जहर पीना राजधानी दिल्ली के लोगों की नियति बन गया है – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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बीते दिनों देश का सबसे स्वच्छ शहर का तमगा हासिल कर चुके मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में मल युक्त पीने का पानी पीकर अब तक हुयी तकरीबन 23 से अधिक मौतों , 3000 से अधिक लोगों के बीमार होने, 200 से ज्यादा लोगों के अस्पतालों में भर्ती होने, 20 से ज्यादा लोगों की हालत ज्यादा गंभीर होने और 32 से ज्यादा के आईसीयू में होने की खबर ने पूरे देश में दूषित पेयजल की समस्या को बहस का मुद्दा बना दिया है। सबसे बड़ी दुखदायी बात यह है कि इंदौर में आज भी दूषित पानी पीने से बीमार लोगों का अस्पताल पहुंचने का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। हालत की गंभीरता का सबूत यह है कि देश में हर घर को नल से साफ पानी देने का दावा करने वाली सरकार भी इस मामले में पूरी तरह नाकाम रही है। विडम्बना देखिए यह हालत अकेले इंदौर की ही नहीं है, गुजरात के गांधीनगर में भी इंदौर जैसे हालात हैं जहां दूषित पानी पीने से 100 से ज्यादा लोग बीमार होकर अस्पतालों में भर्ती हैं। दूषित कहें या फिर जहरीले पानी की आपूर्ति का मसला अकेले इंदौर, गांधीनगर तक ही सीमित नहीं है,जहां तक देश की राजधानी दिल्ली का सवाल है, देश की राजधानी दिल्ली भी दूषित पेयजल की समस्या से अछूती नहीं है। प्रदूषित पानी कहें या फिर उसे जहर कहें दिल्ली वासियों की नियति बन गया है। सच कहा जाये तो यहां की तकरीब 30 फीसदी आबादी धीमा जहर पीने को मजबूर है। स्वच्छ पानी दिल्ली वालों के लिए तो अब सपना बन गया है।
गौरतलब है कि स्वच्छ पेयजल में टीडीएस की आदर्श मात्रा 300 से 350 पी पी एम के बीच है जिसमें 100 से 150 पी पी एम सबसे अच्छा मानक माना जाता है। जबकि 500 से अधिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है। और जब टीडीएस 2000 पीपीएम से ऊपर पहुंच जाये तो पानी पीने योग्य नहीं रहता। लेकिन अब दिल्ली में टीडीएस की मात्रा 900 के पार है। पिछले दिनों भलस्वा डेरी इलाके के एक घर में पानी में टीडीएस की मात्रा 968 पायी गयी। जाहिर है ऐसी स्थिति में दूषित जल दिल्ली वालों को बीमार बना रहा है। हकीकत यह है कि दिल्ली का पानी 24 फीसदी लोगों की मौत की वजह बन रहा है। दूषित पानी में मौजूद वैक्टीरिया, वायरस और परजीवी बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए सर्वाधिक खतरनाक साबित हो रहा है। पानी में केवल जीवाणु ही नहीं, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सैनिक आदि खतरनाक रसायन गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं। अपोलो, यथार्थ और गंगाराम अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन के डाक्टरों का कहना है कि दूषित पानी से बार-बार हो रहे दस्त, पेटदर्द, बच्चों में कुपोषण और उनके शारीरिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है। दूषित पानी से लिवर, किडनी और हड्डियों को काफी नुकसान होता है। कई मरीज तो तब अस्पताल पहुंचते है जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। राजधानी के अस्पतालों में पिछले दिनों से दूषित पानी से होने वाली बीमारियों खासकर डायरिया, उल्टी-दस्त, टायफायड, हैपेटाइटिस-ए और ई, पेट के संक्रमण और बच्चों में डिहाइड्रेशन के मामले के मरीजों की तादाद तेजी से बढी है। एम्स दिल्ली में सामुदायिक चिकित्सा विभाग के डा० संजय राय की मानें तो पानी में मिले हैवी मैटल शरीर के हरेक अंग के लिए हानिकारक हैं। इनसे किडनी डैमेज होने, हृदय रोग के अलावा त्वचा और लम्बे समय तक शरीर में इनके पहुंचने पर कैंसर भी हो सकता है। यह बेहद चिंताजनक स्थिति है।
असलियत में यहां के लोग हर साल दूषित पेय जलापूर्ति की समस्या से दो-चार होते हैं। आज भी यहां जनकपुरी, भलस्वा, चंद्र नगर, अशोक नगर ,नारंग कालोनी आदि अनेक इलाकों के लोग दूषित पेयजल मिलने से परेशान हैं। जनकपुरी ए ब्लाक का गंदे पानी की आपूर्ति का मामला अभी भी एन जी टी में विचाराधीन है। एन जी टी की सख्ती के बाद अब कहीं जाकर दिल्ली जल बोर्ड ने सुध ली है और इस इलाके की दशकों पुरानी और छतिग्रस्त पाइप लाइन बदलने का काम शुरू किया है। दिल्ली जल बोर्ड का पानी अक्सर दूषित आता है, इसमें दो राय नहीं है। फिर घरों में पहुंचने वाले पानी की सही ढंग से जांच भी नहीं होती है, इसी वजह से जलजनित बीमारियों का हरसमय खतरा बना रहता है। पूर्वी दिल्ली के शकरपुर, लक्ष्मी नगर, मंडावली, और पुरानी दिल्ली के सीताराम बाजार इलाके में अक्सर बदबूदार पानी की सप्लाई होती है। पिछले दिनों शकरपुर ए ब्लाक में सीवर युक्त बदबूदार पानी आया जिससे इलाके में पानी की टंकियों में बदबू आ गयी। लोगों का कहना है कि जल बोर्ड के पानी का इस्तेमाल तो वे केवल नहाने या कपड़े धोने में ही करते हैं। खाना बनाने या पीने के लिए नहीं। यही वह एकमात्र कारण है जिसके चलते दिल्ली के लोग मजबूरी में आर ओ का पानी, या फिर कैंपर से पानी मंगवाकर या बोतलबंद पानी के जरिये खाना बनाने और अपनी प्यास बुझाने के लिए कर रहे हैं। इसी के चलते बोतलबंद पानी का कारोबार काफी मात्रा में फल फूल रहा है। खास बात यह कि इस पर लोगों की निर्भरता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, बिना यह जाने कि आर ओ का पानी जिसे वे शुद्ध समझकर पी रहे हैं, वह भी स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। कहीं-कहीं आर ओ के पानी की जांच में टीडीएस की मात्रा 57 से 65 तो कहीं 70 ही मिली। ये हालात बोतलबंद या आर ओ के पानी की गुणवत्ता की जीती-जागती मिसाल हैं।
सबसे चिंतनीय बात यह है कि राजधानी का भूजल भी प्रदूषित हो गया है। इसमें कूड़े के पहाड़ की अहम भूमिका है। ओखला, भलस्वा, गाजीपुर और बवाना में लैंडफिल
साइट के आसपास का भूजल दूषित होने का नतीजा दिल्ली की लगभग 30 फीसदी आबादी साफ पानी से महरूम है। गत दिनों दिल्ली विधान सभा में भी विधायकों ने गंदे पानी की और असमान वितरण की समस्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कुछ विधायकों ने अपने इलाकों में सालों से दूषित पानी की आपूर्ति का मामला उठाया। दिल्ली सरकार के जल मंत्री प्रवेश वर्मा ने भी माना है कि दिल्ली में जर्जर पाइप लाइन से पेयजल दूषित हो रहा है। पानी की बर्बादी का भी यही अहम कारण है। उनका कहना है कि लम्बे समय से स्वच्छ जल उपलब्ध कराने की दिशा में काम नहीं किया गया। यह समस्या पूर्व सरकारों की लापरवाही, वर्षों की उपेक्षा,अनिर्णय और देरी का नतीजा है। अब राजधानी की पानी की पुरानी पाइप लाइन बदली जायेंगी। इनके बदलने से दूषित पानी की समस्या दूर होगी और जल रिसाव में भी कमी आयेगी। बीते 11 महीनों में हमने इस समस्या के समाधान हेतु काफी कदम उठाये हैं। दिल्ली सरकार और जल बोर्ड केन्द्र सरकार के सहयोग से हर घर तक स्वच्छ एवं सुरक्षित, समान और निरंतर 24 घंटे जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। दिल्ली की समस्या राजनीति से नहीं, नीति और नीयत से सुलझेगी। सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी सरकार को भी तकरीब एक साल होने वाला है, इस दौरान उन्होंने इस दिशा में काम क्यों नहीं किया। अब उन्हें इसकी सुध कैसे आयी। अगर दिल्ली सरकार ने इस दौरान कुछ काम किया होता तो हालात इतने बुरे नहीं होते।
गौरतलब है कि 2024 में कुल मिलाकर 90,833 मौतें हुयीं जिसमें तकरीबन 24 फीसदी यानी 21,427 मौतें सीधे-सीधे संक्रामक और परजीवी रोग के कारण हुयीं। 2023 में यह आंकड़ा 28.66 फीसदी और 2022 में 26.39 फीसदी रहा है। जाहिर है यह खतरनाक स्थिति है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाये गये तो आने वाले समय में स्थिति और भी भयावह हो जायेगी। यह हालत तब है जबकि दिल्ली में दूषित पानी की आपूर्ति के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट और एनजीटी कई बार अपनी नाराजगी जता चुके हैं और आनंद विहार, योजना विहार, जनकपुरी में दूषित पानी का मामला अदालत तक जा पहुंचा है। सरकार दावा ,करते नहीं थकती कि दिल्ली में 93 फीसदी घरों में नलों से पेयजल की आपूर्ति की जाती है। लेकिन हकीकत में यह सच नहीं है। जबकि संगम विहार, देवली सहित बहुतेरी अनधिकृत कालोनियों व झुग्गी बस्तियों में पानी का कनेक्शन ही नहीं है। बाहरी दिल्ली के किराडी, नरेला, नरेला की संजय कालोनी,भलस्वा डेरी आदि बहुतेरी जगहों पर तो नियमित पानी की आपूर्ति होती ही नहीं है और यदि आता भी है तो वह इतना गंदा कि उससे हाथ भी धोये नहीं जा सकते, पीने का तो सवाल ही कहां उठता है। नांगलोई, सुल्तानपुरी और किराडी में तो नलों से काले-पीले रंग के दूषित पानी आने की आम शिकायत है। सरकार घरों से समय-समय पर पानी के नमूने जांच के लिए लेने का दावा करती है। उसकी मानें तो हर साल तकरीबन 80 हजार से ज्यादा पानी के नमूने लिए जाते हैं लेकिन समझ नहीं आता कि उन नमूनों की जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई कब होती है। देखा जाये तो बीती 22 दिसम्बर से 26 दिसम्बर के बीच लिये 7129 पानी के नमूनों में 100 से ज्यादा फेल पाये गये हैं। अब कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में जापान इंटर नेशनल कोआपरेशन एजेंसी और अन्य विशेषज्ञ तकनीकी ऐजेंसियों से जलापूर्ति नेटवर्क का अध्ययन कराया जायेगा। उसकी रिपोर्ट के बाद कदम उठाया जायेगा। सरकार का दावा कि राजधानी में पानी व सीवर की व्यवस्था सुधारने हेतु 68 विधान सभा क्षेत्र में 734 करोड़ की राशि दी गयी है। फिर भी हालात जस के तस हैं बल्कि पहले से बदतर हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर 734 करोड़ का क्या हुआ और अब कहा जा रहा है कि दिल्ली का जलापूर्ति का बदहाल नेटवर्क सुधारने हेतु 30 हजार करोड़ रुपए की जरूरत है। जानकारी है कि केंद्र सरकार ने राजधानी के हर घर में पेयजल व सीवर लाइन नेटवर्क उपलब्ध कराने के लिए व जलस्रोतों की दशा सुधारने हेतु अमृत 2 योजना के तहत 2800 करोड़ आवंटित किये हैं और 800 करोड़ की लागत से अनधिकृत कालोनियों में सीवर नेटवर्क मजबूत किया जायेगा। देखना यह है कि पेयजल व सीवर नेटवर्क सुधारने हेतु दी गयी यह राशि भी सरकारी भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़ जाये और दिल्ली की जनता पहले की तरह इस बार भी ठगी की ठगी रह जाए।
असलियत में दिल्ली में दूषित पेय जलापूर्ति की मुख्य समस्या दशकों पुरानी 2800 किलोमीटर लम्बी पाइप लाइन का होना है। समय पर पाइप लाइन में बदलाव न होना और देखरेख में लापरवाही के कारण रिसाव , पानी की बर्बादी और दूषित पानी की समस्या हरसमय बनी रहती है। वह बात दीगर है कि राजधानी दिल्ली में जल शोधन संयंत्रों में लिए गये सैंपलों में 33 सैंपल फेल पाये गये हैं। उनकी सही ढंग से जांच नहीं हो पाती है। दरअसल केन्द्र के जल जीवन मिशन के तहत राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में अपनी जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाओं को एन ए बी एल से अनिवार्य रूप से मान्यता प्राप्त करानी होती है ताकि उनके आंकड़ों की विश्वसनीयता, सटीकता और प्रामाणिकता बनी रहे। लेकिन यहां ऐसा नहीं हो रहा है। नयी दिल्ली नगर पालिका परिषद के अधिकारी अपनी लैब का मान्यता प्राप्त होने का दावा तो करते हैं जबकि हकीकत में एन ए बी एल की सूची में वे हैं ही नहीं। यही नहीं एसटीपीआई की जांच हेतु जल बोर्ड के पास नौ लैब और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की लैब भी एन ए बी एल से मान्यता प्राप्त नहीं हैं। ऐसे हालात में ‘दिल्ली दिल वालों की’ को पीने का साफ पानी कब मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। लगता है देश की राजधानी दिल्ली का कोई पुरसाहाल है ही नहीं। अब तो वह किसी भगीरथ रूपी ताड़नहहार की बाट जोह रही है जो आये और उसे दूषित जल से मुक्ति दिलाये।
देखा जाये तो इंदौर, गांधीनगर की त्रासदी तो महज एक बानगी है जबकि देश में नीति आयोग की मानें तो हर साल दूषित पानी पीने से दो लाख लोगों की मौत होती है जबकि विशेषज्ञ इनकी तादाद चार लाख से ज्यादा बताते हैं। नीति आयोग की मानें तो देश में तकरीब 60 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं है। इससे 6 फीसदी जी डी पी का नुकसान होता है। हकीकत में देश का 70 फीसदी पीने का पानी प्रदूषित है। पेयजल की गुणवत्ता के मामले में हमारे देश का दुनिया के 122 देशों में 120वां स्थान है और दुनिया के 20 पीने के पानी के मामले में संकटग्रस्त शहरों में देश के छह शहर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और बैंगलुरू शामिल हैं। असलियत में दूषित पीने के पानी पीने से होने वाली मौतें विकास के दावों को मुंह चिड़ाती प्रतीत होती हैं। यह जल जीवन मिशन की नाकामी और सरकारी दावों के खोखलेपन का जीता-जागता सबूत है। (लेखक के अपने विचार हैं)

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