ख़ामोशी बड़ी मानीख़ेज़ हुआ करती है : दिनेश ठाकुर

कलमकार मंच द्वारा प्रकाशाधीन चार लेखकों की किताबें
तीसरा पड़ाव
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जयपुर। हमारी ग़ज़लों की तीसरी किताब आज मंज़रे-आम पर आ गई। पिंकसिटी प्रेस क्लब (जयपुर) में इसका विमोचन हुआ। लॉन्चिंग सेरेमनी में खाकसार ने जो कहा, पेश है…
मुझे अपनी किताब पर बोलना है। समझ नहीं आ रहा है कि क्या बोलूँ। बोलने के मामले में थोड़ा कमज़ोर हूँ। आप सभी जानते हैं कि उर्दू शाइरी के हिसाब से ग़ज़लें बोली या लिखी नहीं जातीं, कही जाती हैं। इस समय मैं ख़ुद को बोलने और कहने की सरहद पर नो मेंसलैंड में खड़ा महसूस कर रहा हूँ। पच्चीस साल पहले इसी प्रेस क्लब में जब मेरी ग़ज़लों की पहली किताब ‘हम लोग भले हैं काग़ज़ पर’ का विमोचन हुआ था, मैं तब भी इसी नो मेंसलैंड में खड़ा था। फ़िलहाल बोलने और कहने की उधेड़बुन में जॉन एलिया साहब के अशआर याद आ रहे हैं – ‘उसकी गली से उठके मैं आन पड़ा था अपने घर / एक गली की बात थी और गली-गली गई / एक ही हादिसा तो है और वो ये कि आज तक / बात नहीं कही गई, बात नहीं सुनी गई। ‘
अपनी नई किताब में मैंने ख़ामोशी से अपनी बात कहने की कोशिश की है। ख़ामोशी बड़ी मानीख़ेज़ हुआ करती है। निदा फ़ाज़ली ने फ़रमाया है – ‘मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का / मैं हूँ ख़ामोश जहाँ मुझको वहाँ से सुनिए।’ किताब का नाम ‘ख़ामोशी इक मुश्किल फ़न है’ रखने के पसमंज़र में शायद इस शेर की भी भूमिका है। इंटरनेट के हवाले से हम ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं, जब बोलने का सैलाब-सा आया हुआ है। पहले लोग नेकी करके दरिया में डाल देते थे। अब कुछ भी करते हैं तो फेसबुक, व्हाट्सऎप, एक्स और इंस्टाग्राम पर डाल देते हैं। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा की भावना के साथ। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कितना बोला जा रहा है, क्या-क्या बोला जा रहा है, सभी जानते हैं। कितना सुना जा रहा है, कोई नहीं जानता। मेरा मानना है कि इस आशंका से अपनी बात कहने से गुरेज़ नहीं करना चाहिए कि उसे सुना नहीं जाएगा। नेकी कर दरिया में डाल।
ख़ामोशी शुरू से मेरा सरमाया रही है और गाहे-ब-गाहे मेरी ग़ज़लों में सुर सजाती रही है। इसे जुस्तजू, तलाश या खोज भी कहा जा सकता है। और जुस्तजू किसकी है, मैं ख़ुद नहीं जानता। मेरी दूसरी किताब ‘परछाइयों के शहर में’ की एक ग़ज़ल के दो शेर हैं – मैं दीदा-ए-बेदार हूँ मुद्दतों से / ज़रा नींद का नक़्शे- पा चाहता हूँ / तेरे साथ रह कर भी बेचैनियाँ हैं / ख़ुदा जाने अब और क्या चाहता हूँ।’ मेरी ख़ुशनसीबी है कि नंद बाबू (नंद चतुर्वेदी) ने ‘परछाइयों के शहर में’ की भूमिका में इस जुस्तजू पर स्नेह की मुहर लगा दी। उन्होंने लिखा – ‘दिनेश ठाकुर की ग़ज़लें सबसे ज़ियादा जिरह झूठ-सच की करती हैं। उनकी ग़ज़लें दुनिया की बेरहम वारदात से नज़रें चुराने की नहीं हैं, बल्कि उन वजूहात को खंगालने की हैं, जो अनहोनी मुश्किलों के लिए ज़िम्मेदार हैं।’ शुक्रिया नंद बाबू। उदयपुर में आपकी सोहबत में गुज़ारे गए मौसम आज भी यादों में हरे हैं।
मेरा मानना है कि शाइरी ख़ामोशी से अपने विचारों की अभिव्यक्ति का बेहतरीन ज़रिया है। शाइर कितना भी लिख ले, ख़ुद को अभिव्यक्त करने की छटपटाहट कभी ख़त्म नहीं होती। ज़िंदगी लम्हा-लम्हा अनुभव देती जाती है और वह अपनी रचनाओं के ज़रिए ख़ुद को अभिव्यक्त करता चलता है। चेक भाषा के कवि योरोस्लाव ने कहा था – ‘दुनिया की लाखों कविताओं में मैंने भी कुछ कविताएँ जोड़ी हैं। उनकी झंकार झींगुरों के स्वर से ज़ियादा नहीं है। लेकिन मुझे इसका अफ़सोस नहीं है, क्योंकि अपराध करने की बनिस्पत प्रेम भरे कुछ शब्दों की खोज ज़ियादा बड़ी चीज़ है।’
मुझे लगता है कि अभिव्यक्ति के लिए किसी शाइर को सात जनमों का समय भी मिल जाए तो वह कम होगा। यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि जल्दबाज़ी में कुछ नहीं लिखा जाना चाहिए और न ही सिर्फ़ लिखने के लिए लिखा जाना चाहिए। कुछ हैं जो रोज़ एक ग़ज़ल कहने का टारगेट लेकर चलते है। हैरानी होती है कि क्या कोई ऐसी मशीनी रफ़्तार से ग़ज़ल कह सकता है। मुझे तो एक ग़ज़ल मुकम्मल करने में कई दिन, महीने और साल तक लग जाते हैं। बशीर बद्र साहब ने फ़रमाया भी है – ‘चमकती है कहीं सदियों में आँसुओं से ज़मीं/ ग़ज़ल के शेर कहाँ रोज़-रोज़ होते हैं। ‘
शाइर के सीने में भाव, अनुभूति और विचारों के झरने रफ़्ता-रफ़्ता जमा होते रहते हैं। यह बाँध लबालब होने पर शाइरी की गंगा-जमुना उसी तरह सीने से बाहर आकर बहने लगती है, जैसे पहाड़ से कोई नदी। कवि की बातें और उसकी कविता दो अलग-अलग चीज़ें हैं। कहा गया है कि कवि की बातों पर भरोसा मत करो। भरोसा करो सिर्फ़ उसकी कविता पर। शमशेर जी ने भी कहा है – ‘बात बोलेगी हम नहीं / भेद खोलेगी बात ही।’
मैं अपनी बात को यहीं ख़त्म करना चाहूँगा। मैं बहुत आभारी हूँ कलमकार मंच का, निशांत मिश्रा जी का, जिनकी कोशिशों से किताब मंज़रे-आम पर आई है। इस आयोजन के लिए उनके साथ प्रेस क्लब का भी आभार। सभी सम्मानीय वरिष्ठ जनों, आयोजन में शिरकत कर रहे विशिष्ट जनों और साथियों का तहे-दिल से शुक्रिया।
आख़िर में अपनी नई किताब की एक ग़ज़ल के कुछ शेर…
रोज़ क्या-क्या हुआ नहीं करता
मैं किसी का गिला नहीं करता।

वो बुरा आदमी नहीं, लेकिन
वो किसी का भला नहीं करता।

खोल देता हूँ खिड़कियाँ सारी
दर्द फिर भी उड़ा नहीं करता।

एक दिन उसको कुछ सुनाना है
जो किसी की सुना नहीं करता।

सब ठहाके कहाँ गए उसके
आजकल क्यों हँसा नहीं करता।

इस अवसर पर कलमकार मंच द्वारा प्रकाशाधीन चार लेखकों की किताबें शीघ्र होंगी पाठकों के हाथों में

  1. वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार दिनेश ठाकुर (जयपुर) का ग़ज़ल संग्रह – ‘ख़ामोशी इक मुश्किल फ़न है’
  2. वरिष्ठ साहित्यकार भागचन्द गुर्जर (जयपुर) का नाट्य संग्रह – ‘ऊपरी हवा और अन्य नाटक’
  3. वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार राजेश शर्मा (जयपुर) का उपन्यास – ‘अत्रैव घुश्मेश्वरः यहीं है घुश्मेश्वर’
  4. वरिष्ठ कथाकार इन्दु सिन्हा ‘इन्दु’ (रतलाम, मध्य प्रदेश) का कहानी संग्रह – ‘डिजिटल युग का डोकरा’

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