर और दूसरी असामान्य कोशिकाओं को मारती है। इस इलाज में, एक फोटोसेंसिटाइज़र को एक इम्यून प्रोटीन के साथ मिलाया जाता है, जो उस फोटोसेंसिटाइज़र को कैंसर कोशिकाओं तक पहुँचाता है। जब रोशनी डाली जाती है, तो फोटोसेंसिटाइज़र कैंसर कोशिकाओं को मार देता है। इस प्रक्रिया से ट्यूमर के अंदर एक इम्यून रिस्पॉन्स भी पैदा होता है, जिससे और भी ज़्यादा कैंसर कोशिकाएँ मर सकती हैं। जब नियर-इन्फ्रारेड रोशनी डाली जाती है, तो कोशिकाएँ फूल जाती हैं और फिर फट जाती हैं, जिससे कैंसर कोशिका मर जाती है। फोटोइम्यूनोथेरेपी का उन मरीज़ों पर क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है जिनके ट्यूमर का ऑपरेशन नहीं किया जा सकता। इस स्टडी में कैंसर के इलाज में 86.2% की ऊँची रिस्पॉन्स रेट देखने को मिली (जिसमें 55.2% पूरी तरह से ठीक होना यानी CR और 31.0% आंशिक रूप से ठीक होना शामिल है)।
हैड्रॉन बीम से कैंसर का इलाज (हैड्रॉनथेरेपी, रेडियोथेरेपी का ही एक रूप है जिसका इस्तेमाल उन ट्यूमर के इलाज और उन्हें ठीक करने के लिए किया जाता है, जिनका ऑपरेशन अक्सर संभव नहीं होता या जो पारंपरिक रेडियोथेरेपी से ठीक नहीं होते) — एक ऐसी विधि जिसमें CERN ने लगभग तीस साल पहले, रेडियोथेरेपी के प्रति प्रतिरोधी ट्यूमर के लिए ‘कार्बन आयन थेरेपी’ को चिकित्सा जगत में लाकर अपना योगदान दिया था — ने अब तक 3,00,000 से भी ज़्यादा मरीज़ों का इलाज किया है।
(आर्टिकल का अनुवाद करने में अनुवादक फातिमा जौहर ने साधारण बोलचाल भाषा का प्रयोग कर सरल भाषा में लिखा है, फिर भी थोड़ा बहुत कम ज्यादा लगे तो पाठकगण कृपया अपनी राय से अवगत कराये mail : officedaylife@gmail.com) लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं।