राष्ट्रवाद : हिंसा नहीं, राष्ट्र निर्माण का संकल्प – डा. संजय राणा

लेखक : डा. संजय राणा
लेखक ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता, एस्रो के निदेशक एवं पर्यावरणविद हैं।
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आज के समय में “राष्ट्रवाद” शब्द जितना चर्चित है, उतना ही उसके अर्थ को लेकर भ्रम भी दिखाई देता है। दुर्भाग्य से कुछ लोग राष्ट्रवाद को केवल नारे लगाने, विरोधियों को अपमानित करने, वैचारिक असहमति रखने वालों को शत्रु मानने या उनसे आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित करने तक ही सीमित कर देते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि राष्ट्रवाद का मूल स्वरूप निर्माण, सहयोग, अनुशासन और उत्तरदायित्व का है, न कि हिंसा, अराजकता और वैमनस्य का।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम इस सत्य का सबसे बड़ा प्रमाण है। आज़ादी की लड़ाई में विचारों की विविधता थी। एक ओर महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसा, सत्य और जनजागरण का मार्ग था, तो दूसरी ओर भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारी युवाओं का दल था। किंतु दोनों धाराओं का अंतिम लक्ष्य राष्ट्र का कल्याण और स्वतंत्रता था। क्रांतिकारियों ने भी हिंसा को कभी सामान्य राजनीतिक साधन नहीं माना। उनका संघर्ष उस औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध था जो स्वयं हिंसा, दमन और अन्याय पर आधारित थी।
शहीद भगत सिंह द्वारा केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने की घटना इसका उदाहरण है। उनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था, बल्कि बहरी सत्ता को अपनी आवाज़ सुनाना था। उन्होंने स्वयं कहा था कि “बहरों को सुनाने के लिए धमाके की आवश्यकता होती है।” इसलिए आज के लोकतांत्रिक भारत में वैचारिक मतभेद के कारण हिंसा का सहारा लेना न तो भगत सिंह के विचारों का सम्मान है और न ही राष्ट्रवाद की भावना का।
भारत आज एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और संवैधानिक राष्ट्र है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति व्यक्त करने और अपने विचार रखने का अधिकार देता है। लोकतंत्र में विचारों का टकराव स्वाभाविक है, किंतु इसका समाधान संवाद, तर्क और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में है, न कि धमकी, हिंसा और कानून को हाथ में लेने में। जो व्यक्ति अपने विचारों को मनवाने के लिए बल प्रयोग करता है, वह वास्तव में राष्ट्रवाद नहीं बल्कि असहिष्णुता का परिचय देता है।
सच्चा राष्ट्रवाद राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी का नाम है। राष्ट्र केवल सीमाओं, झंडों और नारों से नहीं बनता; वह उन करोड़ों लोगों के परिश्रम, त्याग और जिम्मेदारी से बनता है जो अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी से योगदान देते हैं। किसान खेत में अन्न उगाकर राष्ट्र का निर्माण करता है। वैज्ञानिक शोध और नवाचार के माध्यम से राष्ट्र को आगे बढ़ाता है। सैनिक सीमा पर सुरक्षा प्रदान करता है। शिक्षक नई पीढ़ी को संस्कारित करता है। पर्यावरण कार्यकर्ता प्रकृति और संसाधनों की रक्षा करता है। चिकित्सक, इंजीनियर, मजदूर, सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी—सभी अपने-अपने तरीके से राष्ट्र निर्माण के सहभागी हैं।
राष्ट्रवाद यह भी सिखाता है कि व्यक्ति अपनी आजीविका कमाए, सम्मानपूर्वक जीवन जीए, किंतु धन और भौतिक सुखों की अंधी दौड़ में नैतिकता का त्याग न करे। रिश्वत, भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग, कर चोरी और अनैतिक संपत्ति अर्जन राष्ट्रवाद नहीं हो सकते। जो व्यक्ति अपने निजी लाभ के लिए सार्वजनिक हित को नुकसान पहुंचाता है, वह चाहे जितने भी राष्ट्रवादी नारे लगा ले, उसके कर्म और ऐसे आचरण राष्ट्रहित के विरुद्ध ही माने जाएंगे।
सच्चे राष्ट्रवादी की एक और पहचान है—वह दूसरों के विचारों का सम्मान करता है। वह अपने आचरण, तर्क और सेवा के माध्यम से लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करता है, लेकिन किसी पर अपने विचार थोपता नहीं। और चला ही उनको मानने हेतु विभिन्न प्रकार के हथकण्डों का प्रयोग करता है। उसे यह अहंकार नहीं होता कि केवल वही सत्य का स्वामी है और न ही होना भी चाहिए। लोकतंत्र में विविध विचार ही समाज को जीवंत और प्रगतिशील बनाते हैं। असहमति को देशद्रोह मान लेना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा राष्ट्रवाद को केवल भावनात्मक आवेग या राजनीतिक पहचान के रूप में न देखें, बल्कि उसे सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में समझें। राष्ट्रवाद का अर्थ है—कानून का सम्मान, सामाजिक सद्भाव बनाए रखना, पर्यावरण की रक्षा करना, सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना, कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील होना और अगली पीढ़ी के लिए बेहतर भारत का निर्माण करना। यदि हमारे कर्मों और आचरण से समाज में तनाव, हिंसा और अव्यवस्था पैदा होती है, तो वह राष्ट्रवाद नहीं बल्कि एक बल राष्ट्र के मार्ग में बाधा है।
युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति और संपत्ति होते हैं। उनकी ऊर्जा, प्रतिभा और उत्साह यदि सकारात्मक दिशा में लगे तो देश विकास की नई ऊंचाइयों को छू सकता है। लेकिन यदि वही ऊर्जा भटकाव, कट्टरता, हिंसा और तात्कालिक प्रसिद्धि की लालसा में खर्च होने लगे, तो समाज और राष्ट्र दोनों को नुकसान होता है। सोशल मीडिया के दौर में कुछ लोग विवादित हरकतों, भ्रम, नकारात्मक विचारों, अनर्गल तथ्यों और उत्तेजक बयानों के माध्यम से लोकप्रियता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, जबकि ऐसा आचरण करके वह राष्ट्र की प्रगति में बाधा ही उत्पन्न करते हैं। किंतु सत्य यह है कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रचार से नहीं, बल्कि परिश्रम और चरित्र निर्माण से होकर गुजरता है।
आज आवश्यकता ऐसे राष्ट्रवाद की है जो जोड़ने का काम करे, तोड़ने का नहीं; जो निर्माण करे, ध्वंस नहीं,विनाश नहीं; जो संवाद को बढ़ावा दे, संघर्ष को नहीं; जो संविधान, कानून और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था रखे। राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ है—अपने राष्ट्र, समाज और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी का निर्वहन।
अंततः, राष्ट्रवाद कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन का एक अनुशासित और नैतिक दृष्टिकोण है। राष्ट्रवादी वह नहीं जो सबसे ऊंची आवाज़ में नारा लगाए, बल्कि वह है जो अपने कर्मों से राष्ट्र को मजबूत बनाए। राष्ट्रवाद का सार यही है कि हमारी प्रत्येक सांस, प्रत्येक प्रयास और प्रत्येक उपलब्धि राष्ट्र के विकास, समाज की प्रगति और मानवता के कल्याण के लिए समर्पित हो। राष्ट्रवादी वह है जो राष्ट्र के लिए निर्माण करता है, न कि व्यवधान उत्पन्न करता है। यही राष्ट्रवाद की वास्तविक और स्थायी परिभाषा है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)

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