


www.daylifenews.in
जयपुर। भारत में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) पिछले सात दशकों से संविधान सभा की बहसों से लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों तक, चुनावी घोषणापत्रों से लेकर विधानसभाओं तक एक ऐसा विषय रहा है जो बार-बार लौटकर आता है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड ने 2024 में देश के किसी भी राज्य द्वारा लागू की गई पहली संहिता के रूप में अपना UCC लागू किया, और उसके बाद गुजरात, असम, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए। राजस्थान सरकार ने भी राज्य-स्तरीय UCC का मसौदा तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं।
यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति, पहचान, महिला अधिकार, आदिवासी परंपराओं और संघीय ढांचे इन सबसे जुड़ा हुआ है। राजस्थान जैसे राज्य में, जहाँ हिंदू, मुस्लिम, आदिवासी, दलित, सिख, जैन, ईसाई और अन्य समुदाय सदियों से साथ-साथ रहते आए हैं, यह सवाल स्वाभाविक है कि यह प्रस्तावित समान कानून अलग-अलग समुदायों को अलग-अलग तरह से कैसे प्रभावित कर सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को यह प्रयास करने का निर्देश देता है कि वह भारत के समस्त नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करे। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर एक समान नागरिक व्यवस्था की परिकल्पना करना है। ऐसी स्थिति में किसी एक राज्य द्वारा पृथक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास अनुच्छेद 44 की मूल भावना, उसकी एकरूपता की अवधारणा तथा संवैधानिक उद्देश्य के संबंध में गंभीर प्रश्न उत्पन्न करता है।
संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 प्रत्येक नागरिक तथा धार्मिक समुदायों को अपने धर्म का पालन, आचरण तथा धार्मिक मामलों के प्रबंधन का मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं। ये अधिकार भारतीय संविधान की मूल संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग हैं। दूसरी ओर, अनुच्छेद 44 नीति-निर्देशक तत्वों का भाग है। संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति-निर्देशक तत्व शासन के लिए मार्गदर्शक अवश्य हैं, किंतु वे मौलिक अधिकारों को निष्प्रभावी या सीमित करने का आधार नहीं बन सकते। अतः अनुच्छेद 44 की व्याख्या ऐसी नहीं की जा सकती जिससे अनुच्छेद 25 एवं 26 द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो। एव नीति निर्देशक तत्वों का क्रियान्वयन मौलिक अधिकारों की कीमत पर नहीं किया जा सकता।
1980 ई. में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि संविधान का कोई भी भाग दूसरे पर वरीयता हासिल नहीं करता। अगर नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के नाम पर मौलिक अधिकारों का हनन किया जाता है तो यह संविधान की मूल संरचना को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा।
यदि राजस्थान में “समान नागरिक संहिता” लागू की जाती है एंव प्रदेश के विभिन्न समुदायों को अपने धर्म एवं संस्कृति के अलावा किसी अन्य वैधानिक ढाँचे का पालन करने पर बाध्य किया गया तो ऐसी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 21, 25, 26, एवं 29 के अन्तर्गत सुरक्षित मौलिक अधिकारों (समानता, स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता) का हनन होगा एवं गंभीर संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न करने के साथ-साथ प्रदेश के बहु-सांस्कृतिक एवं बहु-धार्मिक स्वरूप को नुक़सान पहुँचाने का कारण अनेगा। हमारा मानना है कि विभिन्न समुदायों के निजी कानूनों की विविधता भारत की बहुलतावादी सामाजिक-संस्कृक्तिक सांचना का स्वभाविक हिस्सा है और इसे धार्मिक स्वतंत्रता तथा संस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा प्राप्त है।
इसलिए हम सब “समान नागरिक संहिता” का विरोध करते हैं और मांग करते हैं कि
- न्याय और समानता के सिद्धांतों के अनुरूप जो देश के प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, यू.सी.सी. को प्रदेश में लागू ना किया जाए।
- संविधान में दी गई धार्मिक स्वतन्त्रता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जाए, एवं ऐसा कोई कार्य नहीं किया जाए जिससे लोगों में अविश्वास और असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो।
- प्रस्तावित क़ानून पर विस्तृत श्वेतपत्र जारी किया जाए, जिसमें उसके संवैधानिक आधार, सामाजिक प्रभावों एवं विकल्पों का स्पष्ट विवरण हो।
- व्यक्तिगत क़ानूनों में सुधार से पूर्व संबंधित समुदायों, महिला संगठनों, विधि-वेत्ताओं, धार्मिक विद्वानों, तथा सिविल सोसाइटी से व्यापक परामर्श किया जाए।
हमारा आव्हान
प्रदेश के सभी सामाजिक, धार्मिक, एवं मानवाधिकार संगठनों का यह साझा मन्च प्रदेश सरकार से यह आव्हान करता है कि प्रदेश में “समान नागरिक संहिता” को लागू ना किया जाए।
हमारा उद्देश्य किसी समुदाय विशेष का नहीं बल्कि संविधान, लोकतन्त्र, धार्मिक स्वतन्त्रता और देश की बहुलतावादी विरासत की हिफ़ाज़त करना है।
हम मीडिया बन्धुओं से भी आग्रह करते हैं कि इस विषय में भरपूर सहयोग करें। संयुक्त जन संगठन मंच, जयपुर राजस्थान द्वारा यह बिंदु मीडिया के सामने बताये गए।