कर्नाटक में क्रॉस वोटिंग को लेकर सियासी बवाल

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं
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कर्नाटक में हाल ही में हुए विधान परिषद् की सात सीटों के लिए हुए चुनावों में कम से कम विधानसभा के 11 सदस्यों ने अपनी पार्टी के उम्मीद्वार को वोट नहीं दिया। इस क्रॉस वोटिंग को लेकर राज्य की राजनीति में बवाल मचा हुआ है। राज्य में अभी कांग्रेस की सरकार है तथा कुछ समय पहले कांग्रेस पार्टी आला कमान ने सिद्धारामिया को हटा कर डी.के. शिवकुमार को सरकार की बागडोर दी थी। विधान परिषद् के ये चुनाव उनके लिए पहली चुनौती थी। अपनी संख्या के बल पर कांग्रेस 7 में से 4 सीटें जीत सकती थी। इसको लेकर शिवकुमार ने बड़ा खेल किया। शिवकुमार राज्य की राजनीति में एक तेज तर्रार नेता माने जाते है। राज्य पार्टी में तो उनका वर्चस्व तो है ही विपक्ष में उनके मित्रों की कम नहीं। उन्होंने इसी का लाभ उठाते पूरे वोट नहीं होने के बावजूद अपना पांचवां उम्मीदवार उतारा। मतदान से पूर्व ही उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया कि पार्टी के पास इस पांचवें उम्मीदवार के जीत के लिए पूरे मत तो नहीं है फिर भी वे उसे जीता ही लेंगे . यानि विधानसभा में एन डी.ए , जिसमें बीजेपी तथा जनता दल (स) शामिल है, के तीसरे उम्मीदवार को हरा देंगे।
224 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में कांग्रेस के पास 135 उम्मीदवार है . जब कि एन डी. ए . के पास कुल 81 सदस्य में जिनमें बीजेपी के 63 तथा जनता दल (स) के पास 18 सदस्य हैं। इस संख्या बल के हिसाब से सत्तारूढ़ कांग्रेस को 4 तथा विपक्ष को 2 सीटें मिल सकती थी . इसके बावजूद कांग्रेस ने 5 उम्मीदवार मैदान मेंउतारे। बीजेपी ने दो स्थानों के उम्मीदवार तय किये। एक सीट पर जनता दल(स) का उम्मीदवार मैदान में था . विपक्ष के नेताओं को लगता था कि वे कांग्रेस के कुछ विधायकों को तोड़ कर अपने तीसरे उम्मीदवार को भी जितवा लेंगे . लेकिन हुआ इसके विपरीत. विपक्ष के कम से कम 11 सदस्यों ने कांग्रेस के पांचवें उम्मीदवार को वोट दिया जिससे उसकी जीत सुनिश्चित हो गई। सियासी हलकों में यह माना जा रहा है कि बीजेपी के कम से 6 तथा जनता दल(स) के 5 सदस्यों ने अपने उम्मीदवार को वोट नहीं देकर कांग्रेस के पांचवें उम्मीदवार को वोट दिया . इस सारे घटनाक्रम को लेकर यह कहा जा रहा है कि यह पार्टी की उम्मीदवार की नहीं बल्कि शिवकुमार की जीत थी. उन्होंने बहुत पहले ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को आश्वस्त कर दिया था कि पार्टी इन चुनावों में अपने सभी पांच उम्मीदवारों को जिताने में सफल होगी। क्योंकि इन चुनावों में मतदान गुप्त होता है इसलिए यह पता लगाना काफी कठिन है कि किस सदस्य ने क्रॉस वोटिंग की।
उसके बाद राज्य की राजनीति में भूचाल सा आ गया। बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व पार्टी के अध्यक्ष विजयेन्द्र से नाराजी जताई। अपनी ओर से उन्होंने एक जाँच कमिटी बनाई जो निर्धारित समय में इस बात को पता लगाएगी कि किन सदस्यों ने क्रॉस वोटिंग की है ताकि उनके किलाफ़ कारवाई की जा सके . विजयेन्द्र, जो राज्य के 4 बार मुख्यमत्री रहे येदियुरिप्पा के पुत्र हैं, बहुत धार्मिक विचारों के हैं है। अक्सर तीर्थों और मठों में जाते है। राज्य का एक बड़ा तीर्थ स्थान धर्मस्थल है वे वहां नियमित रूप से जाते है। उन्होंने अपनी तरफ से यह निर्णय किया कि वे पार्टी को सभी 63 विधायकों को धर्मस्थल ले जायेंगे जहाँ उन्हें भगवान को साक्षी मान कर यह कहना होगा कि उन्होंने पार्टी के साथ दगा नहीं की और गठबन्धन के उम्मीदवार को ही वोट दिया था। बाद में पार्टी के केंद्रीय नेताओं के निदेश पर इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया। पार्टी के केंद्रीय नेताओं का कहना था यह एक राजनीतिक घटना है तथा इसको राजनीति के नजरिये से ही देखा जाना चाहिए।
राज्य के सियासी हलकों में यह चर्चा है कि विजयेन्द्र मुख्यमंत्री शिवकुमार के बहुत निकट के नेताओं में से एक है। दोनों के कुछ व्यवसायिक उपक्रम आपस में जुड़े हुए हैं। यह आरोप भी सामने आया कि इस मित्रता के चलते ही उन्होंने शिवकुमार की सहायता की। वे केवल बीजेपी के दोनों उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करना चाहते थे। उनकी इस बात में कोई रूचि नहीं थी कि जनता दल (स) का उम्मीदवार जीतता है या नहीं। जनता दल (स) के नेता तथा केंद्रीय मंत्री एच डी. कुमारस्वामी ने इसको लेकर कोई राजनीतिक टिप्पणी नहीं की है। लेकिन उनकी पार्टी के के कुछ नेताओं, जिसमें कुछ विधायक भी शामिल है, का कहना है कि विजयेन्द्र सहित बीजेपी के किसी नेता ने उनके उम्मीदवार को जितवाने के लिए कोई काम नहीं किया। (लेखक के अपने विचार हैं)

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