बंगलुरु पास नये टाउनशिप को लेकर सियासी लड़ाई

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु महानगर की बाहरी सीमा पर एक नए टाउनशिप बनाये जाने के प्रस्ताव को लेकर सतारूढ़ दल कांग्रेस तथा विपक्ष बीजेपी -जनता दल (स) के बीच एक ऐसी राजनीतिक लड़ाई चल रही है जिसका असर निकट भविष्य में बंगलुरु महानगरपालिका में होने वाले चुनावों पर तो जब पड़ेगा इसका असर 2028 के विधान सभा चुनावों पर भी पड़ सकता है .
इस इस सियासी लड़ाई में एक तरफ राज्य के मुख्यमंत्री डी. के. शिव कुमार है तथा दूसरी ओर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एच . डी. कुमारस्वामी है . वे बीजेपी के सहयोगी दल जनता (स) के नेता है तथा वर्तमान में केंद्र में मन्त्री है . दोनों ही नेता राज्य के प्रभावशाली समुदाय वोक्कालिंगा से आते है तथा दोनों का इस समुदाय पर अच्छा खासा प्रभाव है . बीजेपी इस मुद्दे को ले खुलकर कुमारस्वामी का साथ दे रही है . कुछ समय पूर्व राज्य सरकार ने घोषणा की थी कि महानगर की बढती आबादी को देखते हुए एक नया उप नगर बनाये जाने की बड़ी जरूरत है . इसके अनुसार राजधानी के दक्षिणी हिस्से के आगे के इलाके में यह नया उपनगर बनाये जाने का प्रस्ताव है. इसके लिए 25गावों की लगभ9600 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जायेगा . कुमारस्वामी का कहना है कि जिस इलाके का अधिग्रहण प्रस्तावित है वह बहुत उपजाऊ है इसलिए नए उप नगर के प्रस्ताव को वापिस लेना चाहिए . लेकिन डी.के. शिवकुमार का कहना है कि यह प्रस्ताव मूलतः2006 में सामने आया था जब कुमारस्वामी राज्य के मुख्यमंत्री थे . उनकी सरकार ने केवल उस पुराने प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है.
रियासत काल में मैसूर , जो अब मैसूरू कहा जाता है, की सीमा तब बंगलुरु तक थी . इस इलाके को अभी भी मैसूर ओल्ड रीजन के नाम से जाना जाता है . यह एक वोक्कालिंगा बहुल इलाका है .वोक्कालिंगा मुख्य रूप से राज्य का किसान समुदाय है . देश के पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (स) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एच डी देवेगौडा इसी समुदाय तथा इसी इलाके से आते है . एच . डी कुमारस्वामी उनके पुत्र है तथा पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष है . वे दो बार राज्य के मुख्यमत्री रहे चुके हैं . यह समुदाय राजनीतिक नजरिया से मोटे तौर विपक्ष के साथ रहा है . कांग्रेस कभी भी इस इलाके में अपने पैर नहीं जमा पाई . इस इलाके में 57 विधान सभा तथा 11 लोकसभा सीटें है . ऐसा माना जाता है कि जिस दल को इस इलाके में बढ़त मिलती है सरकार उसी की बनती है . 2023 के विधानसभा चुनावों में पहली बार इस इलाके में कांग्रेस को बढ़त मिली थी . इसका श्रेय शिवकुमार को दिया गया था. शिवकुमार और देवगौड़ा परिवार में वर्चस्व की लड़ाई पिछले चार दशक से चली आ रही है। इस समय शिवकुमार समुदाय में लोकप्रियता देवेगौडा परिवार से अधिक है। जब कुमारस्वामी राज्य की मुख्यमंत्री थे तो उस समय दक्षिण बंगलुरु के एक हिस्से को काटकर एक नया जिला बनाया रामनगर गया था। नया जिला देवगौड़ा के प्रभाव वाला एक बड़ा इलाका था। लेकिन वर्तमान कांग्रेस सरकार ने, जिसमें कुछ समय पहले तक शिवकुमार उप मुख्यमंत्री थे, ने इस जिले को समाप्त कर इस सारे इलाके को फिर दक्षिण बंगलुरु में शामिल कर दिया। उस समय शिव कुमार मंत्री के रूप में बंगलुरु के प्रभारी थे।
इस उपनगर को लेकर दलों से अधिक लड़ाई कुमारस्वामी तथा शिवकुमार के बीच है। शिव कुमार के बड़े भाई सुरेश शिवकुमार दक्षिण बंगलुरु लोकसभा सीट जीतते रहे है लेकिन पिछले लोकसभा चुनावो वे यह सीट हार गए थे। उनकी जगह देवेगौडा परिवार एक दामाद ने यह सीट जीती थी।
नए उप नगर के प्रस्ताव की घोषणा के तुरंत बाद जनता दल (स) ने इस इलाके में आन्दोलन की घोषणा कर दी. इस आन्दोलन को किसानो का भारी समर्थन मिला। बाद में बीजेपी भी इस आन्दोलन में शामिल हो गई। जब आन्दोलन ने बड़ा रूप ले लिया तब शिव कुमार ने घोषणा की कि इस प्रस्ताव पर फिर से विचार किया जायेगा। नया प्रस्ताव कब समाने आयेगा आएगा इस बारे में कुछ नहीं कहा गया।
लगभग दो साल पहले जब बंगलुरु में दूसरे हवाई अड्डे के निर्माण का प्रस्ताव समाने आया था और तथा इसके लिए जमीन के तलाश शुरू हुई थी तब यह कहा गया कि बंगलुरु दक्षिण ही इसके लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। इसके चलते इस इलाके में जमीनों के दाम तेजी से बढ़ने लगे। राज्य के कई बड़े नेताओं के निजी आवास कनकपुरा में है जो दक्षिण बेंगलुरु का हिस्सा है।
ऐसा मना जाता है कि जितना अधिक विरोध यहाँ जमीनों के मालिक किसान कर रहे है उसको देखते हुए यह कठिन है कि राजधानी का यह उपनगर कब बनेगा।
निकट भविष्य में विधान सभा के होने वाले स्तर में यह मुद्दा उठाया जाना निश्चित है। उधर इस इलाके के किसान संगठन स्तर की अवधि के बेंगलुरु में बड़ा प्रदर्शन करने की तैयारी कर रहे हैं। (लेखक के अपने विचार हैं।)

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