
नई रिपोर्ट ने बदली बहस की दिशा
निशांत की रिपोर्ट
लखनऊ (यूपी) से
www.daylifenews.in
यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लेकर भारत में पिछले कुछ वर्षों से लगातार चिंता जताई जाती रही है। सरकार से लेकर उद्योग जगत तक, यह आशंका रही कि यूरोप का यह नया कार्बन टैक्स भारतीय इस्पात उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को कमजोर कर देगा और निर्यात महंगा हो जाएगा।
लेकिन अब एक नई रिपोर्ट इस पूरी बहस में एक अलग तस्वीर पेश करती है।
जलवायु और औद्योगिक नीति पर काम करने वाले थिंक टैंक Sandbag की ताजा रिपोर्ट का कहना है कि CBAM का असर भारत के इस्पात उद्योग पर उतना गंभीर नहीं हो सकता, जितना अब तक माना जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक यदि भारतीय कंपनियां अपनी मौजूदा कम-उत्सर्जन उत्पादन क्षमता का रणनीतिक इस्तेमाल करें, तो CBAM का आर्थिक बोझ काफी कम हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में तो भारतीय निर्यातकों को इससे आर्थिक लाभ भी मिल सकता है।
आखिर क्या है CBAM?
CBAM यानी Carbon Border Adjustment Mechanism यूरोपीय संघ की वह व्यवस्था है, जिसके तहत इस्पात, सीमेंट और कुछ अन्य उत्पादों का यूरोप में आयात उनके उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर शुल्क देकर किया जाएगा।
यूरोप का तर्क है कि उसकी अपनी कंपनियां पहले से EU Emissions Trading System (ETS) के तहत कार्बन उत्सर्जन की कीमत चुका रही हैं। ऐसे में यदि बाहर से आने वाले उत्पादों पर ऐसा कोई खर्च न हो, तो यूरोपीय उद्योग प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाएंगे। इसी असमानता को दूर करने के लिए CBAM लागू किया गया है।
भारत इस नीति का लगातार विरोध करता रहा है। भारत का कहना है कि यह व्यवस्था विकासशील देशों के साथ भेदभाव करती है, संरक्षणवाद को बढ़ावा देती है और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सिद्धांतों तथा पेरिस समझौते की भावना के अनुरूप नहीं है।
नई रिपोर्ट ने क्या पाया?
Sandbag ने एक इंटरैक्टिव CBAM सिम्युलेटर तैयार किया है, जो अलग-अलग देशों और उद्योगों पर इस नीति के संभावित आर्थिक प्रभाव का आकलन करता है।
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि वास्तविक दुनिया में कंपनियां स्थिर नहीं रहतीं। वे नई नीतियों के अनुसार अपनी रणनीति बदलती हैं। यदि भारतीय इस्पात निर्यातक कम-उत्सर्जन वाले उत्पादों को यूरोपीय बाजार के लिए प्राथमिकता दें, तो CBAM का प्रभाव काफी कम हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार सबसे यथार्थवादी परिदृश्य में भारतीय निर्यातकों पर अनुमानित CBAM लागत 762 मिलियन यूरो से घटकर लगभग 79 मिलियन यूरो रह सकती है।
यानी संभावित लागत लगभग दसवें हिस्से तक सिमट सकती है।
क्या भारत को फायदा भी हो सकता है?
रिपोर्ट सिर्फ जोखिम कम होने की बात नहीं करती। वह यह भी कहती है कि यदि भारत आने वाले वर्षों में नई कम-उत्सर्जन इस्पात उत्पादन क्षमता विकसित करता है, तो स्थिति पूरी तरह बदल सकती है।
अपने “महत्वाकांक्षी” परिदृश्य में Sandbag का अनुमान है कि भारतीय इस्पात कंपनियां 44 मिलियन यूरो का शुद्ध लाभ भी कमा सकती हैं। इसकी वजह होगी कि CBAM शुल्क कम रहेगा, जबकि यूरोप में इस्पात की ऊंची कीमतों का फायदा भारतीय निर्यातकों को मिलेगा।
भारत का इस्पात उद्योग एक जैसा नहीं
रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण धारणा को चुनौती देती है। अक्सर भारत के पूरे इस्पात उद्योग को अधिक कार्बन उत्सर्जन वाला माना जाता है, क्योंकि बड़ी संख्या में छोटे संयंत्र कोयले पर आधारित उत्पादन करते हैं।
लेकिन Sandbag का कहना है कि भारत का इस्पात उद्योग काफी विविध है। देश में पहले से कई ऐसे संयंत्र मौजूद हैं, जिनका उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है। यदि इन संयंत्रों के उत्पादन को यूरोपीय बाजार की ओर मोड़ा जाए, तो कंपनियां अपनी CBAM देनदारी को काफी कम कर सकती हैं।
रिपोर्ट में ArcelorMittal NS Hazira संयंत्र का उदाहरण दिया गया है। विश्लेषण के अनुसार यह संयंत्र अपेक्षाकृत कम-कार्बन इस्पात का उत्पादन करने की क्षमता रखता है और आवश्यक परिचालन बदलावों के साथ यूरोप की मांग पूरी करने की बेहतर स्थिति में हो सकता है।
भारत-यूरोप व्यापार संबंधों के लिए इसका क्या मतलब है?
रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच इस साल हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) दोनों पक्षों के रिश्तों को नई दिशा दे रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार इस समझौते में जलवायु से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं। इनमें भारत के एनर्जी ट्रांजिशन को समर्थन देने के लिए दो वर्षों में 500 मिलियन यूरो की सहायता और Climate Action Platform की स्थापना शामिल है। इसी मंच के जरिए CBAM और भारत की प्रस्तावित Carbon Credit Trading Scheme जैसे मुद्दों पर सहयोग और संवाद बढ़ाया जाएगा।
यूरोप भी बदलाव पर विचार कर रहा
रिपोर्ट यह भी बताती है कि यूरोपीय आयोग की हालिया ETS समीक्षा में CBAM के पूर्ण क्रियान्वयन की समयसीमा 2034 से बढ़ाकर 2038 करने का प्रस्ताव रखा गया है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो उद्योगों को नई व्यवस्था के अनुरूप ढलने के लिए अधिक समय मिल सकता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
Sandbag के Adrien Assous का कहना है कि उनके संगठन के मॉडल से संकेत मिलता है कि यूरोप की जलवायु नीतियों को लेकर भारत सहित कई देशों में जो आशंकाएं हैं, वे वास्तविक प्रभाव से कहीं अधिक हैं।
उनके अनुसार भारत के इस्पात उद्योग के पास तकनीकी क्षमता और उत्पादन का पैमाना दोनों मौजूद हैं। यदि कंपनियां सही रणनीति अपनाती हैं, तो वे CBAM के प्रभाव को संभाल सकती हैं। उनका यह भी कहना है कि प्रस्तावित विस्तार के बाद भी भारत को विशेष चिंता की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
भारत के लिए बड़ा संदेश
यह रिपोर्ट CBAM को लेकर चली आ रही बहस का अंत नहीं करती। लेकिन यह जरूर बताती है कि इसे केवल व्यापारिक बाधा के रूप में देखने के बजाय औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के नजरिए से भी समझने की जरूरत है।
यदि भारतीय कंपनियां कम-उत्सर्जन उत्पादन तकनीकों में निवेश बढ़ाती हैं और अपने अपेक्षाकृत स्वच्छ इस्पात उत्पादन को यूरोपीय बाजारों तक पहुंचाने की रणनीति बनाती हैं, तो वही नीति जिसे अब तक खतरे के रूप में देखा जा रहा था, भविष्य में अवसर भी बन सकती है।
यानी आने वाले वर्षों में वैश्विक इस्पात व्यापार सिर्फ लागत के आधार पर नहीं चलेगा। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा कि इस्पात का उत्पादन कितने कम कार्बन उत्सर्जन के साथ किया गया है। और शायद यही CBAM का सबसे बड़ा संदेश भी है। जलवायु नीति अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रही। वह वैश्विक व्यापार, उद्योग और प्रतिस्पर्धा के नियम भी बदल रही है। (लेखक के अपने विचार हैं)