
लेखक : रमेश जोशी (व्यंग्यकार)
प्रधान सम्पादक, ‘विश्वा’, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए.
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तोताराम ने आते ही बिना किसी भूमिका और संदर्भ के प्रश्न दाग दिया- कुछ सुना ?
हमने भी वैसा ही उत्तर दिया- अभी कहाँ से सुनें ? अगला अंक तो 28 जून को आएगा । हाँ, मन की बात का मई वाला एपिसोड तो सुना था जिसमें मोदी जी गरमी से बचने के लिए पानी पीते रहने की सलाह दी थी ।
बोला- मन की बात नहीं, कुछ ऐसी वैसी बात ।
हमने कहा- ऐसी वैसी में तो जयपुर में कॉकरोच पार्टी वाले का दिमाग ठीक करवा दिया किसी भक्त सेवक से ।
बोला- वह भी नहीं, मेरा मतलब मंदिर से था ।
हमने कहा- जहाँ भी गंदगी होगी वहाँ मक्खियों और जहाँ चिकनाई और मिठाई होगी वहाँ चींटियों को बुलाने की जरूरत नहीं होती । जाने उन्हें कैसे पता चल जाता है । फटाफट पहुँच ही जाती हैं ।
बोला- मंदिर में गंदगी कहाँ ? वहाँ तो भगवान होते हैं, धर्म होता है और सद्विचार का पवित्र वातावरण होता है ।
हमने कहा- धन और सदविचार एक साथ रह ही नहीं सकते । आग और घी, धन और ईमान, सूरा-सुंदरी और संयम एक साथ नहीं रह सकते ।
कुछ न कुछ तो होगा ही । चाहे चोरी हो या महमूद ग़ज़नवी की तरह का सोमनाथ पर डाका या फिर केदारनाथ में सोने का घपला, काशी विश्वनाथ के गर्भगृह की दीवारों पर 60 किलो सोना मंढ़ने में पीतल की मिलावट हो या तिरुपति के प्रसाद में चर्बी; ये सब विशिष्ट मंदिरों के निकृष्ट उदाहरण हैं । और अब मथुरा के कृष्ण मंदिर से हजारों करोड़ के सोने और जवाहरातों की चोरी का आरोप दिनेश फलाहारी ने अपने खून से लिखे पत्र में लगाया है ।
बोला- लेकिन क्या इन चोरों को भगवान का डर नहीं लगता ?
हमने कहा- डर कैसा ? न राम लला के हाथ में धनुष, न मथुरा के कृष्ण के पास सुदर्शन चक्र, न बनारस के शिव लिंग के पास त्रिशूल । तिरुपति के बालाजी तो पहले से ही कुबेर के कर्ज़दार बनकर हिरासत में लेटे हैं ।अभी तक भक्त उनका कर्जा ही नहीं चुका पाए हैं ।
और फिर जो जिसके जितना निकट रहता है वह उतना ही उसकी सचाई को जानता है । जिससे हाथ मिलने तक को लोग तरसते हैं और जिसके नाम से लोग काँपते हैं उसका कुत्ता उसका मुँह भी चाट लेता है । सबसे बड़ा नास्तिक पुजारी होता है । जो मूर्ति और मंदिर से जितना दूर होता है वही श्रद्धालु, अंधविश्वासी और भयभीत भक्त होता है ।
बोला- वैसे जांच तो चल रही है । कुछ न कुछ तो निकलेगा ही ।
हमने कहा- ऐसे मामलों में कुछ नहीं निकलता । हमने अभी जो चार मामले बताए उसमें क्या निकला ? और याद रख कुछ निकलेगा भी नहीं जैसे कि आरएसएस अपना बही-खाता कभी नहीं दिखाएगी । ये केवल मंदिर, धर्म, संस्कृति नहीं है इनमें अशुद्ध राजनीति भी शामिल है । वह भी इनसे लाभान्वित होती है ।
बोला- तो फिर क्या उपाय है ?
हमने कहा- उपाय तो हैं लेकिन कोई रैदास जैसा सच्चा आदमी ही उन्हें अपना सकता है । अपने मन के कठौते में गंगा ढूँढने की क्षमता और ज्ञान प्राप्त करो । क्या जरूरत है मंदिर मंदिर माथा फोड़ने की । जब मंदिरों में धन नहीं होगा तो घपले भी नहीं होंगे ।
गांवों में हनुमान जी के मंड देखे हैं ना ? सौ-पचास ईंटों के एक ढांचा और एक सिंदूर लगा तिकोना पत्थर । सौ पचास ग्राम बताशे चढ़ाए तो हो गया काम । और अगर सिंदूर भी लगा दिया तो वाह वाह । किसी गोल पत्थर पर पानी डाला तो नमः शिवाय, और मिट्टी की डली या सुपारी पर कलावा लपेट दिया तो श्री गणेशायनमः ।
यहाँ कभी किसी चोरी और घपले का कोई चक्कर नहीं होता।
(लेखक के अपने विचार हैं)