क्या जोहड़ बचा पायेंगे – राम भरोस मीणा

लेखक : राम भरोस मीणा
लेखक जाने-माने प्रकृति प्रेमी, हरियाली बाबा के नाम से विख्यात पर्यावरणविद् है।
Email – lpsvikassansthan@gmail.com
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वर्षा जल संचय करने में राजस्थान की जल संस्कृति देश ही नहीं अपितु विश्व में श्रेष्ठ रहीं। वर्षा जल संग्रहण, नदियों का सरंक्षण, पीने के पानी की सामाजिक व्यवस्था, भूगर्भीय जल का कृषि में उपयोग के अपने तोर – तरीके हजारों वर्षों के सामाजिक अनुसंधान, अनुभवों से उभरकर सामने आए। हजारों वर्षों में पनपीं जल संस्कृति को आज की युवा पीढ़ी दो दशक मे भुल चुकी है। जिसे यहां के वासिंदो ने बनाया अपनाया। पानी की संस्कृति को भूलना संस्कारों में गिरावट, संस्कृति में आएं बदलाव इसके जिम्मेदार है। परिणाम यह है कि जल संरक्षण के स्थानीय प्रयासों से बनी व्यवस्थाएं आज केवल अवशेष रह गई। अवशेष रुप में बचीं यह व्यवस्था स्थानीय लोगों की पानी के प्रति जागरूकता, महत्व, उपयोग करने के अपने तरीकों को साझा कर रही हैं। लोक गीत, किवदंती, परमपराएं आज भी संस्कृती, संस्कारों को याद दिलाते हैं। रहिम जी के दोहे ” रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून, पानी गये न उबरें मोती मानुष चुन ” का पालन करना यहां के लोगों के संस्कार बन चुकें थे। गर्मियों में श्रमदान कर चौकड़ी निकालना, साफ-सफाई करना, वर्षा पानी के रास्ते में बने अवरोधों को हटाना आम आदमी का कार्य ही नहीं नित्यकर्म बन चुका था। संस्कार संस्कृति ही नहीं पानी संग्रह एक आदत बनी परम्परा आखिर लुप्त क्यों होते चले गईं।
महज़ तीन दशकों पुर्व राजस्थान में परम्परागत जल प्रबन्धन में अपने अध्ययन अनुभवों को प्रसिद्ध जल यौद्धा स्व.अनुपम मिश्र ने अपनी पुस्तक जोहड़ की संस्कृति, रजत बूंदें, पनघट में राजस्थान में पानी के सुव्यवस्थित उपयोग, रखरखाव, महत्व, प्रबन्धन कों दुनिया के सामने रखा। श्रेष्ठतम जल व्यवस्था मानें। परम्परागत व्यवस्थाओं को जीवित रखने की आवश्यकता समझें। युवा पीढ़ी को संस्कारवान बनानें की सिफ़ारिशें की, आधुनिक विज्ञान के इस दौर में प्रदेश की परम्परागत जल व्यवस्था को श्रेष्ठ बताया। लेकिन महज़ दो दशकों में यहां न केवल जोहड़ ग़ायब हुए, बल्कि संस्कृति और संस्कार भी लुप्त हो गए। राजस्थान के प्रत्येक गांव, ढाणी, कस्बों में 1990 के आस पास लगभग 60 से 70 हज़ार जोहड़ बताएं जातें रहें हैं। खैर जोहड़ से सम्बन्धित कुल आंकड़ों की सही पुष्टी नहीं होती, लेकिन अकेले अलवर जिले सहित आस-पास के क्षेत्र में स्थानीय संगठनों द्वारा 2005 में 8500 जोहड़ की सफाई करने की बात जो की जाती है, उससे यह साबित होता है कि यहां जोहड़ बहुतायत में होंगे। लेकिन आज जोहड़ का लुप्त होना या नहीं होना यहां की संस्कृति पर प्रश्न उठता है, उतना ही स्थानीय संगठनों द्वारा उन्हें बचाने में असफल रहना भी एक चिन्तित करने वाला विषय है।
खैर वर्तमान परिस्थितियों और बदलते मौसम चक्र के साथ बड़ते शहरीकरण, अनैतिक विकास, लोगों की स्वार्थ की भावना ने उन सभी जल संग्रह केन्द्रों को खुर्द-बुर्द करने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। नतीजन आज जोहड़ दिखाई नहीं देते, दिखाई दे वहां पानी नहीं पहुंचता, विकास के नाम, अवैध कालोनियों, रास्तों, निजी हस्तक्षेप से अतिक्रमण की चपेट में आ गए अथवा उन्हें कचरा स्थल बना दिया गया। सत्य यह भी है कि पानी के सभी श्रोत जो पारम्परिक व्यवस्थाओं के तहत् सामाजिक सरोकार के लिए थे आज 92 प्रतिशत मर चुकें हैं। 05 प्रतिशत अनुपयोगी हो गये। 02 प्रतिशत कचरा पात्र बन बैठे। 01 प्रतिशत जोहड़ का जल उपयोग किया जा रहा है। सामाजिक व्यवस्थाओं में एकाएक आए बदलाव, बदलते पानी के उपयोग के तोर तरीकों, बड़ते शहरीकरण, औधोगिकीकरण, बाजारीकरण, निजी स्वार्थ की भावना के साथ युवाओं का जल प्रबंधन जैसे कार्यों से अलग होना, भूगर्भीय जल में तेजी से आईं गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं। पीने के मीठे पानी की जहां नदियां बहती, कुएं वर्षा ऋतु में उफान लेते, जोहड़ हिचकोले खाते, खेतों में दल-दल बनता, पहाड़ों पर झरने झरते वहां का पानी महज़ तीन दशकों में पाताल जाना व्यवस्थाओं पर आरोप सिद्ध करता हैं, उससे अधिक जल के बड़ते बाजारीकरण, औधोगिकीकरण, शहरीकरण को दोषी ठहराना उचित लगता है।
वर्तमान परिस्थितियों में आम व्यक्ति को शुद्ध मीठा पानी नसीब नहीं हो पा रहा। पानी में विभिन्न प्रकार के ज़हरीले पदार्थ पाएं जा रहें हैं, रसायन मिल रहें हैं। मानव शरीर पर लक्षण दिखाई दे रहें हैं, बच्चों में कुपोषण बढ़ रहा है। भूगर्भीय ताप बढने लगा है। परिस्थितियां प्रति कुल होती नज़र आ रही है। वर्तमान विपरीत परिस्थितियों से बचने के लिए हमें वृक्षारोपण, वनों के संरक्षण, वर्षा जल प्रबंधन में सहभागिता निभानें के साथ जल के बढ़ते बाजारीकरण कों रोकना होगा, औधोगिक इकाइयों में मीठे पानी के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। पानी पेड़ पर्यावरण संरक्षण पर कार्य करने के लिए औद्योगिक इकाइयों को मजबूर करना चाहिए। जिससे आम आदमी को मीठा पानी नसीब हो सकें, अन्यथा वह समय दूर नहीं जब लोग पानी को तरसते नज़र आएंगे, क्योंकि एक दशक से जोहड़ पानी को तरस रहे हैं, वहीं भूगर्भ में जल कम पड़ता दिखाई दे रहा है। (लेखक के अपने निजी विचार है।)

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