खेजड़ी बचेगी तो थार बचेगा – रामगोपाल बिश्नोई

लेखक : रामगोपाल बिश्नोई
संयोजक, पर्यावरण संघर्ष समिति, थार मरुस्थल
लेखक पर्यावरण संघर्ष समिति बीकानेर के संयोजक और जाने-माने पर्यावरण प्रेमी हैं।
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विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का अवसर है। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, सूखते जलस्रोत और घटती जैव विविधता जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन और अधिक कठिन हो जाएगा। ऐसे समय में हमें यह समझना होगा कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।
थार मरुस्थल के संदर्भ में यह चिंता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। राजस्थान के विशाल रेगिस्तानी क्षेत्र में खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन-व्यवस्था की रीढ़ है। इसे मरुस्थल का कल्पवृक्ष कहा जाता है। अकाल और सूखे के समय इसकी सांगरी मनुष्य के भोजन का सहारा बनती है, इसकी पत्तियां पशुओं के लिए उत्तम चारा उपलब्ध कराती हैं और इसकी छाया भीषण गर्मी में जीवनदायिनी साबित होती है। वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि खेजड़ी मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, नमी बनाए रखने तथा मरुस्थलीकरण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही कारण है कि राजस्थान की संस्कृति, लोकजीवन और कृषि व्यवस्था में खेजड़ी का विशेष स्थान रहा है।
भारतीय संस्कृति और दर्शन भी प्रकृति को पूज्य मानते हैं। अथर्ववेद का उद्घोष — “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” — अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं, मनुष्य और प्रकृति के अटूट संबंध को दर्शाता है। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति संरक्षण को केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि धर्म माना था। यही परंपरा आगे चलकर बिश्नोई समाज के जीवन मूल्यों में दिखाई देती है, जहां वृक्षों और वन्यजीवों की रक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया गया।
खेजड़ी संरक्षण की बात आते ही 1730 का खेजड़ली बलिदान इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज दिखाई देता है। जब जोधपुर रियासत के सैनिकों ने खेजड़ी वृक्षों की कटाई शुरू की, तब अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 स्त्री-पुरुषों ने वृक्षों से चिपककर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, लेकिन वृक्षों को बचाने के संकल्प से पीछे नहीं हटे। विश्व इतिहास में पर्यावरण संरक्षण के लिए दिया गया यह सबसे बड़ा बलिदान माना जाता है। यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति भारतीय समाज की संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
दुर्भाग्य से आज तीन सौ वर्ष बाद भी खेजड़ी सुरक्षित नहीं है। सड़क, उद्योग, खनन और विभिन्न विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़ी संख्या में खेजड़ी वृक्षों का विनाश हो रहा है। हाल के वर्षों में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के दौरान भी हजारों खेजड़ी वृक्ष प्रभावित हुए हैं। नवीकरणीय ऊर्जा निश्चित रूप से समय की आवश्यकता है, लेकिन हरित ऊर्जा का अर्थ हरियाली का विनाश नहीं हो सकता। यदि स्वच्छ ऊर्जा के नाम पर सदियों पुरानी पारिस्थितिकी व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया जाता है, तो यह विकास का टिकाऊ मॉडल नहीं कहा जा सकता।
इसी संदर्भ में राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी खेजड़ी संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। न्यायालय ने यह प्रश्न उठाया कि क्या हरित ऊर्जा के नाम पर ऐसे वृक्षों की बलि दी जा सकती है जो सदियों से मरुस्थल के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए हुए हैं। न्यायालय की यह चिंता केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पिछले लगभग दो वर्षों से राजस्थान में खेजड़ी संरक्षण के लिए व्यापक जनआंदोलन चल रहा है। पर्यावरण प्रेमी, किसान, सामाजिक संगठन और बिश्नोई समाज लगातार यह मांग कर रहे हैं कि खेजड़ी को विशेष कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाए तथा इसके लिए एक प्रभावी “खेजड़ी संरक्षण कानून” बनाया जाए। आंदोलन का मूल उद्देश्य विकास कार्यों को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ आगे बढ़ें। जब तक खेजड़ी जैसे जीवनदायी वृक्षों को कानूनी सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक इनके संरक्षण की लड़ाई अधूरी रहेगी।
आज आवश्यकता केवल नए पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उन परिपक्व वृक्षों को बचाने की है जो दशकों से पर्यावरण को संतुलित बनाए हुए हैं। एक विकसित खेजड़ी वृक्ष का पारिस्थितिक योगदान हजारों नए पौधों से अधिक होता है। इसलिए नीति निर्माण में वृक्ष संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए छतों, नहरों के ऊपर, बंजर एवं अनुपयोगी भूमि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि जैव विविधता और पारिस्थितिकी को न्यूनतम नुकसान पहुंचे।
विश्व पर्यावरण दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक माना जाए। प्रकृति का संरक्षण कोई वैकल्पिक विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की शर्त है। यदि खेजड़ी बचेगी तो थार बचेगा, यदि थार बचेगा तो यहां की संस्कृति, कृषि, पशुधन और जैव विविधता बचेगी, और यदि यह सब बचेगा तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। यही विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक संदेश और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी। (लेखक के अपने विचार हैं)

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