
लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।
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वर्तमान समय में देश में ऊर्जा संकट हो रहा है और जब तक ईरान अमेरिका युद्ध के रोकने का कोई ठोस हल नहीं निकलता है तब तक संकट बना रहेगा। हमारे माननीय मोदी जी एप्पस्टीन फाइल के कारण अमेरिका से डरते हैं और उसके कहने से अगर मोदी युद्ध के ठीक एक दिन पहले इजरायल नहीं जाते तो आज देश को ये सब नहीं झेलना पड़ता क्योंकि ईरान से भारत के बहुत अच्छे संबंध थे।
लेकिन इस संकट का भी हल निकाला जा सकता है। सनातन धर्म में गौ माता के प्रति समर्पित व सम्मान के भाव होते हैं। सड़क पर, घनी आबादी वाले क्षेत्र में, रोजमर्रा के सामान के बाजार में, नेशनल हाईवे पर, गांवों में जाने वाले कच्चे रास्ते पर हर जगह गायों का समूह देखा जा सकता है। इन गायों को बचाने के लिए कितनी ही बार सड़क पर, बाजार में दुर्घटना भी हो जाती है। सरकार हर शहर, गांव में आबादी के अनूरूप गौशाला बनवा दे वहां पर देखभाल के लिए कर्मचारी नियुक्त कर दे ताकि उनकी देखभाल हो सकें।अब मुख्य बात यह है कि भारतीय संस्कृति में गाय के गोबर को भी शुभ माना जाता है और पुराने समय में महिलाए इसी गोबर के कंडे थाप कर सुखाकर जला कर उस पर खाना बनाती थीं।
तो सरकारी गौशाला में भी वहां का गोबर एकत्र करके अगर देखभाल करने वाले इस गोबर के कंडे थाप दे। और उसकी बिक्री शुरू कर दें तो सबसे बड़ा लाभ तो यह होगा कि जो पैसा सरकार गौशाला पर ख़र्च करती है उसमें भी काम आ जाएगा। सरकार पर अतिरिक्त आर्थिक भार भी कम होगा। गांवों में आज भी कई घरों में चूल्हा जलाया जाता है और खाना उसी पर बनता है। विशेष कर राजस्थान में तो इन कंडों की खपत ज्यादा होती है क्योंकि राजस्थान में घरों में और शादी ब्याह में एक समय तो दाल बाटी चूरमा बनता ही है एवं बांटी तो गोबर के कंड़े पर ही सेंकते हैं। शहरों में भी कुछ घरों में तो बाटी इन कंडों पर ही आज भी बनाते हैं। इससे सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि गाये सार्वजनिक स्थानों पर नहीं होगी तो किसी को नुकसान नहीं होगा और हमारे देश के ऊर्जा संकट में भी सहायक होगी। (लेखिका के अपने विचार हैं)