
लेखिका : श्रीमती शमशाद अली
लेखक एवं समाजसेविका, जयपुर
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कहते हैं व्यक्ति का जीवन बहुमूल्य है। लेकिन जब व्यक्ति का जीवन असहज हो जाये, वह जीवन में आये-दिन रोजाना घुट-घुटकर, रो-रोकर जीवन जीये, घर-परिवार में उसे उपेक्षा मिले, परिजनों का व्यवहार असह्य हो जाये, घर में उसके साथ बर्ताव कुत्ते की मानिंद हो, व्यवहार की भाषा अमर्यादित हो जाये, उसके सामने जली-कटी, कच्ची-मोटी रोटी उबली दाल के साथ रख दी जाये, यदि नीबू मांग लिया तो कहा जाये कि इन्हें क्या मालूम कि बाजार में नीबू चालीस रुपये पाव आता है और कहा जाये कि बेटे की मेहनत की कमाई इन बूढ़ों पर उड़ानें के लिए नहीं है। रोज आये-दिन इनकी बीमारी के इलाज के लिए खटते रहो, क्या हमारे आदभी की कमाई इनके ऊपर बर्बाद करने के लिए है। ऐसा सुनने के बाद क्या माता-पिता बेटे-बहू के साथ किस तरह रहते हैं, यह तो वे ही बखूबी जानते-समझते हैं। अब सवाल यह है कि जिसकी बहबूदी के लिए वह ( माता-पिता ) यह सब प्रताड़ना, उपेक्षा और दुर्व्यवहार बर्दाश्त करते रहते हों, उन्हें क्या कहा जाये और उस बेटे-बहू का क्या किया जाये ? यह वर्तमान की हर घर की सच्चाई है, कहीं कुछ अधिक तो कहीं कुछ कम। लेकिन पर्दे के पीछे यह ज्यादातर घरों में संतानों की हकीकत है। अब सवाल यह है कि ऐसी दशा में बूढ़े मां-बाप क्या करें? वे जायें तो कहां जायें। बेटे के अलावा उनका तो कोई है नहीं। उनकी देखभाल कौन करेगा? उस स्थिति में तो उनका कोई भी सहारा नहीं बनेगा जबकि उन्हें तो पेंशन भी नहीं मिलती। इसका जबाव यदि किसी के पास है तो बताये।
इसके अलावा कहीं-कहीं स्थिति यह है कि लाडला बेटा मां-बाप का अकेला सपूत है और उसके क्रिया-कलापों की वजह से वह तो घर से बाहर चला गया या कर्ज में डूब घर से भाग गया या उसके कारनामों के चलते वह शहर में मां-बाप के साथ रह नहीं सकता और अपने शहर से दूर दूसरे शहर में बीबी के साथ रह मौज कर रहा है लेकिन बूढ़े मां-बाप अपने शहर मे अकेले ही असहाय का जीवन बसर करने को मजबूर है। फिर भी वे बेटे की कारगुजारियों पर पर्दा डालते रहते हैं और साहूकार या वे जिनका पैसा लेकर बेटा फरार हो गया , जब पैसा लेने घर पर आ धमकते हैं, तो मां-बाप यह कहकर अपना पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं कि -‘बेटा तो कोरोना में चला गया।’ मां-बाप की इस पीड़ा को कोई क्या कहेगा। हकीकत में उनकी पीड़ा कोई समझ ही नहीं सकता। यह उनकी पीड़ा है या पुत्र मोह। इसे कौन समझेगा? क्या ऐसी बेबसी की दशा में मां-बाप अपने जीवन को ही समाप्त कर लें। इसका निर्णय कौन करेगा ?