
लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़, (राजस्थान)
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वर्तमान सामाजिक परिवेश, सोशल मीडिया, घरेलू समस्याएं और आपसी तालमेल की कमी, स्वार्थी, मतलबी लोग, पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव व कृतघ्नता की मानसिकता के कारण आपसी पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में भावनात्मक दूरियां बढ़ती जा रही है। कुछ असर पीढ़ियों की सोच का अंतर भी है। लोग मतलब निकलने के बाद रिश्तों की अहमियत भूल जाते है। अपने स्वार्थ में ये तक भूल जाते है कि इन्हीं रिश्तों के कारण हम समाज व परिवार से जुड़े रहते है। ये समस्या लगभग हर समाज और हर परिवार में है। समाज और परिवार में रिश्तों की भावनात्मक दूरियों को कम करने के लिए कुछ समय के लिए सोशल मीडिया से दूरी बनाकर अपने परिवार के लोगों के साथ बातचीत करें एवं एक दूसरे की भावनाओं को साझा करें, सुनने वाला मनोयोग से उनकी भावनाओं को सुने व समझे कोई भी टीका टिप्पणी करने के बजाय सहानुभूति पूर्ण रवैया अपनाए। जितना हो सके उनका दु:ख या कोई समस्या हो तो कम करने में मदद करें।परिस्थिति के अनुसार अगर कोई गलती हो गई है तो अपनों से माफी मांग ले उसमें कोई शर्मिंदगी नहीं है। और माफ करने की भी क्षमता रखे तो आपसी विश्वास बढ़ेगा। अपनी भावनाओं को उजागर करने से गलत फहमी दूर हो जाती है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ में बैठकर खाना खाएं साथ साथ घूमे टहले। देश दुनिया की बातें करें। वातावरण को सहज बनाएं। घर में कोई बीमार है, कोई कम कमाता है, कोई ज्यादा कमाता है, कोई बेरोजगार है तो इन विषयों पर अनावश्यक टीका टिप्पणी न करे। घरेलू वातावरण को सहज व सौहार्दपूर्ण बनाए रखे। आपसे कोई बड़े है तो आदर करे, छोटे है तो प्यार से रखे। दूरियों को कम करने के लिए हम खुले मन व ईमानदारी से संवाद जारी रखे, मन में कोई बात है तो स्पष्ट रूप से परिवार के सामने रखे उसका निवारण करे। मन को शांत रखे।अपने स्वार्थ को अलग रख कर समाज व परिवार या कोई निजी रिश्ता है तो उसके दु:ख दर्द में जाकर खड़े रहे। मानसिक रूप से राहत मिलेगी। अगर व्यक्ति में समझ होगी तो आजीवन आपके दु:ख में आपके साथ रहेगा। अगर आपका कोई एहसान नहीं भी माने तो नेकी करके भूल जाए। लेकिन अपने परिवार और समाज से अपने भावनात्मक लगाव और रिश्तों की अहमियत व दूरी कम करने का प्रयास जारी रहना चाहिए। इससे परिवार व समाज में सौहार्दपूर्ण माहौल बनेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जरूरत से ज्यादा स्वार्थी लोगों से भी रिश्ता बनाये रखे। पात्रता अवश्य देखे। (लेखिका के अपने विचार हैं)