कर्नाटक में शिवकुमार की ताजपोशी

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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लगभग तीन साल पहले जब कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए थे और पांच साल बाद कांग्रेस फिर सत्ता में आई थी तो उस समय मुख्यमंत्री पद के दो बड़े दावेदार थे . एक थे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारामिया तथा दूसरे थे डी.के. शिवकुमार , जो उस समय प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे . अगला मुख्यमंत्री कौन हो इसको लेकर पार्टी आला कमान में कई दिन तक अनिश्चितता बनी रही . आला कमान दुविधा में थी कि दक्षिण इस राज्य बागडोर किसे दी जाये. एक तरफ उनके पास सिद्धारामिया जैसा ऐसा नेता था जो पिछड़ा वर्ग से आता था और उसे लम्बा प्रशासनिक अनुभव था . दूसरी और शिव कुमार जैसा नेता था जिसकी सबसे बड़े योग्यता यह थी कि वह गाँधी परिवार के बहुत निकट था।
यह बात भी किसी से छुपी नहीं थी कि विधानसभा चुनाव जीतने में शिव कुमार की बड़ी भूमिका रही थी . पार्टी को 2023 के चुनावों में कुल 225 सीटों में से 135 सीटें मिलीं थीं. पार्टी आला कमान ने माना था की अगर शिवकुमार चुनावों के मुखिया नहीं होते तो पार्टी को इतनी सीटें शायद ही मिलती. लगभग तो तिहाई विधायक भी शिवकुमार के साथ थे . उधर सिद्धारामिया अहिन्दा (पिछड़ा , दलित और मुस्लिम ) वर्ग , जो लगभग 70 प्रतिशत होता है, के सबसे बड़े नेता थे। शिव कुमार वोक्कालिंगा समुदाय से आते है जो है तो केवल 13 प्रतिशत लेकिन इस समुदाय का सामजिक तथा राजनीतिक प्रभाव संख्या बल से कहीं अधिक है।
एस माना जाता है कि उस समय एक अलिखित समझौता हुआ था कि पांच साल के पहले ढाई वर्ष सिद्धारामिया मुख्यमंत्री रहेंगे तथा इसके बाद अपना पद शिव कुमार को सौंप देंगे . यह भी तय हुआ कि शिव कुमार उप मुख्यमंत्री होंगे तथा उन्हें उनकी पसंद का विभाग दिया जायेगा . साथ ही यह कहा गया कि सिद्धारामिया अपनी सरकार के सभी फैसले शिव कुमार की सहमति से लेंगे . एक बड़ा फैसला यह भी हुआ कि 2024 के लोकसभा चुनावों तक शिव कुमार प्रदेश कांग्रेस के मुखिया बने रहेंगे, यह बात अलग है कि मुख्यमंत्री बनने तक वे इस पद पर बने रहे।
हालाँकि सिद्धारामिया ने यह बात बार बार कही कि सत्ता के बंटवारे को लेकर कोई समझौता नहीं हुआ था तथा वे अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे . जबकि शिव् कुमार तथा उनके समर्थक यह दावा करते रहे है ऐसा समझौता हुआ था भले ही यह समझौता अलिखित था . सिद्धारामिया का आधा कार्यकाल पिछले साल 8 नवम्बर को पूरा हो गया था . शिवकुमार और उनके समर्थकों ने सितम्बर में ही पार्टी आला कमान पर दवाब बनाना शुरू किया कि अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री का पद शिव कुमार सौंप दिया जाये . उधर सिद्धारामिया के समर्थक ने भी दिल्ली पहुँच कर इस बात का दवाब बनाया कि राज्य में सरकार अच्छा काम कर रही है इसलिये मुख्यमंत्री बदलने का कोईऔचित्य नहीं है . उस समय बिहार विधानसभा के चुनाव सिर पर थे इसलिए पार्टी अल्ला कमान ने दोनों पक्षों को समझाया कि इस मुद्दे पर बिहार विधानसभा के चुनावों के बाद ही विचार किया जायेगा . बिहार के चुनावों के बाद नेतृत्व में बदलाव का मुद्दा फिर सामने आ गया . सिद्धारामिया लम्बे समय तक कई सरकारों में वित्त मंत्री रहे है .उन्होंने तब तक 16 बजट पेश किये हैं . उन्होंने पार्टी आला कमान को गुहार लगाई कि उन्हें 26 -27 वर्ष का बजट पेश करने तक समय दिया. यह मार्च में प्रस्तुत किया जाना था। इसी बीच पांच राज्यों के चुनावों के घोषणा हो गई . इसलिए यह मामला फिर आगे सिरक गया . चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद इस पार्टी आला कमान ने इस मुद्दे पर अपना रुख तय करने का फैसला किया गया . मई के आखिरी महीने में दोनों पक्षों के नेताओं को दिल्ली बुलाया गया . राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी यह तय कर चुके थे कि अब समय आ गया कि उनके वफादार शिवकुमार को राज्य में सत्ता सौंप दी जाये . मामला सोनिया गाँधी तक गया। सोनिया गाँधी ने सिद्धारामिया को बुला कर इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे अपने पद से इस्तीफ़ा दे दें. उनको यह पेशकश की गई उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना दिया जायेगा . उन्हें राज्य की राजनीति छोड़ केंद्र की राजनीति में काम करना चाहिए . इस बात के संकेत भी दिए गए कि दिल्ली में केंद्रीय स्तर पर पार्टी के संगठन में को उनको कोई महत्वपूर्णन पद दे दिया जायेगा . फ़िलहाल उन्होंने इस पेशकश को स्वीकार नहीं किया है तथा कहा कि वे अभी वे राज्य की राजनीनीति में सक्रिय रहेंगे तथा सामाजिक कार्यों में समय लगायेंगे। (लेखक के अपने विचार हैं)

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