
एडाप्टेशन फ़ाइनेंस अब भी कम
निशांत की रिपोर्ट
लखनऊ (यूपी) से
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UNEP की नई रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों को 2035 तक हर साल जलवायु अनुकूलन के लिए करीब 305 अरब डॉलर की जरूरत होगी। लेकिन 2024 में विकसित देशों से मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक मदद सिर्फ 28.2 से 31.7 अरब डॉलर रही। COP30 में अनुकूलन वित्त तीन गुना करने की सहमति भी जरूरत का अधिकतम 29 फीसदी ही पूरा कर पाएगी।
दुनिया जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों से निपटने की तैयारी में अब भी पीछे है। तापमान बढ़ रहा है, चरम मौसम की घटनाएं अधिक गंभीर होती जा रही हैं और विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन से होने वाला नुकसान बढ़ रहा है। इसके बावजूद, इन देशों को बदलती जलवायु के अनुकूल बनाने के लिए मिलने वाली आर्थिक मदद जरूरत के मुकाबले बहुत कम है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई Adaptation Gap Report 2026: Ready? Not के मुताबिक, दुनिया के 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की सीमा को पार करने की ओर बढ़ने के बीच जलवायु अनुकूलन के प्रयास पर्याप्त गति से आगे नहीं बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि विकासशील देशों को 2035 तक हर साल करीब 305 अरब डॉलर की जरूरत होगी, जबकि विकसित देशों से मिलने वाला अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त अभी इसका एक छोटा हिस्सा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में विकसित देशों से विकासशील देशों को मिलने वाला अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त 28.2 से 31.7 अरब डॉलर के बीच रहा। पिछले साल की तुलना में इसमें केवल एक अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई। यानी जलवायु जोखिम बढ़ने के बावजूद वित्तीय मदद में वृद्धि की रफ्तार काफी धीमी है।
UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा कि दुनिया मौजूदा जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप ढलने के लिए भी तैयार नहीं है, ऐसे में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वृद्धि के परिणामों के लिए उसकी तैयारी और भी कमजोर है। उन्होंने COP31 और उसके बाद भी अनुकूलन वित्त बढ़ाने के प्रयास तेज करने की जरूरत बताई।
तीन गुना वित्त भी जरूरत का एक-तिहाई पूरा नहीं करेगा
ब्राजील में हुए COP30 सम्मेलन में देशों ने 2035 तक अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त को कम से कम तीन गुना करने की दिशा में प्रयास करने पर सहमति जताई थी। इसे ग्लोबल मुतिराओ निर्णय का हिस्सा बनाया गया।
UNEP की रिपोर्ट के मुताबिक, यह लक्ष्य हासिल होने पर 2035 तक अनुकूलन वित्त सालाना 85 से 120 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। लेकिन महंगाई के असर को शामिल करने के बाद भी यह विकासशील देशों की अनुमानित जरूरत का केवल 20 से 29 फीसदी हिस्सा ही पूरा करेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, विकासशील देशों को 2035 तक हर साल करीब 305 अरब डॉलर की जरूरत होगी। यह अनुमान देशों की राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं यानी NDCs, राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं और मॉडल आधारित आकलन पर तैयार किया गया है। इसमें निजी क्षेत्र की अपनी अनुकूलन जरूरतों को बड़े पैमाने पर शामिल नहीं किया गया है। उन्हें जोड़ने पर कुल जरूरत लगभग दोगुनी हो सकती है।
हालांकि, सबसे कम विकसित देशों (LDCs) और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) के लिए तस्वीर कुछ बेहतर हो सकती है। यदि इन देशों के लिए भी अनुकूलन वित्त तीन गुना किया जाता है, तो उनकी अनुमानित जरूरत का 49 से 83 फीसदी हिस्सा पूरा हो सकता है।
कुछ मोर्चों पर बढ़ रही है मदद
रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक रुझानों का भी जिक्र है। विकासशील देशों के बीच वित्तीय सहयोग बढ़ रहा है। बहुपक्षीय विकास बैंकों और सीधे दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से मिलने वाला वित्त 2019 में 3.8 अरब डॉलर था, जो 2024 में बढ़कर 9.6 अरब डॉलर हो गया।
निजी क्षेत्र से मिलने वाला वित्त भी बढ़ रहा है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, इसका बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों की अपनी अनुकूलन जरूरतों को पूरा करने में इस्तेमाल होता है या इसका भुगतान विकासशील देशों को खुद करना पड़ सकता है। सार्वजनिक हित से जुड़े अनुकूलन उपायों के वित्तीय अंतर को कम करने में निजी वित्त की संभावित भूमिका केवल 15 से 20 फीसदी तक हो सकती है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि बहुपक्षीय विकास बैंक 2025 में अपने अनुकूलन वित्त में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकते हैं। इससे 2019 के स्तर से 2025 तक अनुकूलन वित्त दोगुना कर 40 अरब डॉलर करने के ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट के लक्ष्य को हासिल करने की संभावना बनी हुई है। हालांकि, यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि विकास सहायता में संभावित कटौती का असर द्विपक्षीय वित्तीय सहयोग पर कितना पड़ता है।
सिर्फ पैसा नहीं, नीतियों और संस्थाओं को मजबूत करना भी जरूरी
UNEP की रिपोर्ट का कहना है कि अनुकूलन के लिए वित्त जुटाना जरूरी है, लेकिन पैसा अपने आप जमीन पर बदलाव नहीं लाता। इसके लिए मजबूत संस्थागत व्यवस्था भी चाहिए, ताकि जलवायु जोखिमों से निपटने की योजनाएं वास्तव में लागू हो सकें।
इस दिशा में कई सरकारें जलवायु परिवर्तन से जुड़े फ्रेमवर्क कानून बना रही हैं, अलग-अलग विभागों और सरकारी स्तरों के बीच समन्वय बेहतर कर रही हैं और नीतिगत अनुभव साझा करने के लिए मंच तैयार कर रही हैं। जलवायु वित्त जुटाने और उसके प्रबंधन के लिए विशेष व्यवस्थाएं भी बनाई जा रही हैं।
यानी चुनौती केवल यह नहीं है कि अनुकूलन के लिए कितना पैसा उपलब्ध है। यह भी जरूरी है कि योजनाओं को लागू करने की संस्थागत क्षमता हो, जिम्मेदारियां स्पष्ट हों और वित्त का इस्तेमाल जरूरतमंद समुदायों तक पहुंचने वाले उपायों पर हो।
नुकसान और क्षति का बोझ बढ़ रहा है
रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान और क्षति यानी Loss and Damage पर भी चिंता जताई गई है। कमजोर शमन और अनुकूलन प्रयासों के कारण विकासशील देशों में ऐसे नुकसान बढ़ रहे हैं, जिन्हें केवल अनुकूलन उपायों से रोक पाना संभव नहीं है।
लेकिन इस नुकसान से निपटने के लिए उपलब्ध वित्त भी जरूरत से काफी कम है। रिपोर्ट के मुताबिक, नुकसान और क्षति से निपटने के लिए बने फंड के पहले दौर में देशों की ओर से 2.8 अरब डॉलर की सहायता की मांग आई थी, जबकि शुरुआती वित्तीय आवंटन केवल 342 मिलियन डॉलर था।
यह अंतर बताता है कि प्रभावित देशों की जरूरत और उपलब्ध मदद के बीच बड़ी खाई है। हालांकि, रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि दुनिया भर में नुकसान और क्षति के लिए कुल कितने वित्त की जरूरत है, इसका सटीक अनुमान अभी उपलब्ध नहीं है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस चुनौती से निपटने के लिए नुकसान का बेहतर आकलन करने की क्षमता, भरोसेमंद वित्तीय और तकनीकी मदद, सहायता हासिल करने की सरल प्रक्रियाएं और प्रभावित समुदायों की निर्णय प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी जरूरी है।
जलवायु अनुकूलन का मतलब है बदलती जलवायु के साथ अपने शहरों, खेती, जल संसाधनों, स्वास्थ्य सेवाओं और आजीविका को इस तरह तैयार करना कि गर्मी, बाढ़, सूखा और दूसरी चरम मौसमी घटनाओं से होने वाला नुकसान कम किया जा सके। लेकिन इसके लिए योजनाओं के साथ पर्याप्त और समय पर वित्त भी चाहिए।
UNEP की रिपोर्ट का संदेश साफ है। तापमान वृद्धि को सीमित करने के प्रयासों के साथ उन देशों और समुदायों को सुरक्षित बनाने में भी निवेश करना होगा, जो जलवायु परिवर्तन के असर का सामना कर रहे हैं। मौजूदा वित्तीय प्रतिबद्धताएं इस जरूरत से बहुत पीछे हैं। और अगर दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करती है, तो यह अंतर और गंभीर हो सकता है। (लेखक के अपने विचार हैं)