वन नेशन वन एजुकेशन

लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।
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सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता माननीय अश्वनी जी उपाध्याय का कहना है कि देश में शिक्षा व्यवस्था एक जैसी होनी चाहिए एक से लेकर 12वीं तक कक्षा की किताबें कोर्स एक जैसा होना चाहिए। मेरा निजी विचार है कि परीक्षा भी पूरे देश में एक साथ हो। तय समय पर निर्धारित होनी चाहिए। हर साल कोर्स ना बदल जाए इससे आर्थिक नुकसान भी होता है और जो किताबें पहले की पड़ी हुई होती है वह भी बेकार हो जाती है और फिर कागजों की नई किताबों के लिए जरूरत पूरी करने के लिए जंगल के पेड़ों को काटा जाता है।
सन उन्नीस सौ नब्बे से लेकर सन दो हज़ार दस तक बाहरवी में बोर्ड ‌और प्रतियोगी परीक्षाओं का सिलेबस एक ही होता था टीचर क्लास में ही एनसीईआरटी करवा देते ‌थे। उन्ही में से 90% ‌सवाल प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते थे अलग से कोचिंग नहीं करनी पड़ती थी। लेकिन 1910 के बाद सिलेबस अलग हो गया स्पीड व प्रैक्टिस का गेम बन गया। उसके बाद कोचिंग का व्यवसाय बढ़ गया।
मुख्य बात यह है कि हर साल नई शिक्षा कमेटी नहीं बननी चाहिए और हर साल कोर्स में बदलाव नहीं करना चाहिए इससे जो सीनियर बच्चे थे उनकी किताबों से जूनियर क्लास के बच्चे पढ़ सकते हैं और उनका उपयोग हो सके और गरीब बच्चों को भी मदद मिल सकती है और हमारे जंगल के पेड़ भी बचाए जा सकते हैं जो पर्यावरण के लिए अति आवश्यक है।
हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी लचीली है आए दिन पेपर लीक हो जाते हैं। और लाखों विद्यार्थियों का भविष्य बरबाद हो जाता है। अवसाद में आकर आत्म हत्या कर लेते हैं। शिक्षा व्यवस्था का ढांचा इतना मजबूत बनाया जाए कि पेपर बनाने से लेकर छापने तक सुदृढ़ व्यवस्था और उसके बाद उन पेपर्स की सिक्योरिटी की व्यवस्था ऐसी हो कि किसी भी तरह लीक नहीं होने की संभावना ही नहीं रहे और इन सबके बावजूद भी अगर लीक हो जाता है तो ऐसे कठोर कानून बनाया जाए कि पेपर लीक करने की किसी कि हिम्मत नहीं हो सके।
सरकार द्वारा स्किल इंडिया योजना के तहत युवकों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे प्रशिक्षित होकर वह अपने रोजगार को शुरू कर अपना गुजारा चला सके। लेकिन हर योजना की तरह इस पर भी ध्यान नहीं दिया जा सका है। (लेखिका के अपने विचार है)

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